Ghulam Nabi Azad : गुलाम नबी आजाद का जम्मू-कश्मीर के डोडा से सत्ता के केंद्र तक का शानदार सफर

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राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद 28 साल का लंबा व शानदार कार्यकाल पूरा कर मंगलवार को सदन से विदा हो गए। उच्च सदन में लंबी पारी के अलावा वे 10 साल तक लोकसभा सदस्य व तीन साल जम्मू-कश्मीर विधानसभा के सदस्य रहे। लंबी संसदीय पारी के अंतिम दिन भी वे जमकर खेले।

आजाद ने जहां अपने राजनीतिक जीवन, खुद की सोच, भारतीय संसदीय इतिहास की समृद्धता को रेखांकित किया, वहीं उनके सम्मान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों ने लोकप्रियता की नई ऊंचाई को छू लिया। प्रधानमंत्री ने न केवल गुलाम नबी के व्यक्तित्व को रेखांकित किया, बल्कि उनसे अपने हृदय के अंतरूस्थल की करीबी को व्यक्त करके पार्टी लाइन से ऊपर उठकर संसदीय राजनीति में नए धरातल पर चले गए।

जम्मू-कश्मीर में एक आतंकवादी हमले का जिक्र करते हुए पीएम मोदी तत्कालीन मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद का व्यक्तित्व बताते हुए भावुक हो गए। प्रधानमंत्री ने तत्कालीन रक्षा मंत्री प्रणब मुखर्जी के व्यक्तित्व को भी रेखांकित किया। गुलाम नबी आजाद के राज्यसभा में कामकाज के अंतिम दिन प्रधानमंत्री का यह संबोधन सबके दिल को छू गया।

एक दिन पहले किसान आंदोलन पर राज्यसभा में चर्चा के दौरान भी प्रधानमंत्री ने गुलाम नबी आजाद को याद किया था। इस दौरान उन्होंने कांग्रेस पार्टी पर गुट-23 सम्मेलन का तंज भी कसा था। लेकिन मंगलवार को प्रधानमंत्री के संबोधन ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों के बीच संसदीय राजनीति के रिश्तों की नई परिभाषा गढ़ दी।

प्रधानमंत्री के अंदाज में ही आजाद ने भी रखा अपना पक्ष

प्रधानमंत्री से इतना सम्मान पाने के बाद बारी गुलाम नबी आजाद की थी। 41 साल की संसदीय राजनीति के घुटे हुए नेता ने उसी स्तर को बनाए रखा। गुलाम नबी आजाद ने कांग्रेस पार्टी की परंपरा, नेताओं की सोच, विपक्ष के नेताओं के संवाद, राजनीतिक संबंध को बहुत सुंदर तरीके से बयान किया।

बताया कि जीवन में सिर्फ पांच बार रोए

गुलाम नबी आजाद ने यह भी बताया कि वह अपने जीवन में केवल पांच बार रोए। संजय गांधी, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी की मौत पर, चैथी बार 1999 में उड़ीसा में सुनामी के दौरान लाशों को देखकर और पांचवी बार जब वह यूपीए-1 सरकार के समय जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री थे तब। उस आतंकी घटना पर उनकी आंखों में आंसू थे, जिसका जिक्र प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में किया था।

अटलजी के संपर्क में रहने को कहा था इंदिरा गांधी ने

गुलाम नबी आजाद ने याद करते हुए बताया कि कैसे इंदिरा गांधी कहा करती थी कि वे तत्कालीन भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी के संपर्क में रहा करें। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कैसे उन्हें दूसरी बार विपक्ष के नेताओं का ख्याल रखने के लिए भी कहा था। इतना ही नहीं 1991-96 के दौरान पीवी नरसिंह राव की अल्पमत वाली सरकार में संसदीय कार्य मंत्री थे तो तत्कालीन विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी के साथ किस तरह का तारतम्य था।

आजाद अपने वक्तव्य को दो कदम और आगे ले गए। उन्होंने कहा कि उन्होंने राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष से लेकर संसदीय राजनीति में विपक्ष के खेमे में बैठकर हमेशा अपने साथियों से विपक्षी दल होने के नाते दो दिन सरकार के साथ मुद्दों पर तल्खी के और अगले दिन उदारवादी कामकाजी सोच के साथ आगे बढ़ने की परंपरा पर चलने की सीख दी। गुलाम नबी अंत में फिर प्रधानमंत्री की तरफ लौटे।

प्रधानमंत्री की जमकर की तारीफ, संबंधों में अपनापन जोड़ा

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उदारवादी सोच की बढ़ाई की। गुलाम नबी ने कहा कि कभी प्रधानमंत्री ईद, दीपावली, जन्मदिन के समय फोन करने से नहीं चूकते थे। गुलाम नबी ने कहा कि ऐसे समय में हमेशा उनके पास दो फोन जरूर आते थे। एक फोन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का होता था और दूसरा फोन प्रधानमंत्री मोदी का जरूर होता रहा। गुलाम नबी ने कहा कि जब वह राज्यसभा का चुनाव लड़ रहे थे, तब भी प्रधानमंत्री का फोन आया, उन्होंने सहयोग, कुशल क्षेम भी पूछा। आजाद यह भी याद दिलाना नहीं भूले कि प्रधानमंत्री ने हमेशा उदारता दिखाते हुए किसी भी काम को निरूसंकोच बताते रहने को कहा।

कई शेर पढ़े गुलाम नबी आजाद ने

अपने विदाई भाषण में आजाद ने कई अच्छे शेर और पंक्तियों का सहारा लिया, लेकिन उनके आखिरी शेर ने पूरे सदन की तालियां बटोरी। वह कुछ इस तरह रहा-

नहीं आएगी याद, तो वर्षों नहीं आएगी।
मगर जब याद आओगे, तो बहुत याद आओगे।।

गुलाम नबी आजाद का राजनीतिक सफर

जम्मू-कश्मीर के डोडा से तालुक रखने वाले गुलाम नबी आजाद ने एक कद्दावर कांग्रेस नेता के रूप में पार्टी में अपनी अलग पहचान बनाई. 40 साल से ज्यादा के राजनीतिक करियर में गुलाम नबी आजाद पार्टी और सरकार में कई अहम पदों पर रहें.

  • 1973 में ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के सचिव के रूप में राजनीतिक सफर की शुरुआत की
  • पार्टी में बढ़ी सक्रियता के बाद 1980 में सांसद बनकर लोकसभा पहुंचे.
  • 1982 में पार्टी ने गुलाम नबी आजाद को केंद्रीय मंत्री बनाया.
  • 1990 से 2014 के बीच पार्टी और सरकार में कई अहम पदों पर रहे
  • 2005 में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने गुलाम नबी आजाद
  • 2014 में राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष बने

-एजेंसी

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