Freedom Fighter Birsa Munda is God for Tribes in Jharkhand : देश की आजादी के लड़ाकू झारखंड के बिरसा मुंडा को ’भगवान’ का अवतार माना जाता है

संजय कृष्ण

बिरसा मुंडा भारतीय इतिहास के उपेक्षित नायकों में एक हैं। वे अबुआ दिशुमा के लिए महज 25 साल की उम्र में बलिदान हो गए, लेकिन आज 120 साल बाद भी हम उनके महत्वपूर्ण योगदानों पर कोई विशेष ध्यान नहीं देते। 14 से 25 की उम्र में देखें तो देश में बहुत से ऐसे नायक मिल जाएंगे, जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया, लेकिन बिरसा मुंडा को जब याद करेंगे तो वे केवल आंदोलनकारी ही नहीं थे। वे एक साथ कई मोर्चे पर लड रहे थे। इसलिए, जब भी बिरसा मंुडा के आंदोलन की बात होगी तो उसके साथ उनके धर्म सुधार संबंधी कार्य, नए धर्म की स्थापना और आंदोलनकारी रूप की भी चर्चा करनी होगी।

यह विदित है कि देश की आजादी और अंग्रेजों के खिलाफ सर्वाधिक संघर्ष आदिवासी बहुल इलाकों में ही हुआ। आदिवासियों ने कभी परतंत्रता को स्वीकार नहीं किया। जब झारखंड के संताल परगना और छोटानागपुर में ब्रिटिश सरकार ने प्रवेश किया तभी से उसे संघर्ष का सामना करना पड़ा। रह-रहकर यहां आंदोलन होते रहे। उन्हीं में से एक आंदोलन बिरसा मुंडा ने खूंटी जिले में किया। यह पहले रांची जिले का ही एक अनुमंडल था।

बिरसा ने मुंडा समाज के भीतर पनपीं सामाजिक बुराइयों को दूर करने का प्रयत्न किया। उसने हिंदू धर्म और ईसाई दोनों का अध्ययन किया। हालांकि बिरसा मुंडा की प्रारंभिक शिक्षा भी मिशन स्कूल में हुई थी। जब 12 साल की उम्र में बिरसा का बपतिस्मा हुआ तो नाम रखा गया दाउद। हालांकि बाद में ईसाई धर्म से भी मोहभंग हो गया। वे हिंदू धर्म के संपर्क में आए। जनेऊ धारण किया। लेकिन वे यहां भी लंबे समय तक टिक नहीं पाए। उन्हें हिंदू धर्म से भी मोहभंग हो गया।

इसके बाद दोनों से अलग उन्होंने अलग पंथ बिरसाइत धर्म चलाया। उसने बलि प्रथा का विरोध किया। उसने गुरुवार को प्रार्थना अनिवार्य किया। इस दिन कोई काम नहीं। हल जोतने की इस दिन मनाही की। जब ब्रिटिश सत्ता ने 1895 में उन्हें गिरफ्तार किया तो धार्मिक गुरु के रूप में मुंडा समाज में स्थापित हो चुके थे। दो साल बाद जब रिहा हुए तो अपने धर्म को मुंडाओं के समक्ष रखना शुरू। बिरसा ने पहले 12 शिष्य बनाए और उन्हें अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचार के लिए भेजा।

इधर, मुंडा समाज अपनी जमीन से हाथ धो रहा था। तरह-तरह के कर से परेशान था। बिरसा मुंडा में उसने अपना मुक्तिदाता दिखाई दिया। तब बिरसा की उम्र 20 साल थी। छह अगस्त 1895 को चैकीदारों ने तमाड़ थाने में यह सूचना दी कि ‘बिरसा नामक मुुंडा ने इस बात की घोषणा की है कि सरकार के राज्य का अंत हो गया है।’ इस घोषणा को अंग्रेज सरकार ने हल्के में नहीं लिया। वह बिरसा को लेकर गंभीर हो गई। बिरसा मुंडा ने मुंडाओं को जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिए बलिदान देने के लिए प्रेरित किया।

