ईसाई मिशनरी संगठनों पर भारत सरकार गृह मंत्रालय का कड़ा एक्शन

Insightonlinenews Team

झारखंड सहित अन्य राज्यों में कार्यरत 13 बड़े ईसाई संगठनों का केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा एफआरसीए लाइसेंस रद करना किनता सही और कितना गलत एवं असंवैधानिक ?

चूंकि झारखंड क्षेत्र में ईसाई मिशनरियां सेवा भाव से विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत है और समय-समय पर प्रतिक्रियावादी शक्तियां मीडिया एवं अन्य माध्यम से इनपर आरोप मढ़ती रहती है ये उन्हीं शक्तियों के विरोध का एक नमूना है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इनके खिलाफ बड़े एक्शन प्रारंभ कर दिये हैं।

देश के विभिन्न समाचार पत्रों में जो खबरें आ रही हैं, उनमे से कुछ एक अख़बारों की ख़बरें हम हूबहू पेश कर रहे हैं। उसमें कितनी सच्चाई और कितनी दुर्भावना है इसका आकलन क्षेत्र की जनता पर निर्भर है।

ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन के खिलाफ अमित शाह का बड़ा एक्शन

चार बड़े मिशनरियों का FCRA लाइसेंस गृह मंत्रालय ने रद्द किया

नार्थ ईस्ट, झारखंड, महाराष्ट्र में धर्म परिवर्तन करने वाले मिशनरियों पर बड़ी कार्यवाही

अमरीका के दो बड़े चर्च द्वारा चलाये जा रहे मिशनों के खिलाफ एक्शन

ईसाई मिशनरियों के खिलाफ गृह मंत्री अमित शाह ने एक बड़ा कदम उठाया हैं। चार बड़े ईसाई संगठनों की विदेशी फंडिंग का लाइसेंस निलम्बित कर दिया गया हैं।
सरकार ने अभी हाल ही में चार मिशनरी संगठनों के FCRA लाइसेन्स निलंबित किए हैं, जिनमें झारखंड में स्थित Ecreosoculis North Western Gossner Evangelical, मणिपुर में स्थित Evangelical Churches Association (ECA) , झारखंड में बसे Northern Evangelical Lutheran Church और मुंबई में स्थित New Life Fellowship Association (NLFA) भी शामिल है। बता दें कि किसी भी NGO को विदेशी फण्ड्स प्राप्त करने के लिए FCRA लाइसेंस बहुत आवश्यक है। इनमें से एक जर्मनी से, एक वेल्स से, एक न्यूज़ीलैंड से तो एक अमेरिका से संबंध रखता है।

अमित शाह के नेतृत्व वाले गृह मंत्रालय के डाटा के अनुसार New Life Fellowship Association का एफसीआरए लाइसेंस 10 फरवरी को निलंबित किया गया था।
यह गौर किया जाना चाहिए कि जिन छह एनजीओ के एफसीआरए लाइसेंस निलंबित हुए हैं, उनमें चार ईसाई संघ शामिल हैं। इनमें झारखंड का ईकोसॉउलिस नॉर्थ वेस्टर्न गॉसनर इवेंजेलिकल, मणिपुर का इवेंजेलिकल चर्च असोसिएशन (ईसीए), झारखंड का नॉर्दर्न इवेंजेलिकल लूथरन चर्च और मुंबई का न्यू लाइफ फेलोशिप एसोसिएशन एनएलएफए शामिल हैं।

इसके अलावा, दो संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) आधारित ईसाई दानदाता भी एमएचए के शक के घेरे में हैं। इनमें सेवंथ डे एडवेंटिस्ट चर्च और बैपटिस्ट चर्च हैं। वर्तमान में भारत में उनकी फंडिंग गतिविधियों की भी जाँच की जा रही है।

