Congress Party Should Keep Stalward And Mass Leaders Intact : कांग्रेस पार्टी से दिग्गजों का पलायन देश की राजनीति पर डालेगा प्रभाव

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कांग्रेस पार्टी से दिग्गजों का पलायन और अपनी पार्टी क्षेत्रीय पार्टी बनाना देश के लिए, देश के राजनीतिक और कांग्रेस के राजनीतिक भविष्य के लिए भी कोई शुभ संकेत नहीं है। इतिहास के पन्नों में कांग्रेस से दिग्गजों के जाने के बाद क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीति में जो प्रभाव पड़े हैं वो दर्ज है।
तृणमूल कांग्रेस का उदय ममता बनर्जी का कांग्रेस से नाता तोड़ने के बाद 1998 जून में हुआ। उस समय तत्कालिन कांग्रेस अध्यक्ष स्वर्गीय सीताराम केसरी थे। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ममता बनर्जी एक जन नेता हैं और थीं जिसको कांग्रेस ने खो दिया और आज पश्चिम बंगाल में कांग्रेस कहां है और ममता बनर्जी कहां है।

पंजाब के कद्दावर नेता सरदार अमरिंदर सिंह ने भी कांग्रेस से नाता तोड़ लिया और अपना मोह भंग करते हुये एक नई पार्टी का ऐलान दो नवंबर 2021 को कर दिया जिसका नाम है पंजाब लोक कांग्रेस। लगता है अमरिंदर सिंह भी ममता बनर्जी से प्रेरित होकर उन्हीं की राह पर चल पड़े हैं। बहुत लुभावना नाम है जिसमें कांग्रेस शब्द का बहुत चालाकि से प्रयोग है। कांग्रेस शब्द का प्रयोग तृणमूल कांग्रेस में भी है। अब ये नई पार्टी कितना चल पायेगी ये कहना कठिन है लेकिन मूल कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर देगी।

इसी तरह शरद पवार ने भी कांग्रेस से नाता तोड़ते हुये एक नई पार्टी की घोषणा 10 जून 1999 को कर दिया उस समय तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी थी। उन्होंने अपनी पार्टी का नाम राष्ट्वादी कांग्रेस पार्टी रखा, इसमें भी कांग्रेस शब्द का बहुत ढंग से समावेश किया।

वैसे तो बहुत से मुद्दे हैं जो बताते हैं कि जन समर्थन वाले नेता कांग्रेस से असंतुष्ट होकर निकल गये या कांग्रेस के अंदर भी रहते हुये असंतुष्ट ही हैं जिसका प्रभाव पार्टी पर पड़ता है। कांग्रेस पार्टी के लिए एक सबक होगा कि हाईकमान ऐसे असंतुष्ट, जनसमर्थन और जानकार कांग्रेसजनों से अपना संबंध मजबूत करने की दिशा में प्रयासरत रहे नहीं तो दो-चार जगहों पर विजयी हासिल करने से फिर पताखा खड़ा हो जयेगा ऐसा भारतीय राजनीति में संभव नहीं है।

कांग्रेस पार्टी की परंपरा में जिस राज्य में इंचार्ज के रूप में एआईसीसी से नुमाइंदा भेजा जाता है वो ना तो पूरे राज्य की भौगोलिक स्थिति से जानकार होता है ना तो वहां के समीकरण से। राज्य में जाकर धौंस दिखाता है और अच्छे कार्यकर्ताओं पर गलत प्रभाव डालकर दरकिनार करने की साजिश करता है ताकि उसका स्वार्थ सिद्ध होता रहे। इंचार्ज हाईकमान की आंख और कान होता है और उसे ईमानदारी बरतनी चाहिए, पर आज के परिपेक्ष में ऐसा नहीं हो रहा है। दलबदलुओं और घुसपैठियों की बहुत चल रही है। झारखंड में भी कुछ ऐसा ही है। इसका प्रभाव झारखंड में चुनाव आते-आते दिखने लगेगा।

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