Corona-2 @ Jharkhand : कोरोना-2@ झारखंड, देर से उठाया जा रहा सही कदम

जिस अदृश्य अतिसंक्रामक विषाणु कोरोना ने सवा तीन करोड़ से कुछ ही अधिक आबादी वाले छोटे से झारखंड में दो लाख से अधिक लोगों को अपने संक्रमण के लपेटे में ले लिया, बेशक वह अयाचित तो था, लेकिन अप्रत्याशित कतई नहीं था। आज की तारीख में यह तकरीबन छह हजार लोगों को औसतन हर दिन प्रभावित कर रहा है। सौ-सवा सौ लोग इसकी चपेट में आकर अकाल मौत के शिकार हो रहे हैं।

सौ साल पहले 1918 में फैले स्पैनिश फ्लू से भी बदतर हालात में पहुंचने लगी है आबादी। सच है कि यह अकेले झारखंड का ही अभिशाप नहीं है, इसके दंश से पूरा देश और यहां तक विश्व की बड़ी आबादी त्राहि-त्राहि करने को विवश हुई है। कुछ लोग इसे महज महामारी से ऊपर उठकर प्रलय की संज्ञा देने लगे हैं, तो इस पर ताज्जुब नहीं किया जाना चाहिए। जब एक वाॅयरस के प्रभाव में आने से क्या बुजुर्ग, क्या जवान, क्या सामान्य जन, क्या डाॅक्टर सभी जान गंवाने को अभिशप्त हों तो इसे प्रलयकाल ही तो कहा जाएगा।

ज्ञान-विज्ञान और शोध-तकनीक के उत्कर्ष काल इस 21वीं सदी में विश्व में कोरोना जनित कोविड-19 नामक संक्रामक जानलेवा बीमारी तकरीबन डेढ़ साल पहले चीन से शुरू हुई, जिसने देखते-देखते पूरी दुनिया को अपनी जद में ले लिया। भारत और झारखंड में इसने पिछले साल फरवरी-मार्च में अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू किया लेकिन छह-सात महीने बीतते-बीतते पिछले वर्ष सितंबर-अक्टूबर में इसका प्रभाव कम क्या, अति न्यून होने लगा। यह वही समय था, जिसके कुछ ही काल बाद दुनिया के कतिपय अन्य देशों में इसकी दूसरी लहर ने कुछ अधिक ही तांडव मचाया। कोरोना की दूसरी लहर का आना अस्वाभाविक नहीं था। पूर्व में अपना प्रभाव दिखा चुकी हैजा, चेचक, फ्लू जैसी प्राणघातक संक्रामक बीमारियों की भी एकाधिक लहरें आ चुकी थीं। इस अनुभव से जिन देशों/राज्यों ने सीख ली, वे इसका प्रभाव कम करने में सक्षम हो सके, जिन लोगों ने इसको हल्के में लिया, वे अब छटपटाने को अभिशप्त हैं।

अब यह पता चल रहा है कि कोेरोना-1 अपेक्षाकृत कम घातक था लेकिन उसने चेता दिया था कि दूसरी लहर से निपटने की तैयारी कर लो। झारखंड ही क्या, देश के स्तर पर यहीं चूक हुई। कोरोना-1 का प्रभाव कम होते ही ऐसा लगता है, मानो हर कोई निश्चिंत हो गया। क्या नेतृत्ववर्ग, क्या नौकरशाही, क्या अवाम हर कोई अपनी ही तरंग में बहने लगा। राजनेता राजनीति में व्यस्त हो गए, नौकरशाही फाइलों में उलझ गई और अवाम छुट्टा सांड बन गई। बाजार, मेला, रैली, रैला, उत्सव, बेहिचक मिलना-जुलना सब शुरू हो गया। लगता ही नहीं था कि कुछ ही अरसा पहले इस वाॅयरस से डरे-सहमे लोग इसकी कतई परवाह भी करते हैं। सबको लगने लगा कि एक झोंका था, जो जल्दी ही चला गया।

