Fractured Foot Played Well : भांगा पाएं खेला होलो

ऐतिहासिक मजदूर दिवस की अगली सुबह दो मई यानी बीते रविवार को कोविड के उफान के बीच देश के पांच राज्यों के चुनाव परिणाम सामने आये। 294 सीटों वाले पश्चिम बंगाल, 126 सीटों वाले असम, 234 सीटों वाले तमिलनाडु, 140 सीटों वाले केरल और 30 सीटों वाले पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव परिणाम प्रसारित करते-करते टीवी के खबरिया चैनल कोविड को एक तरह से भूल ही गए। देश-दुनिया की निगाहें इन पांच राज्यों में से पश्चिम बंगाल पर ही टिकी रहीं। स्वयं को अपराजेय मानने वाली मोदी-शाह की भाजपा ने बंगाल में अपनी पूरी ताकत झोंक रखी थी।

अबकी बार दो सौ पार नारे को हकीकत में बदलने में इस घोर दक्षिणपंथी पार्टी ने डेढ़ महीने तक जो हाइप क्रिएट किया था और जिस प्रकार भारतीय मीडिया उस पर फिदा था, उससे दूर के लोगों की दिलचस्पी बढ़ गई थी। दो मई की सुबह कुछ देर तक उसका तिलिस्म बना रहा था लेकिन जैसे-जैसे सूर्य का तापमान बढ़ता गया, वैसे-वैसे भाजपा का तिलिस्म टूटता गया। अंततः वह महज 76 सीटों पर आकर टिका, जबकि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी 214 सीटों के साथ अपार बहुमत पाने में सफल रही। आजादी के बाद पहले कांग्रेस और बाद में कम्युनिस्ट शासन वाले इस राज्य ने इन दोनों दलों का बैंड ही बजा दिया।

टीएमसी-भाजपा या यूं कहें ममता-मोदी की लड़ाई में वे कहीं दूर-दूर तक नहीं टिके। अलबत्ता अपनी जिद पर अड़ीं ममता कभी अपने ही परम सहयोगी रहे सुवेंदु अधिकारी के समक्ष नंदीग्राम के रणक्षेत्र में मामूली 1956 वोटों से हार गईं। वे खुद हारकर भी इस मायने में जीत गईं कि उनकी पार्टी ने प्रचंड बहुमत प्राप्त किया। इसी नंदीग्राम में चुनावी हलचल की शुरुआत में उनके पांव में चोट लगी थी। पूरे चुनावी समर में वे उसी चोटिल अवस्था में प्लास्टर चढ़वाये ह्विल चेयर पर बैठकर अपना अभियान चलाती रहीं। उन्हीं दिनों उन्होंने ‘खेला होबो’ घोषणा की थी। अब कहा जाना चाहिए ‘भांगा पाएं खेला होलो’। टूटे पांव से ही खेल कर दिया।

ममता के नेतृत्व में टीएमसी लगातार तीसरी बार सत्ता पाने में सफल रही। भाजपा ने उनके 37 एमएलए को तोड़कर अपना महत्व बताने की कोशिश की थी, लेकिन वह महज तीन को जितवा सकी। भाजपा को संभवतः 219 के लोकसभा चुनाव का मुगालता था कि वहां उसने 18 लोकसभा सीटें जीत ली थी और इस प्रकार उसने बंगाल की 121 विधानसभा सीटों पर बढ़त दर्ज की थी। वह शायद भूल गई कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में अंतर होता है और जहां-जहां क्षेत्रीय नेतृत्व ईमानदार और मजबूत है, वहां-वहां राष्ट्रीय दलों की दाल नहीं गलनेवाली। यही कारण है कि उसके द्वारा दिया गया नारा ‘दो मई, दीदी गई’ उल्टा पड़ गया और सामने आया ‘दो मई, भाजपा नहीं आ पाई’।

बंगाल के इस चुनाव में एक बड़ी बात यह हुई कि भले ही भाजपा सत्ता में न आ सकी लेकिन 2016 में प्राप्त तीन सीटों के मुकाबले इस बार 76 सीटें पाकर भाजपा हठात नंबर दो की हैसियत पर जा बैठी। इस लिहाज से उसको नुकसान कतई नहीं हुआ। असल नुकसान कांग्रेस और वामदलों को हुआ, जो कहीं के न रहे। इन दलों ने चुनाव प्रचार में हालांकि बहुत दिलचस्पी न दिखायी थी। बहुत संभव है कि मोदी को रोकने के लिए ऐसा किया गया हो लेकिन यह एक मिसाल ही कायम हो गई, घोड़े ने घास से दोस्ती कर ली। राजनीतिक दल राजनीति से बाज आये और मैदान में कहीं न टिके तो और क्या कहेंगे?

बंगाल के बहाने थोड़ी सी चर्चा झारखंड की भी। यहां एक सीट मधुपुर पर उपचुनाव हुआ। सत्ताधारी झामुमो या यूं कहिए यूपीए प्रत्याशी हफीजुल हसन ने जीत दर्ज की। उनके अब्बा के इंतकाल के कारण यह सीट रिक्त हो गई थी। इसके साथ ही चर्चा 2019 की भी, जब इस राज्य की विधानसभा का चुनाव हुआ था। तब यहां भाजपा गठबंधन का शासन था। उस चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास बंगाल की ममता बनर्जी की ही तरह अपने बागी कैबिनेट सहयोगी सरयू राय से अपनी पांच बार की जीती हुई सीट पूर्वी जमशेदपुर से हार गए थे। फर्क यही रहा कि बंगाल में ममता की टीएमसी प्रचंड बहुमत पाने में सफल रही, जबकि झारखंड में भाजपा बहुत पीछे चली गई थी। झारखंड के एक तिहाई जिले पूर्व, उत्तर और दक्षिण में बंगाल की सीमा को छूते हैं। यहां यूपीए के मुख्यमंत्री प्रत्याशी हेमंत सोरेन ने बिना कोई जोखिम उठाए दो सीटों पर चुनाव लड़ रहे थे, जबकि ममता अपनी परंपरागत सीट छोड़कर सुवेंदु के किले में जा भिड़ीं। हेमंत जिन दो सीटों दुमका और बरहेट से चुनाव लड़ रहे थे, वहां एक ही दिन मतदान था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका पीछा करते हुए दो दिन के अंतर पर दोनों ही जगहांे पर अपनी चुनावी रैली की थी, लेकिन हेमंत ने दोनों सीटें निकाल ली थी।

पश्चिम बंगाल से कुछ ही कम सीटों वाले तमिलनाडु में दस साल बाद डीएमके की वापसी से उस भाजपा को धक्का लगा, जो इस बार सत्ता में आने की ताक में ईपीएस संग मिलकर राज कर रही थी। तमिलनाडु से अपेक्षाकृत कम सीटों वाले केरल में एलडीएफ ने पिछले चुनाव के सापेक्ष दो ही सही, अधिक सीटों के साथ वापसी कर भाजपा को सत्ता से दूर ही रखा। इसके विपरीत असम में भाजपा ने सत्ता में अपनी वापसी कर अपना ठिकाना कायम रखा। वहां उसने लगातार दूसरी बार किसी गैरकांग्रेसी सरकार के सत्तासीन होने का इतिहास रचा। इसी प्रकार लगातार राजनीतिक तोड़फोड़ का शिकार रहे महज 30 सीटों वाले छोटे से पुडुचेरी में कांग्रेस से अलग हुई एनआर कांग्रेस संग सरकार बनाने की हैसियत पाकर देश का 18 वां राज्य अपने नाम कर लिया।

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