Gita Mein Gyanyog: ज्ञान के सागर से मोतियों का संकलन

वेद-वेदांत भारत की अमूल्य धरोहर हैं। परवर्ती साहित्य में रामायण और महाभारत को भी वैसी ही प्रतिष्ठा प्राप्त है। महाभारत के समय रणभेरी बजने के बाद अर्जुन को उत्पन्न मोह से छुटकारा दिलाने के लिए श्रीकृष्ण ने जो उपदेश दिये, वे श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में संकलित हैं। इस महान ग्रंथ को सामान्य तौर पर गीता के नाम से जाना जाता है। यह ज्ञान का सागर है, जिसमेें ज्ञान, कर्म और भक्ति तत्वों का सम्मिश्रण है। मानव जीवन की प्रायः सभी समस्याओं के समाधान भी इसमें वर्णित है।

मनुष्य योनि क्यों प्राप्त होती है, इसमें कौन-कौन से कर्म करने होते हैं और अंततः इसकी कौन सी गति होती है, जैसे गूढ़ प्रश्न और उनके उत्तर की यदि खोज करनी हो तो अकेले गीता ही पर्याप्त है। भूख और भोजन तो सृष्टि के सभी प्राणियों की परम आवश्यकता है ही लेकिन मानव इनसे ग्रस्त होने के बावजूद अपने आप में विशिष्ट है क्योंकि उसके पास ज्ञान है। उसे कर्म-अपकर्म में भेद करना आता है और यदि कहीं उलझन है तो उसका निवारण निश्चय ही गीता में ही है। गीता की यही महानता और उपयोगिता वह कारण है, जिससे सैकड़ों विद्वान और संत इसका भाष्य लिखने को विवश हो गए।

इसी कड़ी में एक विशुद्ध गृहिणी चंपा भाटिया ने भी अपनी कलम चलाई है। उन्होंने हालांकि विशेष कुछ किया नहीं है किंतु उनकी शोध प्रवृत्ति ने ‘गीता में ज्ञानयोग’ नामक रचना को विशिष्ट बना दिया है। गीता अट्ठारह अध्यायोें का ग्रंथ है, जिसमें 699 श्लोक हैं। इसमें दो ही पात्र हैं, अर्जुन और श्रीकृष्ण। अर्जुन शंकाएं उठाते हैं, जबकि श्रीकृष्ण उनका समाधान प्रस्तुत करते हैं। समाधान के रूप में तीन तत्व सामने आते हैं, ज्ञान, कर्म और भक्ति। इन्हें ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग का नाम दिया गया है। 699 श्लोकों में बिखरे इन तत्वों में ज्ञानयोग से संबंधित श्रीकृष्ण वाणी यत्र-तत्र 18 अध्यायों में संकलित है।

चंपा भाटिया ने ज्ञानयोग के इन सभी श्लोकों को एक जगह लाया तो उनकी गिनती 170 तक गई। श्रीमती भाटिया ने अध्यायवार उनको पेश करते हुए उनका अन्वय किया यानी क्लिष्ट और संयुक्त संस्कृत शब्दों को तोड़-तोड़कर उन श्लोकों को इस रूप में लिखा ताकि उनका पठन, वाचन और गायन आसान हो जाय। इतना ही नहीं, सभी श्लोकों का हिंदी अनुवाद भी किया और उनकी छोटी-छोटी किंतु सारगर्भित व्याख्या भी की। कुल मिलाकर उन्होंने इन श्लोकों को अधिक रोचक और बोधगम्य बना दिया।

आध्यात्मिक जीवन में कर्म और भक्ति का बहुत महत्व है। कर्म सकाम हो कि निष्काम? श्रीकृष्ण ने इसे स्पष्ट कर दिया है कि निष्काम कर्म ही श्रेष्ठ है क्योंकि फल की इच्छा से किया हुआ कर्म कष्ट देता है और कर्म के दौरान सारा ध्यान फल पर ही केंद्रित रहता है। भक्ति का मतलब ही है डूब जाना। जबतक ज्ञान नहीं होगा, तबतक कर्म और भक्ति में जान नहीं डाली जा सकेगी। रही बात योग की तो इसका साधारण अर्थ जोड़ना होता है लेकिन अध्यात्म में यह योग विशिष्ट अर्थ देता है। योग का महत्तम मान विलय तक चला जाता है। जब आत्मा का परमात्मा से योग होता है तो उसका परमात्मा में विलय हो जाता है।

श्याम किशोर चौबे द्वारा समीक्षा

हर किसी की यही इच्छा होती है कि वह परम तत्व को पा जाये और परमात्मा का हो जाय। मनुष्य नामक प्राणी में जो अदृश्य आत्मा बैठी होती है, वास्तव में वह परमात्मा का ही अंश होती है। जब उसमें ज्ञान, कर्म और भक्ति का योग होता है तो वह परमात्मा में मिल जाती है अन्यथा वह इस जन्म से उस जन्म में भटकती रहती है। संसार को भले ही असार कहा जाता है लेकिन इसका आकर्षण इतना तीव्र होता है कि मन उसमें ही लिप्त हो जाता है। मन के नियंत्रण और शुद्धिकरण से सद्कर्मों की प्रेरणा प्राप्त होती है, जो अंततः परमात्मा की ओर ले जाती है।

ज्ञानयोग का यह रोचक वर्णन श्लोक-दर-श्लोक चंपा भाटिया ने संकलित कर श्रम साध्य कार्य किया है। जैसा कि पुस्तक के बैक फ्लैप पर उन्होंने स्पष्ट कर दिया है, मैके से लेकर ससुराल तक आध्यात्मिक वातावरण मिलने और संस्कृत के प्रति बचपन से ही उनकी अभिरुचि होने के कारण यह दुरूह कार्य संभव हो सका। चिंतन और अनुशीलन ने उनको पहले तो पत्र-पत्रिकाओं और यूट्यूब तक पहुंचाया लेकिन अभिव्यक्ति की अकुलाहट संकलन और संपादन कर्म के माध्यम से उन्हें किताबों की दुनिया तक ले गई।

इस प्रकार उनका यह पहला ही प्रयास सार्थक सिद्ध हुआ। प्रभात पेपरबैक्स जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशन ने यूं ही इस पुस्तक को प्रकाशित नहीं किया। उसने इसका सार तत्व भी परखा और तब हाथ डाला। सुंदर और प्रायः त्रुटिहीन छपाई तो इस पुस्तक की विशेषता है ही, इसकी उपयोगिता ने चंपा भाटिया के प्रथम प्रयास को ही न केवल पठनीय, अपितु संग्रहणीय भी बना दिया है।

  • पुस्तक का नाम: गीता में ज्ञानयोग
  • संकलनकर्ता: चंपा भाटिया
  • प्रकाशकः प्रभात पेपरबैक्स, नई दिल्ली
  • कीमतः 175 रुपये

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *