Jharkhand/Bengal Election Update : कोरोना-आपदा में अवसर, किनके लिए

फर्ज करिए कि 17 अप्रैल को होनेवाले उपचुनाव में मधुपुर से झामुमो के हफीजुल अंसारी विजयी हो जाते हैं या कि भाजपा के गंगा शरण सिंह या अपने बूते दम आजमा रहे अशोक ठाकुर तो मानवता पर आफत बनकर टूटा कोरोना-2 काल किसके लिए अवसर होगा? जनाब अंसारी जीत जाते हैं तो अपने मरहूम अब्बाजान हाजी हुसैन अंसारी की विरासत बचाने में न केवल कामयाबी का सेहरा पहनेंगे, बल्कि उनकी ललबतिया भी बरकरार रहेगी क्योंकि उनकी स्वदलीय सरकार ने दो महीने पहले बिना विधायक रहते उनको मंत्री बना दिया था। सिंह महोदय यदि विजयी होते हैं तो भाजपा इतराती फिरेगी क्योंकि वह साल भर में हुए दो उपचुनावों में कोई करिश्मा न दिखा सकी। ठाकुर के हाथ यह अवसर लगता है तो उनका सीना 56 इंच का कहलाएगा। जीत कर तीनों विधायक ही होंगे लेकिन सबके मान छोटी कक्षाओं की परीक्षा के निर्देश सभी प्रश्नों के मान बराबर हैं’ जैसे नहीं होंगे।

मंगलवार यानी 6 अप्रैल की रात सरकार की ओर से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आफती कोरोना के ताजा वैरियंट से बचाव के लिए कई हिदायतें जारी की थी। स्कूल, कॉलेज बंद, जुलूस, धरना-प्रदर्शन, प्रदर्शिनी इत्यादि बंद, शादी-विवाह और ऐसे बड़े काज-प्रयोजनों में अति उत्साह में भीड़ जुटाने पर पाबंदी आदि-आदि। … लेकिन मधुपुर उपचुनाव में लगी आचार संहिता के सामने कोरोना संहिता किन-किन रूपों में जारी रहेगी, कहा नहीं जा सकता।

अपने देश में चुनाव महापर्व है। इसमें किसी की दाल नहीं गलती। यदि गलती तो जिन तीन राज्यों असम, केरल, तमिलनाडु और केंद्र शासित पुडुचेरी में चुनाव की अनिवार्य शर्त मतदान पूरा हुआ है, वहां भी कोरोना नामक महासंकट की कुछ तो चर्चा होती। अपने मधुपुर से कुछ ही दूर सटी पश्चिम बंगाल की सीमा समेत उसके अंतिम मुहाने बांग्लादेश की सीमा तक इस अतिसंक्रामक वैश्विक महामारी का कुछ तो असर बताया जाता।

मधुपुर बेचारा बहुत छोटा क्षेत्रफल है, पश्चिम बंगाल, केरल, असम के विस्तृत पाट पर जाकर बड़े-बड़े स्वनामधन्य नेता भीड़ जुटाने से कुछ तो परहेज करते। इसके ठीक उलट वहां का परिदृश्य यही रहा कि लाखों की संख्या में फलां मैदान में जुटिए, अपने महामान्य का भाषण सुनिए और लाभ उठाइए।

कैसा लाभ? उनको सत्ता देने का लाभ और क्या! आपकी हथेलियों पर फिर तो वही आएगा, मांगो, मांग पूरी न हुई तो सत्याग्रह करो और नहीं तो अगले चुनाव का इंतजार करो, हालांकि उक्त पांच राज्यों में चुनाव मुद्दों से दूर हटकर ‘दीदी और दादा’ जैसे जुमलों पर ही केंद्रित रहा। इसलिए कम से कम ऐसे सभी स्थानों पर यह कोरोना काल अवसर के रूप में अपने माननीय-सम्माननीय नेताओं के लिए ही है। बाकी जनता जनार्दन है, जो हमेशा दाता की ही भूमिका में रहती है। ऐसा दाता जनार्दन जो केवल दांत चिहारे रहता है।