पूरी दुनिया ने साफ-साफ देखा कि बंगाल विजय के लिए, असम विजय के लिए, तमिलनाडु विजय के लिए, पुडुचेरी विजय के लिए, केरल विजय के लिए और यहां तक कि झारखंड में मधुपुर विजय के लिए किस प्रकार राजनेताओं ने धुआंधार रैलियां, जुलूस और मेल-मुलाकात शुरू कर दिया। इनको अपने चुनाव आयोग ने भी खुली छूट दे दी। इस संदर्भ में हमें मद्रास हाईकोर्ट की 26 अप्रैल की टिप्पणी पर गौर करना ही होगा, जिसमें उसने इस बार की आफत के लिए चुनाव आयोग को सरासर दोषी ठहराया है। अदालत की बात में दम तो है। कोरोना-1 पूरी तरह खत्म हुआ भी नहीं कि पूर्वापेक्षा अधिक चहल-पहल की जाने लगी। राजनेताओं ने तो सबसे पहले कोरोना प्रोटोकाॅल को धत्ता बताना शुरू कर दिया। अवाम के लिए ‘दवाई भी, कड़ाई’ भी भजते-भजते खुद फेस मास्क तक उतार फेंका। अवाम ने जब नेताओं की यह सूरत देखी तो ‘हांके भीम दोबर’ की तर्ज पर वह जीवन के जश्न में शामिल हो गई। नतीजा सामने है, हर तरफ आॅक्सीजन, दवा का हाहाकार, श्मशान, कब्रिस्तान में जगह नहीं। लाश पर लाश लादकर या अगल-बगल सटाकर फूंकने, दफनाने की नौबत। प्रायः हर जगह चीत्कार। किसी-किसी परिवार में तो ऐसी भी नौबत कि रोनेवाला भी नहीं। इन पंक्तियोें के लेखक के निकट संबंधी पति-पत्नी भी इस बार कोरोना की भेंट चढ़ गए।

प्रकृति की अनेकानेक नेमतों से सजे-संवरे झारखंड का हाल यह कि राज्यपाल, सांसद, कई विधायक, दर्जन भर आइएएस अधिकारी, खुद डीजीपी, दो सौ से अधिक पुलिसकर्मी, अकेले राजधानी क्षेत्र रांची के सदर अस्पताल के 13 डाॅक्टर, अनेक पत्रकार कोरोना प्रभावित पाए गए। राज्य के छह पत्रकार तो काल कवलित भी हो गए। रांची रेल मंडल के डीआरएम सहित सैकड़ों कर्मी भी पाॅजीटिव हुए। अनेक कर्मी असमय मृत्यु का ग्रास बनने को अभिशप्त हुए। देश भर में आॅक्सीजन एक्सप्रेस चला रही रेलवे के रांची स्थित मंडल अस्पताल में वेंटीलेटर तक की सुविधा नहीं। बड़ी-बड़ी डींगें हांकने वाला रेल महकमा इस खबर से अनजान क्यों है? पिछली लहर में बुरी तरह प्रभावित एक मंत्री चंगा होकर चेन्नई से हाल ही में लौटे हैं। उसी काल में एक अन्य मंत्री का इंतकाल हो गया। कम से कम इन्हीं दो घटनाओं को नजीर मानकर सेहत महकमे ने काम किया होता तो आज की विषम परिस्थिति शायद इतनी विकराल न होती। इस महकमे की दूरदर्शिता यह कि इसने पिछले बजट के सापेक्ष इस बार 138 करोड़ की हद तक बजट कम कर दिया।

कतिपय अन्य राज्यों की तरह प्लेन से आनेवाले यात्रियों को हवाई अड्डे पर ‘कोविड निगेटिव’ प्रमाणपत्र दिखाने या वहीं मौके पर ही कोरोना जांच की व्यवस्था नहीं होना उतना ही हैरतअंगेज है, जितना अन्य राज्यों से रेल से आनेवाले लोगों की शतप्रतिशत जांच न होना भी। पिछली बार तो ऐसा नहीं था। ऐसे यात्री अपने मुकाम तक जाकर कोरोना का प्रभाव विस्तार करने का कारक बनेंगे। एक यह भी कारण है कि इस बार कोरोना गांव-देहातों तक पैठ बना रहा है। राज्य में कोरोना जांच की मुकम्मल व्यवस्था तक नहीं हो सकी है। पांच-पांच, छह-छह दिन का विलंब निश्चय ही घातक है। हो रही जांच के सापेक्ष 19 प्रतिशत का ‘पाॅजीटिव’ मिलना खतरा बढ़ने का संकेत है। ऐसे ही पिछले वर्ष के पीक से इस बार हर दिन मिलनेवाले मरीजों का औसत दूने की हद तक जा पहुंचा है।

