गीता में भगवान श्री कृष्ण की व्याख्या, जीवन में योग कैसे करें

हम कुछ शारीरिक क्रियाओं को योग समझते हैं, परन्तु श्री मद्भगवद्गीता में अनगिनत श्लोकों में श्री कृष्ण जी ने योग की जो व्याख्या बताई, तो बचपन की गणित की कक्षा का स्मरण हो आया। गणित में जब प्रश्न हल करने के लिए दिए जाते तो लिखा होता था, इस एक अंक का दूसरे अंक में योग करके योगफल बताओ। जैसे 4 और 5 का योग करके योगफल 9 हो जाएगा। दो अलग-अलग अंक जुड़कर एक हो गए। दो एक समान वस्तुओं को एक कर देने का नाम ही योग है।

योग के लिए दोनों वस्तुओं का एक समान होना जरूरी है, अन्यथा वो अलग-अलग ही रहेंगे। जैसे a+a तो योग हो सकता है, किन्तु a+b का योग नहीं हो सकता। पानी का पानी में योग सम्भव है, परन्तु पानी में अगर तेल डाल दिया जाए तो दोनों अलग-अलग ही रहेंगे।

गीता में श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को कहा कि तू योगी हो जा। भाव यह आत्मा जो परम सत्ता परमात्मा से बिछड़ कर अलग है। इसे तत्व परमात्मा के साथ न जोड़कर ही तू योगी हो सकेगा।
आत्मा को परमात्मा का बोध करा कर योगी बनाने के लिए सत्गुरू ज्ञान चक्षु देकर, ज्ञान रूपी उजाला देकर अंधकार दूर करते हैं। गुरू गीता में कहा है।

अज्ञान तिमिर अन्धस्य, ज्ञान अजन श्लाक्या। मिलितम् येन चक्षु तस्मै श्री गुरूवे नमः।।

जिन्होंने दिव्य दृष्टि देकर ज्ञान के सुरमे की सलाई से अज्ञानता का घोर अंधकार दूर कर दिया। ऐसे गुरु को बार-बार नमस्कार।
गीता में श्री कृष्ण जी ने कहाः-

दिव्यम् ददामि ते चक्षु पश्य मे योगम् एश्वरम्। 11-8

मुझे ईश्वर में योग करके देखो मैं तुम्हें दिव्य चक्षु देता हूँ। अपनी आत्मा का ईश्वर से योग करने वाले को ही योगी कहा है। सम्पूर्ण अवतार वाणी में शहनशाह अवतार सिंह जी ने लिखाः-

ज्ञान गुरू दा, ना हरि दा, ज्ञान गुरू दा, योग वी ए।

गुरू का ज्ञान ही योग है, जो रूह का नाता परमात्मा से जोड़ देता है। सही मायने में यही योग, यही जुड़ाव आत्मा का परमात्मा से मेल कराके दोनों को एक कर देता है। फिर ये दो नहीं एक ही कहलाते हैं, जिसे कबीर जी ने कहाः-

राम कबीरा एक भए हैं कोए न सके पछानि

परमात्मा का जिसे बोध हुआ, उसने यहां तक कह दिया ‘‘अहम् ब्रह्म अस्मि’’ मैं ब्रह्म हूँ आदि ग्रंथ में भी लिखा है। ब्रह्म ज्ञानी आप निरंकार सम्पूर्ण अवतार वाणी में लिखा हैः-

जिस दे दिल निरंकारदा वासा।
हुंदा ए परमेश्वर आप।।

श्री मद्भगवद्गीता के छठे अध्याय के श्लोकों में बताया कि योगी किसे कहते हैं और जो परमात्मा में आत्मा का योग कर लेता है। वह योगी सबसे श्रेष्ठ है।

योगिनः यत-चितस्य युजतः योगम् आत्मनः। 6-19

योगी वह है, जिसका चित निरंकार (आत्मा) में लगा हुआ है। योगी सब दुखों से मुक्त हो जाता है और ब्रह्म परमात्मा का स्पर्श, एहसास सबसे अत्यन्त सुख समझता है। 6-28

यु×जन एवम् सदा आत्मानम् योगी विगत कल्मषः।
सुखेन् ब्रह्म-सस्पर्शम् अत्यन्तम् सुखम् अश्नुते।। 6-28
तपस्विम्यः अधिकः योगी ज्ञानिम्य अपि मतः अधिक।
कार्मिम्यः च अधिकः योगी तस्मात् योगी भव अर्जुन।। 6-47

योगी तपस्वि से अधिक, ज्ञानी जानकारियां रखने वाले से भी अधिक है और नेक कर्म करने वालों से भी अधिक योगी है। तुम ऐसे योगी होओ।
ऐसा सत्गुरू मिले जो सत्य परमात्मा का बोध करा दे और योगी बना दे, तो ये मनुष्य जन्म सफल माना गया है। अगले श्लोक में श्री कृष्ण जी ने कहा हैः-

योगिनाम् अपि सर्वेषाम् मत-गतेन् अन्तः आत्मना।
श्रद्धावान् भजते यः माम् सः मे युक्त-तमः मतः।। 6-47

योगियों में जो सब प्रकार से अन्र्तात्मा (प्रभु) परमात्मा में हीं लीन श्रद्धा सहित मेरी प्रेमाभक्ति में लगा रहता है, वह ही परमयोगी है।

योगाभ्यास क्रियाओं द्वारा तन को स्वस्थ रखने के सथ-साथ हमें यह भी कोशिश करनी चाहिए कि आत्मा को स्वस्थ रखने का जो उपाय गीता में और अन्य धर्म ग्रंथों में बताया है, उसे करें। शारीरिक योग के लिए जहाॅं हमें योग मारस्टर की आवश्यकता महसूस होती है। वही आत्मिक योग के लिए भी सत्गुरू मिल जाए तो फिर शिष्य कहता है।

एहसान जो कीते पूरे सत्गुर,
बदला नई चुका सकदा।
कहे अवतार गुरू दा करजा,
जनम जनम नई ला सकदा।।

चम्पा भाटिया
राँची।

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