कई बड़े वाहनों के पीछे लिखी चेतावनी छूले तो गेले बेटा’ की तर्ज पर कोरोना-2 आगाह कर रहा है कि इससे बचें। इसके आंकड़े भीषण भयावह हैं। पिछले वर्ष कोरोना-1 काल के शुरुआती 116 दिनों में झारखंड में इससे संक्रमित 7, 863 मरीज मिले थे, जबकि अबकी मर्तबा 7 अप्रैल तक 15 दिनों में ही 9, 407 लोगों तक संक्रमण पहुंचने की खबर है। पिछली बार भी मार्च 2020 के अंत में राज्य में कोरोना बिस्फोट हुआ था। इस मर्तबा भी 15 दिन पहले 24 मार्च से इसका आक्रमण शुरू हुआ।

सबसे बुरा हाल राजधानी रांची का है, जहां हर दिन राज्य के कुल संक्रमितों के सापेक्ष औसतन आधे लोग प्रभावित हो जा रहे हैं। भारत भूमि का हाल यह कि कोरोना-1 काल को काफी पीछे छोड़ते हुए अब 24 घंटे में संक्रमित होनेवालों की तादाद सवा लाख पार करने लगी है। हैरानी की बात कि उक्त पांच चुनावी राज्यों की स्थिति फिलवक्त सबकी नजरों से ओझल रही।

पिछली बार जब देश भर में कोरोना वायरस जनित कोविड-19 का संक्रमण बढ़ा था, तो केंद्र सरकार ने लगभग 21 लाख करोड़ का सहायता पैकेज’ जारी किया था। इसमें से किसको कितनी सहायता मिली, यह लाभान्वित ही जानें लेकिन हर उपयोगी जिन्स की कीमत जरूर बढ़ गई। इस बार मार्च  की अंतिम रात छोटी बचतों पर मिलनेवाले ब्याज पर गाज गिरायी गई लेकिन सुबह होते-होते वह अधिसूचना ओवरसाइट’ होने की बात कहते हुए वापस ले ली गई। क्या पता, यह फरमान कोरोनायी अंदाज में जुलाई में हाजिर-नाजिर हो ही जाए।

अभी बंगाल आदि के चुनावी मौसम में जहांपनाह ने सोचा हो, थोड़े दिनों के लिए बूढ़े और मध्यम वर्ग खुश हो लें तो क्या बुरा है। बहरहाल, जिस तेजी  और मारक अंदाज में कोरोना-2 का संक्रमण फैल रहा है, उसकी परिणति किस रूप में होगी, यह कहना मुश्किल है। जाहिर बात है कि हर आफत-विपदा में निम्न और मध्यम वर्ग के लोग ही ज्यादा से ज्यादा प्रभावित होते हैं, जबकि अपने देश-समाज में एक तबका ऐसा भी है, जिसके लिए ऐसा कुसमय अवसर बन जाता है।

इस कोरोना काल ने भी यही साबित किया है। अडानियों और अंबानियों की संपति-परिसंपत्ति दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से इसी काल में बढ़ रही है, जबकि 130 करोड़ में से 80 करोड़ आबादी मुफ्त अनाज के लिए लाइन लगाए खड़ी है। बिचबीचवा वाले अपनी हाड़तोड़ मिहनत की कमाई बैंकों में रखकर 4-5 प्रतिशत ब्याज के लिए भी तरस रहे हैं।

इस आफत काल के आईने में मधुपुर उपचुनाव को भी देखना ही होगा। चूंकि राज्य और देशहित में वोट डालना आवश्यक है, यह हर नागरिक का पवित्र कर्तव्य और अधिकार भी है। इसलिए वोट जरूर डालें लेकिन कोरोना संहिता का पालन करते हुए। समझदारी इसी में है, भलाई भी इसी में है। जिनके लिए यह काल अवसर हो सकता है, वे न तो कोई चूक करेंगे, न ही उनके आकाओं द्वारा कोई चूक करने दी जाएगी, जबकि जो किसी भी किस्म से असमर्थ हैं, उनको तो अपना दामन बचाकर ही काम करना होगा।

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