ST. ANNE’S Hadgadi’s 26th Anniversary : नवंबर 2021 संत अन्ना मूलमठ, समाधि-स्थल राँची

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नवबंर 5, 2021 को संत अन्ना की पुत्रियों के धर्मसंघ, राँची की संस्थापिका मेरी बेर्नादेत्त प्रसाद किस्पोट्टा, ईश-सेविका और उनकी प्रथम तीन सहयोगी धर्मबहनों माता सिसिलिया, माता बेरोनिका और माता मेरी की हड़गडी की 26वीं वर्शगाँठ मनायी गयी। इस पावन अवसर पर महामान्यवर फेलिक्स टोप्पो ये.स., राँची महाधर्मप्रांत के महाधर्माध्यक्ष, समारोही खीस्तयाग के मुख्य अनुष्ठाता, श्रद्धेय फा. अलबिनुस बरला, विकर जेनेरल, पोर्ट-बेल्यर, अंडमान, फा. सुशील टोप्पो और फा. अनिल कुजूर उपस्थित थे।

धर्मसंघ की परमाधिकारिणी सि. लीली ग्रेस तोपनो, डी.एस.ए., उनकी महासलाहकारिणियाँ, सि. मंजुला किंडो, डी.एस.ए. राँची प्रोविंस की प्रोविंशल, निकटवर्ती समुदायों से आयी धर्मबहनों और छात्रावास की बहनो ने मिलकर माताओं की समाधि-स्थल पर धर्मसंघ एवं कलीसिया के लिए प्रार्थनाएँ की और श्रद्धा सुमन अर्पित कर माताओं की मध्यस्थता से ईश्वर से दुवाएँ माँगी। महामान्यवर फेलिक्स टोप्पो ये.स. ने अपने प्रवचन में कहा- अपने पूर्वजों की याद करना उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना हमारे लिए उचित है। वे समाज के धरोहर हैं।

उन्होंने कहा कि माता मेरी बेर्नादत्त प्रतिष्ठित व्यक्ति व नारी थीं। पवित्र आत्मा अपने सातों वरदानों के साथ उसपर छाया रहता था। वह प्रज्ञा व विवेक, परामर्श और दृढ़ता, ज्ञान और धर्मनिष्ठा तथा श्रद्धा से पूर्ण थीं। ईश्वर ने धमसंघ की स्थापना के लिए विशिष्ट कृपा व प्रेरणा देकर मेरी बेर्नादेत्त को चुना। जिनका अनुकरण संत अन्ना की धर्मबहनें कर रही हैं। उन्होंने धर्मबहनों से कहा-आपके अन्दर जो आत्मा की प्रेरणा है वह आपको उस विशिष्ट कृपा और प्रेरणा का प्रतिभागिनी बनाया है। इसलिए उचित है कि हम उनका गुणगान करें। उनके उपकार को याद करें, क्योंकि उसकी आत्मिक प्रेरणाएँ हममें अब भी जीवित हैं।

‘हड़गड़ी की यह प्रथा आखिर क्यों? आदिवासी संस्कृति की प्रथानुसार ‘हड़गड़ी’ की प्रक्रिया का एक विशेष एवं महत्वपूर्ण स्थान है, जिसका साधारण अर्थ है – मृतक के अवशेषों को एक कब्र से दूसरी समाधि अर्थात् कुण्डी या ससंगदिरी में पुनःस्थापित करना। यह प्रथा लगभग आदिवासी समाज के सभी समुदाय में प्रचलित है जिसे मुण्डारी में ‘उम्बुल आदेर’ या जंग तोपा, खड़िया में ‘लोंगोय डिःभारना’ उराँव में कोंहा बेंजा या बोलचाल की भाषा में कमान या छाया भितारना कहा जाता
है।

उराँव संस्कृति के अनुसार इसका अर्थ है- ‘पूर्वजों की संगति’ में। इनके विश्वास के अनुसार यह माना जाता है कि हड़गडी की पुण्य किया संपन्न करने के पश्चात् मृत पूर्वजों की आत्मा स्वर्ग चली गई है और उनकी आत्मा को पुनः घर में प्रवेश कराना एक आवश्यक एवं पवित्र कार्य माना जाता है, ताकि उनकी संगति, सुरक्षा एवं छत्रछाया परिवार के सभी सदस्य, आने वाली पीढ़ी एवं धन सम्पति को प्राप्त हो।

इसी आदिवासी संस्कृति एवं विश्वास से जुड़ी छोटानागपुर की चार वीरांगनाओं अर्थात् ईश-सेविका माता मेरी बेर्नादेत्त हमारे धर्मसंघ की संस्थापिका एवं उनकी सहयोगी बहनों के पुण्य अवशेषों को पूरे मान-सम्मान के साथ 5 नवंबर 1995 को काँटाटोली के टमटम स्थित कब्रगाह से लाकर संत अन्ना मूलमठ के प्रांगण में प्रतिस्थापित किया गया। जिससे हम संत अन्ना की पुत्रियों को भी हमारे प्रथम पूर्वजों की छत्रछाया, संगति, सुरक्षा एवं मध्यस्थता प्राप्त हो एवं हम सभी उनके आदर्शों तथा प्रेरणाओं पर चलते हुए येसु के प्रेम से अपनी श्रेष्ठत्तर सेवाएँ दे सकें।

सि. रंजिता मिंज

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