Country wise Agitation Started for Liberation of Hindu Temples : देश में मंदिर-मठों की मुक्ति के लिए शुरू हुआ आंदोलन, जो लेगा एक विशाल रूप

सर्जना शर्मा

नवबंर के चौथे सप्ताह में उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में राज्य सरकार के मंत्रियों के आवास के सामने एक अलग तरह का धरना दिया गया। देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड के तीर्थों के पुरोहितों ने चार धाम देवस्थानम बोर्ड भंग किए जाने की मांग को लेकर शीर्षासन किया। भाजपा सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ही देवस्थानम बोर्ड के गठन की घोषणा की थी। त्रिवेंद्र सिंह रावत अब कुर्सी पर नहीं रहे, लेकिन उनके फैसलों का घोर विरोध जारी है और मांगें पूरी न होने तक तीर्थ पुरोहित अपना आंदोलन जारी रखेंगे।

इधर, देश की राजधानी दिल्ली में कालका जी मंदिर के महंत सुरेंद नाथ अवधूत की अध्यक्षता में साधु-संतों और महंतों ने दिल्ली में किसानों की तरह लंबे धरने की चेतावनी दे डाली है। शस्त्र और शास्त्र की परंपरा वाले देश के साधु-संत यदि शस्त्र उठाने की बात कहने लगें तो विषय बहुत गंभीर है।

वास्तव में संत समाज और हिंदू समाज मंदिरों और मठों पर सरकारी कब्जों, सरकार की मनमानी, मंदिर के पैसों का दुरुपयोग करने से बहुत आहत, परेशान और दुखी हैं। देशभर में चार लाख से भी ज्यादा ऐसे मंदिर हैं जो सरकारी नियंत्रण में हैं। दक्षिण भारत में तो सभी बड़े मंदिर सरकारी कब्जे में हैं। यहां तक कि राजघरानों के मंदिरों को भी राज्य सरकारें अपने कब्जे में लेती रही हैं। केरल के पद्मनाभम् मंदिर के लिए त्रावणकोर राजघराने को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी और अंत में सुप्रीम कोर्ट में आकर राजघराने की जीत हुई।

लेकिन अनेक बड़े मंदिर अब भी सरकारी कब्जे में हैं। तमिलनाडु के प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिरों में देव प्रतिमाओं के सुंदर और भारी-भरकम गहनों को सरकार अपने कब्जे में लेकर सोने के बिस्कुट बनवाना चाहती थी। जिसे तमिलनाडु के हिंदू समाज और हिंदू संगठनों ने बड़ा मुद्दा बनाया, अदालत का दरवाजा खटखटाया और अदालत ने तमिलनाडु सरकार के फैसले पर रोक लगा दी।

प्रश्न ये है कि जिस देश के संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष सरकार की बात हो उसके प्रांतों की सरकारें मंदिरों पर कब्जा कैसे कर सकती हैं? मंदिर में आए दान से अपनी तिजोरी कैसे भर सकती हैं? सरकारी अफसरों की नियुक्ति मंदिरों में कैसे कर सकती हैं? फिर दूसरा बड़ा प्रश्न ये है कि यदि धर्मस्थानों पर सरकार को कब्जा करना ही है तो फिर केवल सनातन मंदिर ही क्यों? मस्जिद, गुरुद्वारे या गिरिजाघर क्यों नहीं?

ये भी संविधान की सर्वधर्म समभाव भावना के विरुद्ध है। मंदिरों में गैर हिंदू अधिकारियों की नियुक्ति क्यों, क्या मस्जिदों, गुरुद्वारों और गिरिजाघरों की प्रबंधन समितियों में किसी हिंदू की नियुक्ति की जा सकती है? बिल्कुल नहीं। केवल हिंदू मंदिरों और हिंदू भावनाओं के साथ ही खिलवाड़ क्यों? यदि आपको ये समझना है तो समझना पड़ेगा अंग्रेज शासकों की उस कुटिल चाल को जिसके बहाने वो भारत की प्राचीन संस्कृति को छिन्न-भिन्न कर देना चाहते थे।

सांस्कृति, सामाजिक और आर्थिक रूप से समृद्ध समाज का ताना-बाना तोड़े बिना पश्चिमी शिक्षा पद्धति को थोपना संभव नहीं था। अंग्रेज शासक मुस्लिम आक्रमणकारियों से अलग मानसिकता के लोग थे। पहले मुगल आक्रंताओं ने, फिर मुगल शासकों ने मंदिरों को न केवल तोड़ा, सारी संपत्ति लूटी और वहां जबरन मस्जिदें बनवा दीं। लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी के गोरे शासक बहुत कुटिल थे। उन्होंने मंदिर तोड़कर गिरिजाघर तो नहीं बनवाए, लेकिन बहुत चालाकी से कानून बनाकर मंदिरों की दौलत अपने कब्जे में कर ली। मंदिर की मूंर्तियां और इमारतें वे ले जा नहीं सकते थे, इसलिए अपने कब्जे में कर लिया।

1817 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने मद्रास रेगुलेशन ला कर मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण कर लिया। लेकिन ईसाई मिशनिरियों ने विरोध किया तो मंदिर हिंदुओं को लौटा दिए गए। जब आजादी का बिगुल बजा और देश भक्तों और क्रांतिकारियों की सभाएं मंदिरों में होने लगीं तो 1925 में मद्रास रिलिजियस और चेरिटेबल एंडवामेंट अधिनियम लाया गया। देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद इसका नाम हिंदू रिलिजीयस और चैरिटेबल एंड एंडवामेंट एक्ट कर दिया गया, जो आज तक चल रहा है।