यह गौर किया जाना चाहिए कि इससे पूर्व 2017 में एक और शक्तिशाली यूएस-आधारित ईसाई दाता, जिसे कॉम्पेशन इंटरनेशनल कहा जाता था का भारत में संचालन रोका गया था। दरअसल, गृह मंत्रालय को पता चला था कि उसने कुछ एनजीओ को वित्त पोषित किया था, जो धार्मिक रूपांतरण को प्रोत्साहित करते थे।
इस बीच, छह एनजीओ जिनके एफसीआरए लाइसेंस निलंबित कर दिए गए हैं। उनमें अन्य दो राजनंदगांव कुष्ठरोग अस्पताल व क्लिनिक और डॉन बॉस्को ट्राइबल डवलपमेंट सोसाइटी हैं।

दिव्य कुमार सोती

हाल में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 13 बड़े ईसाई मिशनरी संगठनों को विदेशी अनुदान विनियमन अधिनियम के तहत मिली चंदा लेने की अनुमति रद कर दी। इनमें से अधिकतर संगठन झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तर पूर्व के राज्यों में सक्रिय थे और विदेशी चंदे का दुरुपयोग धर्मांतरण कराने के लिए कर रहे थे। हमेशा की तरह इंटरनेशनल क्रिश्चियन कंसर्न जैसे संगठनों ने इस फैसले पर हाय-तौबा मचानी शुरू कर दी। अब इसके आसार हैं कि धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर ईसाई मिशनरियों के काम को सुगम बनाने वाले विदेशी संगठन भारत में कथित रूप से घटती धार्मिक स्वतंत्रता पर कोई रिपोर्ट जारी कर दें।

भारत सरकार पर दबाव बनाने के लिए वे ऐसा करते रहते हैं। यह सही है कि भारतीय संविधान धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसमें अपने पंथ के प्रचार का भी अधिकार शामिल है, लेकिन हर अधिकार की तरह इस अधिकार की भी कुछ सीमाएं हैं। यह जानना भी जरूरी है कि यह अधिकार किन परिस्थितियों में दिया गया था।

गांधी जी ईसाई मिशनरियों के क्रियाकलापों से थे खिन्न

महात्मा गांधी ब्रिटिश शासन के दौरान ईसाई मिशनरियों के क्रियाकलापों से खिन्न थे। उन्होंने अपने संस्मरणों में लिखा है कि किस प्रकार राजकोट में उनके स्कूल के बाहर एक मिशनरी हिंदू देवी-देवताओं के लिए बेहद अपमानजनक शब्दों का उपयोग करता था। गांधी जी जीवन भर ईसाई मिशनरियों द्वारा सेवा कार्यों के नाम पर किए जाने वाले धर्म परिवर्तन के विरुद्ध रहे। जब अंग्रेज भारत से जाने लगे तो ईसाई मिशनरी लॉबी ने प्रश्न उठाया कि स्वतंत्र भारत में क्या उन्हें धर्म परिवर्तन करते रहने दिया जाएगा, तो गांधी जी ने इसका जवाब न में दिया। उनके अनुसार लोभ-लालच के बल पर धर्म परिवर्तन करना घोर अनैतिक है। इस पर मिशनरी लॉबी ने बहुत हंगामा किया।

आजादी के समय भारत बेहद गरीब देश था और वित्तीय सहायता के लिए पाश्चात्य ईसाई देशों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों निर्भर था, इसलिए भारत को मिशनरियों के आगे झुकना पड़ा। इसके परिणामस्वरूप संविधान में अपने पंथ के प्रचार का अधिकार कुछ पाबंदियों के साथ दिया गया, लेकिन एक के बाद एक सरकार मिशनरी लॉबी के सामने मजबूर होती गई।

