Deepawali : अंधकार पर प्रकाश की विजय का महापर्व है दीपावली

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दीपावली हर साल आती है और खुशियां लाती है। इस ज्योति महापर्व को सभी खुशीपूर्वक मनाते हैं। दीप जलाते हैं। विधिवत् लक्ष्मीपूजन भी इस सुअवसर पर सभी करते हैं। आखिर में दीपावली क्यों मनाते हैं? दीप क्यों जलाते हैं ? लक्ष्मीपूजन पारंपरिक तौर पर विधिवत् क्यों करते हैं ? इस पर क्या हमने स्थिर मन से कभी सोचने-समझने की कोशिश की है ? यह सबके समक्ष एक गूढ़ प्रश्न है। इस गूढ़ प्रश्न के हल में ही समष्टि व व्यष्टि के कल्याण व लाभ का सूत्र निहित है, समाहित है और मानव जीवन की सार्थकता व सिद्धि का उपाय भी प्राप्त होने वाला है।

अगर हम इस लोक महापर्व की महत्ता को जानना चाहते हैं तो थोड़ी चिंतन की गहराई में उतरने की आवश्यकता है। फिर जीवन के सभी अनसुलझे प्रश्नों का व्यौरा पन्ने-पन्ने पर पढ़ते देर न लगेगी। वहीं से अपने जीवन का नूतन इतिहास रचने, तकदीर को नये सिरे से लिखने की ख्वाहिश, तमन्ना अंत:करण में जागृत होगी और हम अपने आप में साधारण, तुच्छ नहीं रहेंगे। आप ही सृष्टि में प्रधान नेतृत्वकर्ता होंगे। आपकी स्थिति महान तत्ववेत्ता, मार्गदर्शक व प्रणेता की होगी। साथ ही आप ही जन-जन के हृदय में दीप प्रज्वलित करने वाले होंगे। उनकी सुषुप्ति को जागृति में बदल देंगी। उनकी जड़ता को समाप्त करके चेतना को जागृत करेंगे। सिर्फ चेतना की जागृति ही तो है दीप प्रज्वलन।

दीप प्रज्वलन यानि अंधकार को दूर करना और प्रकाश को फैलाना। हम नित्य दिन दीया जलाते हैं। प्राणदाता भुवन भास्कर के प्रकाश में जीवन जीते हैं और प्रकाश से दूर रहते हैं तथा अंधेरे में कामना, वासना, मोह-माया, लोभ-मोह की जंजीर में जकडे़ भटकते रहते हैं। हमारी चेतना सुषुप्त पड़ी रहती है। जीवन की वास्तविकता से अपरिचित रहते हैं। नाखुश, उदास, दु:ख, संताप, चिंता भरा जीवन जीते रहते हैं। इसी घनियारे अंधेरे से उजाले की ओर बढ़ने का नाम है दीवाली। यह मात्र दीवालों की साफ-सफाई, रंगाई-पुताई तक सीमित नहीं है। पटाखे उड़ाकर वातावरण को प्रदूषित करके खुशियां मनाने का शुभ दिवस नहीं है।

मां लक्ष्मी-गणेश का पूजन करके धन वृद्धि की अभिलाषा व कामना पूर्ण करने के लिए लड्डू वितरण करने व खाने का सिर्फ दिवस नहीं है। इसके मुख्य तत्वदर्शन व प्रेरणाओं को आत्मसात् करके जीवन में उत्कृष्टता उत्पन्न करके सृजनात्मक खुशमय जीवन जीते हुए जगत् को अपने सत्कर्मों व पुरुषार्थ के बदौलत जगमगाने के लिए आत्मिक भाव से संकल्पित होने का दिवस है। दु:ख-संताप से निकलकर खुशी, हर्षोल्लास को जीवन में प्रतिष्ठित करना, सुषुप्ति से जागृति की ओर पग बढ़ाना, जड़ता से चेतना की जागृति की शिखर यात्रा करना, दीवाली की घनी अंधेरी अमावस्या की रात्रि की तरह आंख से अंधा न रहकर दीपावली की दीपज्योति की प्रखरता, उजाला, पुरुषार्थ को धारण करके मन की आंखें खोलना, पशुता नहीं देवत्व भरा जीवन जीना, जीवन की गौरव-गरिमा को समझना है दीप-प्रज्वलन के शुभ कृत्य से। अंदर के अंधेरा को भगाना और आत्मा के बुझे दीप को जलाकर अंदर दिव्य आलोक को उजाला को धारण करना ही प्रमुख रूप से दीपावली पावन महापर्व का सत्य-धर्म प्रेरणा है, जिससे जीवन के सत्य का बोध हो सके और हम बद्ध से बुद्ध के जीवन की सत्यता को आत्मसात् करें।

अंधेरे में कुछ दिखता नहीं है, प्रकाश में सब कुछ नजर आता है। अत: दीपावली का प्रज्वलित दीप जीवन के सत्य का बोध कराता है कि तुम भी दीप की तरह से जलो, सोये नहीं रहो। तिल-तिलकर जलकर दीप की तरह आलोक जग में फैलाओ ताकि जग में कहीं अंधेरा न रहें। इस प्रकाश को देखकर मन हर्ष से गद्गद् हो जाये और सत्कर्मों को करने व सुगंधि फैलाने के लिए मन आतुर हो जाये। कहीं दु:ख-संताप का साया जीवन को कुंठित नहीं कर पाये। प्रेम की, आनंद की रसधारा हृदय में बह चले और दीपावली के शुभ अवसर पर हम प्रेम, आनंद से लक्ष्मी-गणेश व समस्त देवताओं को आदर-सत्कार समर्पित भाव से कर सके और देवत्व को धारण कर लें। जीवन खुशी-खुशी जी सके और अन्यों को प्रेरित कर सकें जीने के लिये। अत: दीपावली अंधकार पर प्रकाश के, बुराई पर अच्छाई के, अधर्म पर धर्म के, असत्य पर सत्य के युद्ध में विजय का पावन शुभ राष्ट्रीय लोक महापर्व है।

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