सुप्रसिद्ध आधुनिक धर्म गुरु जग्गी वासुदेव ने हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण के विरुद्ध अलख जगानी शुरू की। अपने लेखों में वे हिंदुओं से आह्वान कर रहे हैं कि वे अपनी धार्मिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करें, नेताओ को बताएं कि जब तक उनके मंदिर उनको वापस नहीं मिलेंगे, तब तक किसी को वोट नहीं दिया जाएगा। वे कहते हैं कि आज़ादी के अमृत महोत्सव वर्ष में हिंदू समाज को एकजुट हो जाना चाहिए। जब 74 वर्ष में अपने तरीके से अपने धर्म को मानने की आज़ादी हिंदुओं को नहीं मिली तो कैसी आज़ादी? जग्गी वासुदेव तमिलनाडु सरकार के हिंदू मंदिरों पर लिए गए फैसलों से बहुत व्यथित हैं। उनका कहना है मंदिरों को हिंदू समाज को लौटाने के लिए एक आयोग का गठन किया जाना चाहिए और धीरे-धीरे एक प्रकिया तय करके मंदिर समाज को लौटा दिए जाएं।

विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार कहते हैं कि जन जागरण के माध्यम से ही मंदिरों को उनके पुराने स्वरूप में लौटाया जा सकता है। जैसे समाज ने राम जन्मभूमि आंदोलन चलाया, वैसे ही समाज ही इसके लिए राह निकालेगा। विहिप क्यों नहीं कोई आंदोलन करती ये पूछे जाने पर आलोक कुमार कहते हैं कि विहिप क्या है, विहिप हिंदू समाज से ही बनी है। अब हिंदू और संत समाज जागरूक हो रहा है। विहिप के मार्गदर्शक मंडल की बैठक में इसी साल अप्रैल में, फिर बोर्ड ऑफ ट्रस्टी की बैठक में जुलाई में, अखिल भारतीय संत समाज की बैठक में हिंदू मंदिरों और मठों को सरकारी नियत्रंण से मुक्त करने की मांग उठायी गयी है। केंद्र सरकार से भी संत समाज मांग कर रहा है। आलोक कुमार कहते हैं कि मंदिर भारत की समृद्ध संस्कृति, कला, संगीत, गायन, वादन, शिक्षा, सुख-दुःख बांटने, आध्यात्म, भक्ति, धर्म का केंद्र होते थे।

समाज में जब कोई लड़ाई-झगड़ा हो जाता था तो उसका फैसला समाज मिलकर मंदिर के प्रांगण में करता था। मंदिर के पुरोहित और मंहत जी की भी इसमें अहम भूमिका होती थी। मंदिरों के पास बहुत धन-सोना-चांदी होता था, हर मंदिर के साथ एक पाठशाला, एक गौशाला होती थी। मंदिरों के लिए राजा-रजवाड़े, धनी वणिक दान देते थे, जमीन, सोना-चांदी, हीरे-जवाहारात देते थे। जब ब्रिटिश शासकों ने देखा कि मंदिरों का प्रभाव समाज पर बहुत ज्यादा है और ये शक्ति के केंद्र हैं तो उन्होंने सबसे पहले मंदिरों की शक्ति कम करने का षड्यंत्र रचा। मंदिर कभी भी दलित अथवा ओबीसी के लिए वर्जित नहीं थे। पूरे समाज का बराबर का अधिकार था मंदिरों पर।

विहिप नेता आलोक कुमार कहते हैं कि मंदिरों को अपने कब्जे में लेने मात्र से ही उनका काम नहीं चल सकता था, मंदिर चलाने के लिए पैसा भी मंदिरों से ही लेना शुरू कर दिया, सरकार की ओर से नियुक्त किए गए अधिकारी का वेतन भी मंदिर से ही लिया जाता। खाते ऑडिट कराने की फीस भी मंदिर के कोष से ही जाती थी। नियुक्त किया गया अफसर हिंदू है या नहीं, वो हिंदू धर्म के बारे में जानता है या नहीं, इसकी उनको कोई चिंता नहीं थी। अब प्रश्न ये भी है कि यदि सरकार मंदिर हिंदुओं को वापस करे भी तो किसको करे, इसी पर विश्व हिंदू परिषद और अन्य धार्मिक संस्थाएं काम कर रही हैं।

केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश में हिंदू समाज और साधु-संत कई बरसों से अपना आंदोलन चला रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि हिंदू मंदिरों और मठों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाए। अन्य राज्यों में भी मांग जोर पकड़ने लगी है। एक धर्म निरपेक्ष देश में सरकार का काम न तो मंदिर बनवाना है, न ही उनको चलाना है जैसे बाकी धर्मों के लोग अपने धर्म स्थानों का प्रबंधन स्वयं कर रहे हैं, उसी तरह हिंदुओं को भी अपने धर्म स्थान अपनी तरह से चलाने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

यदि इस दिशा में केंद्र सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो हो सकता है दिल्ली में संतों और साधुओं की फौज नज़र आए और यदि कहीं नागा साधु भी आ गए तो क्या होगा! ये लड़ाई भी लंबी चलेगी या तो सभी धर्मस्थलों पर समान रूप से कानून लागू होना चाहिए वरना मस्जिद, गुरुद्वारों और गिरिजाघरों की तरह मंदिरों और मठों को भी सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाना चाहिए।

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