स्वास्थ्य सचिव के पद पर वरिष्ठतम आइएएस
अधिकारियों में से एक अरूण कुमार सिंह

कोढ़ में खाज की तरह दवा और आवश्यक उपकरणों की जमाखोरी और उनकी खुलेआम ब्लैकमार्केटिंग चिंता का विषय है। शुक्र है कि स्वास्थ्य सचिव के पद पर वरिष्ठतम आइएएस अधिकारियों में से एक अरूण कुमार सिंह की पदस्थापना के बाद से ऐसे लोगों पर केस-मुकदमा और धर-पकड़ का सिलसिला शुरू कर दिया गया है। राज्य सरकार ने कोरोना के इलाज के लिए निजी अस्पतालों को तीन कैटगरी में बांटकर छह हजार से बारह हजार प्रतिदिन का दवा समेत शुल्क तय कर दिया था लेकिन कौन मानता है? ऐसे अस्पतालों में बड़े-बड़े लोगों के पैसे लगे हैं, सो वे मनमानी से बाज कहां आ रहे हैं?

एक अस्पताल ने तो एक दिन का एक प्रभावित से डेढ़ लाख तक वसूल लिया। हायतौबा मचने पर उसने रकम लौटा दी। ऐसे व्यवसायियों से लाख गुना बेहतर वह मामूली आॅटो चालक रवि अग्रवाल है, जो कोरोना पीड़ितों को मुफ्त अस्पताल पहुंचाने की जवाबदेही उठाए हुए है। ऐसे ही रांची के मशहूर रिफ्यूजी मार्केट ने स्वतःस्फूर्त लाॅकडाउन कर और चेंबर आॅफ काॅमर्स ने लाॅकडाउन की वकालत कर जनचेतना का अच्छा उदाहरण पेश किया। सीख पूर्व प्रभारी मुख्य सूचना आयुक्त हिमांशु शेखर चैधरी से भी लेनी चाहिए, जिन्होंने 27 अप्रैल को अपने मि़त्रों संग मिलकर रिम्स को 60 पेडस्टल पंखे उपलब्ध कराया। कोरोना के कारण एसी न चलने से मरीज इस गर्मी में बेहाल थे। उनके कानों तक बात गई तो उन्होंने जो कदम उठाया, वैसे ही अन्य सक्षम नागरिक कुछ-कुछ भी करें तो बहुत कुछ हो जाएगा।

कहने की बात नहीं कि रामसेतु के निर्माण में गिलहरी ने पूंछ से बालू डालकर जो प्रयास किया था, उसको राम ने बहुत सराहा था। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 29 अप्रैल तक ‘स्वास्थ्य सुरक्षा सप्ताह’ अभियान के तहत लाॅकडाडन जैसी जो घोषणा की, वह भी अच्छा कदम था लेकिन जो हालात हैं, उनमें इसको और कठोर रूप में विस्तारित करने की जरूरत महसूस होती है।

हाल के दिनों में ऐसा लगता है कि पिछली बार की तरह मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कोरोना पीड़ितों को राहत देने की कमान खुद संभाल ली है। वे स्वयं अतिरिक्त बेड की व्यवस्था कराने से लेकर अन्य मामलों में सक्रिय हस्तक्षेप करने लगे हैं। उन्होंने इस बावत रक्षा मंत्री संग खतोकिताबत की और सैन्य अधिकारियों संग बैठक कर नामकोम के सैन्य अस्पताल में कोरोना प्रभावितों के लिए अतिरिक्त बेड व अन्य सुविधाओं की बहाली करायी। इसी प्रकार इटकी स्थित बंद टीबी सेनोटेरियम में विजीट कर वहां कोरोना बेडों का इंतजाम कराने का उपक्रम किया। इसी प्रकार राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स में अतिरिक्त तीन सौ बेड का इंतजाम करा रहे हैं।