ब्रिटिश सरकार 25 साल के बिरसा मुंडा से कितनी डरी हुई थी कि रांची जेल में कथित बीमारी से मृत्यु के बाद रात में आनन-फानन में कोकर के डिस्टिलरी पुल के पास अंतिम संस्कार कर दिया। बिरसा मुंडा का पूरा आंदोलन मात्र पांच साल तक चला-1895 से लेकर 1900 तक। इन पांच सालों में बिरसा मुुंडा कई रूपों में देखे जा सकते हैं। पांच साल के इस छापामार युद्ध ने अंग्रेजी सत्ता को बाध्य कर दिया कि उनके जमीन की रक्षा के लिए कानून बनाए। इसलिए, बिरसा की मृत्यु और उनके अनेक साथियों के पकड़े जाने के बाद भी अंग्रेज यह नहीं कह सकते थे कि इस आंदोलन में जीत उनकी हुई है।

इस आंदोलन ने छोटानागपुर के जनजातियों में जागरूक करने काम किया। 1940 में रामगढ़ में हुए कांग्रेस अधिवेशन के मुख्य द्वार का नाम बिरसा द्वार रखा गया, जो बताता है कि बिरसा की स्मृति क्षीण नहीं हुई है। क्षेत्र में चल रहे स्वतंत्रता संग्राम को भी बिरसा मुंडा के आंदोलन ने प्रभावित किया। बिरसा आजाादी के नायक के तौर पर उभरे। 1940 तक तो छोटानागपुर के पठार पर बिरसा की स्मृति में कार्यक्रम होने लगे और आगे चलकर देश की आजादी का मार्ग प्रशस्त किया। एक 25 साल के युवक ने मुंडा जनजाति ही नहीं, झारखंड में रहने वाली 32 जनजातियों में स्वाधीनता की चेतना को जगाने का काम किया।

1900 से 1947 के बीच आजादी की चाह में पठार आंदालित रहा तो इसके पीछे मुख्य कारण बिरसा मुंडा का आंदोलन ही रहा। क्षेत्रीय राजनीतिक आंदोलनों पर भी बिरसा मुंडा के आंदोलन का प्रभाव रहा। 1916 में छोटानागपुर उन्नति समाज की स्थापना की गई। 1938 में आदिवासी महासभा का गठन हुआ। इस तरह देखें तो पूरे अंचल में आदिवासी आरंभ से ही अपनी स्वाधीनता को लेकर अत्यंत सजग रहे और आज भी झारखंड के कई हिस्सों में चल रहे आंदोलन में इसे देखा जा सकता है। आदिवासी किसी पर निर्भर नहीं रहे।

प्रकृति के संग-साथ रहे और सामूहिकता इनके जीवन का आधार रहा है। स्वावलंबन इनकी सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा है। देश की आजादी के लिए सर्वाधिक बलिदान भी आदिवासियों ने ही दिए। देश की आजादी के लिए बिरसा का आंदोलन एक स्वर्णिम अध्याय रहा, जिसे भारतीय इतिहास के पृष्ठों पर उचित और अपेक्षित स्थान नहीं मिला। पर, सौ सालों में बिरसा देश के आदिवासी युवाओं के आइकान जरूर बन गए। झारखंड जब बिहार से अलग हुआ तो बिरसा जयंती (15 नवंबर)को ही चुना गया। जिस जेल में बिरसा मुंडा ने अंतिम सांस ली, उसका नाम बाद में बिरसा जेल कर दिया गया और अब बिरसा की स्मृति में उसे संग्रहालय का का रूप दिया गया है।

बिरसा का महत्व इसलिए भी है कि उसने क्रांति की मशाल भी जलाई और एक नए धर्म को आकार देकर समाज की बुराइयों को दूर करने का भी प्रयास किया। भारतीय इतिहास में ऐसे नायक विरले ही मिलेंगे जो कई मोर्चे पर लड़े और सफल रहे। पच्चीस वर्ष की अल्प आयु में इतिहास के चैखट को लांघनेवाला, यह अमर योद्धा संस्कृति, समाज और आदि धर्म का रखवाला भी था। अब देश के प्रधानमंत्री ने 15 नवंबर, बिरसा मुंडा की जयंती को भारतीय स्तर पर मनाने का निर्णय लिया है! यह झारखंड के लिए गर्व का विषय है! लेकिन हमें सिर्फ उत्सव तक सीमित नहीं रह जाना होगा, उनके जीवन से प्रेरणा लेने की भी जरूरत है!

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