Chhath Puja 2021 : सूर्य उपासना व लोक आस्था का महापर्व है छठ पूजा

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दीपावली को पर्वों की माला माना जाता है। पांच दिन तक चलने वाला ये पर्व सिर्फ भैयादूज तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह पर्व छठ तक चलता है। उत्तर प्रदेश और खासकर बिहार में मनाया जाने वाला ये पर्व बेहद अहम पर्व है जो पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। छठ केवल एक पर्व ही नहीं है बल्कि महापर्व है जो कुल चार दिनों तक चलता है। नहाय-खाय से लेकर उगते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य देने तक चलने वाले इस पर्व का अपना एक ऐतिहासिक महत्व है।

छठ पर्व कैसे शुरू हुआ, इसके पीछे कई ऐतिहासिक कहानियां प्रचलित हैं। पुराण में छठ पूजा के पीछे की कहानी राजा प्रियंवद को लेकर है। कहा जाता है, राजा प्रियंवद को कोई संतान नहीं थी तब महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन वो पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ। प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं और उन्होंने राजा से कहा कि क्योंकि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं, इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं। उन्होंने राजा को उनकी पूजा करने और दूसरों को पूजा के लिए प्रेरित करने को कहा।

राजा प्रियंवद ने पुत्र इच्छा के कारण देवी षष्ठी की व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कहते हैं ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी और तभी से छठ पूजा होती है। इस कथा के अलावा एक कथा राम-सीता जी से भी जुड़ी हुई है।

पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब राम-सीता 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे तो रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए उन्होंने ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूय यज्ञ करने का फैसला लिया। पूजा के लिए उन्होंने मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता पर गंगा जल छिड़क कर पवित्र किया और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। जिसे सीता जी ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।

एक मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। इसकी शुरुआत सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य की पूजा करके की थी। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे और वो रोज घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने।

आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है। छठ पर्व के बारे में एक कथा और भी है। इस कथा के मुताबिक जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए तब दौपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई थी और पांडवों को अपना राजपाठ वापस मिल गया था।

लोक परंपरा के मुताबिक सूर्य देव और छठी मइया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई।

छठ पूजा विधि : छठ पूजा का त्योहार 4 दिनों तक मनाया जाता है जिसके हर दिन का अपना महत्व है जो इस प्रकार है-

नहाय खाय : छठ पूजा के पहले दिन यानी कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को नहाय खाय के नाम से भी जाना जाता है इस दिन पूरे घर को साफ़ सुथरा करके, शुद्ध करके पूजा के योग्य बनाया जाता है इस दिन जो लोग व्रत रखते हैं, वे सबसे पहले स्नान करके नये वस्त्र धारण करके इस व्रत की शुरुआत करते हैं। व्रत करने वाले के शाकाहारी भोजन खाने के बाद ही घर के अन्य सभी सदस्य भोजन ग्रहण करते हैं। शाकाहारी भोजन में कद्दू और चने की दाल तथा चावल विशेष रूप से महत्व है।

खरना : इस व्रत के दूसरे दिन यानी पंचमी के दिन पूरे दिन व्रत रखने के पश्चात शाम को व्रती भोजन ग्रहण करती है जिसे खरना कहा जाता है। खरना का मतलब होता है पूरे दिन पानी की एक बूंद भी पिए बिना व्रत रहना। फिर शाम को चावल और गुड़ से खीर बनायी जाती है इसके साथ ही चावल का पिट्ठा और घी की चुपड़ी रोटी भी बनायी जाती है। इस खाने में नमक और चीनी का प्रयोग नहीं किया जाता है और इसे प्रसाद के रूप से आसपास के लोगों को भी बाटा जाता है।

संध्या अर्घ्य : छठ पूजा का यह विशेष दिन होता है कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन यानी पूजा के तीसरे दिन छठ पूजा का प्रसाद बनाया जाता है प्रसाद के रूप में ठेकुआ का विशेष महत्व है। भारत के कुछ भागों में इसे टिकरी और अन्य नामों से भी जाना जाता है इसके अलावा चावल के लड्डू भी बनते हैं फिर शाम को पूरी तरह तैयारी करने के बाद इन प्रसादों और पूजा के फलों के बांस की टोकरी में सजाया जाता है और इस टोकरी की पूजा करने के बाद घर के सभी सदस्यों के साथ जो व्रत रहते हैं, वे सूर्य को अर्घ्य देने के लिए तालाबों, नदियों या घाटों पर जाते हैं। फिर व्रती पानी में स्नान करके डूबते हुए सूर्य की विधिवत पूजा करके सूर्य को अर्घ्य देती हैं। इस मनोहर दृश्य को देखने लायक होता है जिसके कारण घाटो पर अत्यधिक भीड़ लग जाती है।

उषा अर्घ्य : छठ पूजा के चौथे दिन यानी सप्तमी के दिन जैसे लोग डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं ठीक उसी प्रकार पूरे परिवार के साथ उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और विधिवत पूजा पाठ करने के बाद प्रसाद का वितरण किया जाता है और इस प्रकार इस छठ पूजा का समापन किया जाता है।

छठ पूजा के नियम : चूंकि छठ पूजा का पर्व बहुत ही साफ़ सफाई का पर्व है। यह बहुत ही कठिन और परीक्षा का व्रत होता है इसलिए 4 दिनों के दौरान घरों में लहसुन, प्याज तक नहीं खाए जाते हैं और जो लोग व्रत रखते हैं, उन्हें घर में एक ऐसा कमरा दिया जाता है जहां पर पूरी तरह से शांति रहे जिससे व्रत रखने वाला ईश्वर में ध्यान लगा सके और जो लोग छठ पूजा का व्रत रखते हैं, उनके मन में किसी भी प्रकार का लालच, मोह भय आदि नहीं रखनी चाहिए।

-एजेंसी

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