Dhanteras : सुख-समृद्धि की कामना का महापर्व है धनतेरस

Insightonlinenews Desk

धनतेरस को धन त्रयोदशी भी कहा जाता रहै। धनतरेस के दिन से ही दिवाली के त्योहार की शुरुआत होती है। इस साल यह त्योहार 2 नवंबर को मनाया जा रहा है। इस दिन धन के देवता कुबैर, माता लक्ष्मी की पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि माता लक्ष्मी इस दिन समुद्र मंथन के दौरान धन और सोने से भरा कलश लेकर प्रकट हुईं थी। यही नहीं इस दिन आयुर्वेद के जेवता धनवंतरी की पूजा भी की जाती है। इस दिन लोग अपने घर में औऱ बाहर दिया जलाते हैं। इस दिन लोग सोना-चांदी, धातु की चीजें आदि खरीदते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन शुभ मुहूर्त में खरीदी हुई चीजें अक्षय फल देते हैं।

पौराणिक व धार्मिक मान्यतानुसार भगवान विष्णु के अवतार समझे जाने वाले धन्वन्तरी का पृथ्वी लोक में अवतरण समुद्र मंथन के समय हुआ था। शरद पूर्णिमा को चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी को कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धन्वंतरी, चतुर्दशी को काली माता और अमावस्या को भगवती लक्ष्मी जी का सागर से प्रादुर्भाव हुआ था। धन्वन्तरी ने इसी दिन आयुर्वेद का भी प्रादुर्भाव किया था । इसीलिये दीपावली के दो दिन पूर्व कार्तिक त्रयोदशी धनतेरस को आदि प्रणेता, जीवों के जीवन की रक्षा , स्वास्थ्य , स्वस्थ जीवन शैली के प्रदाता के रूप में प्रतिष्ठित तथा विष्णु के अवतार के रूप में पूज्य ऋषि धन्वन्तरी का अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है और आरोग्य, सेहत, आयु और तेज के आराध्य देवता भगवान धन्वंतरि का ॐ धन्वंतरये नमः आदि मन्त्रों से प्रार्थना की जाती है कि वे समस्त जगत को निरोग कर मानव समाज को दीर्घायुष्य प्रदान करें।

पुरातन धर्मग्रन्थों के अनुसार देवताओं के वैद्य धन्वन्तरी की चार भुजायें हैं। उपर की दोंनों भुजाओं में शंख और चक्र धारण किये हुये हैं। जबकि दो अन्य भुजाओं मे से एक में जलूका और औषध तथा दूसरे मे अमृत कलश लिये हुये हैं। इनका प्रिय धातु पीतल माना जाता है। इसीलिये धनतेरस को पीतल आदि अष्टधातु के बर्तन खरीदने की परंपरा प्राचीन काल से कायम है। आयुर्वेद की चिकित्सा करनें वाले वैद्य आरोग्य के देवता धन्वन्तरी ने ही अमृतमय औषधियों की खोज की थी। इनके वंश में दिवोदास हुए जिन्होंने शल्य चिकित्सा का विश्व का पहला विद्यालय काशी में स्थापित किया जिसके प्रधानाचार्य सुश्रुत नियुक्त किये गए थे। सुश्रुत दिवोदास के ही शिष्य और ॠषि विश्वामित्र के पुत्र थे, जिन्होंने सुश्रुत संहिता लिखी थी। सुश्रुत विश्व के प्रथम शल्य चिकित्सक अर्थात सर्जन थे। कहा जाता है कि शंकर ने विषपान किया, धन्वंतरि ने अमृत प्रदान किया और इस प्रकार काशी कालजयी नगरी बन गयी।

रामायण, महाभारत, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण, श्रीमद भागवत महापुराण आदि पुराणों और संस्कृत के अनेक ग्रन्थों में आयुर्वेदावतरण के प्रसंग में भगवान धन्वंतरि का उल्लेख प्राप्य है। आयुर्वेद के आदि ग्रन्थों सुश्रुत्र संहिता चरक संहिता, काश्यप संहिता तथा अष्टांग हृदय में विभिन्न रूपों में धन्वंतरि का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त अन्य आयुर्वेदिक ग्रन्थों भाव प्रकाश, शार्गधर तथा उनके ही समकालीन अन्य ग्रन्थों में आयुर्वेदावतरण के उधृत प्रसंगों में धन्वंतरि के संबंध में भी प्रकाश डाला गया है। कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास रचित श्रीमद भागवत पुराण में धन्वंतरि को भगवान विष्णु का अंश माना गया है तथा अवतारों में अवतार कहा गया है। गरुड़ और मार्कंडेय पुराणों के अनुसार वेद मंत्रों से अभिमंत्रित होने के कारण वे वैद्य कहलाए।

विष्णु पुराण में धन्वन्तरि दीर्घतथा का पुत्र बतलाते हुए कहा गया है कि धन्वंतरि जरा विकारों से रहित देह और इंद्रियों वाला तथा सभी जन्मों में सर्वशास्त्र ज्ञाता है। भगवान नारायण ने उन्हें पूर्व जन्म में यह वरदान दिया था कि काशिराज के वंश में उत्पन्न होकर आयुर्वेद के आठ भाग करोगे और यज्ञ भाग के भोक्ता बनोगे। इस प्रकार धन्वंतरि की तीन रूपों में उल्लेख मिलता है – समुद्र मन्थन से उत्पन्न धन्वंतरि प्रथम, धन्व के पुत्र धन्वंतरि द्वितीय और काशिराज दिवोदास धन्वंतरि तृतीय। भगवान धन्वंतरि प्रथम तथा द्वितीय का उल्लेख पुराणों के अतिरिक्त आयुर्वेद ग्रन्थों में भी कहीं-कहीं मिलता है।

धनतेरस 2021 तिथि और शुभ मुहूर्त

खरीदारी का शुभ मुहूर्त
अभिजीत मुहूर्त– सुबह 11:42 से 12:26 तक।
वृषभ काल– शाम 06:18 से 08:14: तक।

प्रदोष काल- शाम 05:35 से 08:14 तक।
गोधूलि मुहूर्त- शाम 05:05 से 05:29 तक।
निशिता मुहूर्त- रात्रि 11:16 से 12:07 तक।

दिन का चौघड़िया
लाभ- प्रात: 10:43 से 12:04 तक।
अमृत- दोपहर 12:04 से 01:26 तक।
शुभ- दोपहर 02:47 से 04:09 तक।

रात का चौघड़िया
लाभ- 07:09 से 08:48 तक।
शुभ- 10:26 से 12:05 तक।
अमृत- 12:05 से 01:43 तक।

धनतेरस पूजा मुहूर्त

धनतेरस मुहूर्त सुबह 06 बजकर 18 मिनट और रात दस से 08 बजकर 11 मिनट और 20 सेकेंड तक रहेगा। इस समय अवधि में धन्वंतरि देव की पूजा की जाएगी।

प्रदोष काल: 5 बजकर 35 मिनट और 38 सेकेंड से 08 बजकर 11 मिनट और 20 सेकेंड तक रहेगा। सूर्यास्त के बाद तीन मुहूर्त प्रदोष काल कहे जाते हैं, इसमें ही यमदेव यानी यमराज को दीपदान किया जाता है।

-Agency

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