नए हथकंडों का प्रयोग किया गया शुरू

धर्म परिवर्तन कराने के लिए पैसे का इस्तेमाल तो आजादी से पहले से भी होता था, परंतु आजादी के बाद और भी बहुत तरह के प्रयोग किए जाने लगे। मिशनरियों ने अपने अनुभवों से पाया कि भारतीय धर्मों के लोग अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं से भावनात्मक तौर पर इतने गहरे जुड़े हैं कि तमाम प्रयासों के बावजूद भारत में करोड़ों की संख्या में धर्म परिवर्तन संभव नहीं हो पा रहा है। इस कठिनाई से पार पाने के लिए नए हथकंडों का प्रयोग शुरू किया गया, जैसे मदर मैरी की गोद में ईसा मसीह की जगह गणेश या कृष्ण को चित्रांकित कर ईसाइयत का प्रचार शुरू किया गया, ताकि आदिवासियों को लगे कि वे तो हिंदू धर्म के ही किसी संप्रदाय की सभा में जा रहे हैं। ईसाई मिशनरियों को आप भगवा वस्त्र पहनकर हरिद्वार, ऋषिकेश से लेकर तिरुपति बालाजी तक धर्म प्रचार करते पा सकते हैं। यही हाल पंजाब में है, जहां बड़े पैमाने पर सिखों को ईसाई बनाया जा रहा है। पंजाब में चर्च का दावा है कि प्रदेश में ईसाइयों की संख्या सात से दस प्रतिशत हो चुकी है।

आदिवासी समाज का बड़े पैमाने पर हो चुका है धर्मांतरण

ईसाई मिशनरी विदेशी पैसे का इस्तेमाल करते हुए पिछले सात दशकों में उत्तर-पूर्व के आदिवासी समाज का बड़े पैमाने पर धर्मांतरण करा चुके हैं। यही सब मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्रों में भी चल रहा है, जहां इन गतिविधियों का फायदा नक्सली भी उठाते हैं। विदेशी पैसे का धर्मांतरण के लिए इस्तेमाल देश की सुरक्षा और स्थिरता के लिए बड़ी चुनौतियों को जन्म दे रहा है। विकसित पाश्चात्य ईसाई देशों की सरकारें धर्मांध कट्टरपंथी ईसाई मिशनरी तत्वों को धर्म परिवर्तन के नाम पर एशिया और अफ्रीका जैसे देशों को निर्यात करती रहती हैं। इससे दो तरह के फायदे होते हैं। एक तो इन कट्टरपंथी तत्वों का ध्यान गैर ईसाई देशों की तरफ लगा रहता है, जिस कारण वे अपनी सरकारों के लिए कम दिक्कतें पैदा करते हैं और दूसरे, जब भारत जैसे देशों में विदेशी चंदे से धर्मांतरण होता है, तो धर्मांतरित लोगों के जरिये विभिन्न प्रकार की सूचनाएं इकट्ठा करने और साथ ही सरकारी नीतियों पर प्रभाव डालने में आसानी होती है।

विदेशी चंदा प्राप्त कर रहे चार एनजीओ पर भी हुई थी कार्रवाई

उदाहरण के लिए भारत- रूस के सहयोग से स्थापित कुडनकुलम परमाणु संयंत्र से नाखुश कुछ विदेशी ताकतों ने इस परियोजना को अटकाने के लिए वर्षों तक मिशनरी संगठनों का इस्तेमाल कर धरने-प्रदर्शन करवाए। तत्कालीन संप्रग सरकार में मंत्री वी नारायणस्वामी ने यह आरोप लगाया था कि कुछ विदेशी ताकतों ने इस परियोजना को बंद कराने के लिए धरने-प्रदर्शन कराने के लिए तमिलनाडु के एक बिशप को 54 करोड़ रुपये दिए थे। इस मामले में विदेशी चंदा प्राप्त कर रहे चार एनजीओ पर कार्रवाई भी की गई थी।

मिशनरी संगठनों द्वारा फैलाया गया दुष्प्रचार

इसी प्रकार का दूसरा उदाहरण वेदांता द्वारा तूतीकोरीन में लगाए गए स्टरलाइट कॉपर प्लांट का है। इस प्लांट को बंद कराने में भी चर्च का हाथ माना जाता है। आठ लाख टन सालाना तांबे का उत्पादन करने में सक्षम यह प्लांट अगर बंद न होता, तो भारत तांबे के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गया होता। यह कुछ देशों को पसंद नहीं आ रहा था और इसलिए उन्होंने मिशनरी संगठनों का इस्तेमाल कर पादरियों द्वारा यह दुष्प्रचार कराया कि यह प्लांट पूरे शहर की हर चीज को जहरीला बना देगा। इस दुष्प्रचार के बाद हिंसा भड़की और पुलिस फायरिंग में 13 लोगों की मौत हो गई। नतीजा यह हुआ कि यह प्लांट बंद कर दिया गया। यह अभी भी बंद है और 18 साल बाद भारत को एक बार फिर तांबे का आयात करना पड़ रहा है।