रांची और जमशेदपुर को कोविड सर्किट मुख्यालय बनाकर दस जिलों को इससे उन्होंने जुड़वाया ताकि इन दोनों शहरों पर कोरोना बेड का बोझ कम किया जा सके। इस व्यवस्था पर काम भी शुरू हो गया। कोविड सर्किट नीति के तहत शताधिक मरीजों को आॅक्सीजन बेड मुहैया कराये जा चुके हैं। मुख्यमंत्री अगर जिलों के प्रभारी मंत्रियों को उनके जिलों की क्लोज माॅनिटरिंग के लिए प्रेरित करें तो निश्चय ही अपेक्षाकृत बेहतर परिणाम आएंगे। जिस प्रकार रांची सदर अस्पताल की नर्सें पिछली घोषणाओं पर अमल करने और अपनी सुविधाएं बढ़वाने के लिए तीन दिनों से हड़ताल पर हैं और सचिवालय सेवा संघ ने सेल्फ लाॅकडाउन का निर्णय लिया, यह वर्तमान परिस्थितियों में मानवता की रक्षा के संकल्प से हटकर है लेकिन संबंधित एजेंसियों को अतिरिक्त सक्रियता दिखाते हुए इसका तत्काल हल तो निकालना ही चाहिए।

निश्चय ही मेडिकल स्टाफ चाहे वे बड़े डाॅक्टर हों या नर्सिंग स्टाफ या पारामेडिकल कर्मी, पुलिस और सिविल सेवा के अधिकारी-कर्मी इस अत्यंत विषम परिस्थिति में अपनी जान पर खेलकर कार्य कर रहे हैं। उनको विश्वास में लेकर प्रोत्साहित किया ही जाना चाहिए। मुख्यमंत्री ने हर स्तर के मेडिकल कर्मियों को एक महीने का अतिरिक्त वेतन इंसेन्टिव के बतौर देने की घोषणा कर उचित कदम उठाया है लेकिन ‘ट्रेसिंग, टेस्टिंग और ट्रीटमेंट’ की गति फौरन से पेश्तर बढ़ाने की जरूरत बनी हुई है। अंतिम बात यह कि शासन-प्रशासन, अस्पताल और बाजार के संग-संग राज्य की सवा तीन करोड़ आबादी की यह महती जवाबदेही है कि वह कोरोना नियंत्रण में भागीदार बने। जो इतना भी नहीं कर सकता वह कम से कम ‘कैरियर’ बनने का अभियोग अपने पर न ही ले।

तमाम इंतजामात के बावजूद यह सोचना संभवतः बेमानी होगा कि कोरोना की यह अंतिम लहर है। इसके बाद भी यह हमला कर सकता है क्योंकि वाॅयरस म्यूटेट कर रहा है। जैसा कि नीति आयोग ने आगाह किया है, घर में भी मास्क पहनकर रहें, यह बताता है कि यह विभीषिका कुछ और रूप ले सकती है या ले रही है। इसलिए सरकार और सभ्य समाज को बहुत सुचिंतित कदम उठाना होगा और राज्य/देश को किसी भी विषम परिस्थिति के लिए तैयार रखना होगा। अभी ही तो पिछली बार के सापेक्ष दूने से अधिक आॅक्सीजन की जरूरत पड़ रही है तो यह सोचते हुए भी कि आगे अच्छी सूरत बन सकती है, युद्ध स्तर पर तैयारी करने की आवश्यकता है। कहने की बात नहीं कि अपनी संघीय व्यवस्था के तहत चाहे केंद्रीय सरकार हो या राज्य सरकारें ने, सबने जन स्वास्थ्य और शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने के नाम पर केवल तिलिस्म ही रचा। बहुत समय हम गवां चुके हैं लेकिन बतर्ज ‘जब जागे तभी सवेरा’ अभी भी चेत जाएं और इन दो महकमों को ही सुदृढ़ कर दें तो आनेवाली पीढ़ियां हमें कोसेंगी तो नहीं कम से कम।

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