देश को गहरे नुकसान से बचाने के लिए विदेशी चंदे पर पूरी तरह रोक के साथ- साथ मिशनरी संगठनों की गतिविधियों पर सख्त पाबंदी आवश्यक है। धार्मिक सभाएं करने से पहले ऐसे संगठनों के लिए स्थानीय पुलिस-प्रशासन को जानकारी देना आवश्यक होना चाहिए। अपनी र्धािमक सभाओं में ऐसे संगठनों द्वारा दूसरे धर्मों के देवी-देवताओं और प्रतीकों का प्रयोग करने को छल की श्रेणी में रखा जाना चाहिए और धार्मिक नगरों और साथ ही सामरिक रूप से महत्वपूर्ण ठिकानों के आसपास उन पर कड़ी निगाह रखी जानी चाहिए, क्योंकि धर्मांतरण सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करने के साथ देश की सुरक्षा के लिए चुनौती बन रहा है।

(लेखक काउंसिल फॉर स्ट्रेटेजिक अफेयर्स से संबद्ध हैं)

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 13 ईसाई संगठनों के विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (FCRA) लाइसेंस को सस्पेंड कर दिया है। मंत्रालय ने यह निर्णय पिछड़े इलाकों में आदिवासियों को प्रलोभन देकर उनके धर्मांतरण कराए जाने की रिपोर्ट के बाद ली है।

जिन 13 ईसाई संगठनों का FCRA लाइसेंस सस्पेंड किया गया है, उनके बैंक अकाउंट भी फ्रिज कर लिए गए हैं। कुछ राज्यों के पिछड़े इलाके खासकर झारखंड से आई इंटेलिजेंस रिपोर्ट की मानें तो ये संस्था आदिवासियों को लोभ-लालच देकर उनका धर्मांतरण कर उन्हें ईसाई बना रहे थे।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जिन 13 ईसाई संगठनों का FCRA लाइसेंस सस्पेंड किया है, उन्हें पहले ‘कारण-बताओ’ नोटिस भेजा था। लेकिन तय समय-सीमा के भीतर किसी ने भी जवाब नहीं दिया। अभी तक सिर्फ एक संगठन की ओर से जवाब आया है, वो भी तय समय-सीमा के बाद। मंत्रालय के अनुसार भेजा गया जवाब संतुष्टि के लायक नहीं है।

दो दिन पहले भी केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 4 ईसाई संगठनों के विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (FCRA) लाइसेंस को सस्पेंड कर दिया था। जिन चार ईसाई समूहों का FCRA सस्पेंड किया गया है, उनमें झारखंड का Ecreosoculis North Western Gossner Evangelical, मणिपुर का Evangelical Churches Association (ECA), झारखंड का Northern Evangelical Lutheran Church और मुंबई स्थित New Life Fellowship Association (NLFA) शामिल हैं।

क्या है विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (FCRA)

किसी भी संगठन के लिए विदेश से चंदा प्राप्त करने के लिए गृह मंत्रालय से FCRA की मँजूरी होना अनिवार्य है। इस लाइसेंस के नहीं होने से संस्थान या संगठन विदेश से चंदा या वित्तीय योगदान मँगाने में कानूनी रूप से सक्षम नहीं होता है।

विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (FCRA) 2010 के प्रावधानों के अनुसार प्रलोभन देकर धर्मांतरण कराना गैर-कानूनी है। इस अधिनियम के सेक्शन 12(4) के अनुसार सक्षम अधिकारी किसी NGO या संगठन को धार्मिक गतिविधियों से परे लोभ-लालच-प्रलोभन देकर धर्मांतरण करने की स्थिति में उसका लाइसेंस सस्पेंड कर सकते हैं।

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