चुनौतियों से घिरे हेमंत दे रहे चुनौतियां

श्याम किशोर चौबे

चुनौतियों से घिरे झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन प्रतिपक्षी भाजपा को चुनौतियां पेश करते जा रहे हैं। उदाहरण उनकी कैबिनेट द्वारा 14 सितंबर को पारित दो प्रस्ताव हैं। उन्होंने राज्य में स्थानीय नीति तय करने के लिए 1932 के खतियान को आधार निर्धारित किया है। साथ ही ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण लाभ देने का भी निर्णय लिया। राज्य में ओबीसी आबादी 52 फीसद है। जैसी कि उम्मीद थी, खासकर ‘32 के खतियानी निर्णय पर राजनीतिक बवाल कटने लगा। स्थानीय नीति से नियोजन नीति भी प्रभावित होगी। भाजपा विधायक दल के नेता और राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने इसे केवल और केवल राजनीतिक ठगी की संज्ञा देते हुए दावा किया है कि यह निर्णय अदालत में नहीं टिकेगा। यूं, इसे अमल में लाने के लिए विधानसभा में विधेयक पारित होने, राज्यपाल की स्वीकृति मिलने और केंद्र सरकार द्वारा 9वीं अनुसूची में शामिल करने के दौर से गुजरना होगा।

ज्यादा समय नहीं गुजरा। पिछले मार्च में ही हेमंत ने अपने इस हालिया निर्णय के विपरीत विधानसभा में कहा था कि खतियान आधारित नियोजन नीति अदालत में नहीं टिकेगी। दूसरी कहानी यह कि 22 साल पहले 2000 में झारखंड राज्य का गठन होने के कुछ ही अरसा बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने यही निर्णय लिया था, जिसे जल्द ही झारखंड हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया था। तब से स्थानीय नीति झारखंड के लिए अबूझ राजनीतिक पहेली बनी हुई है। पिछली एनडीए सरकार, जिसमें रघुवर दास मुख्यमंत्री थे, ने 2016 में स्थानीय नीति बनायी थी, जिसमें स्थानीयता को तय करने का कट ऑफ ईयर 1985 तय किया गया था। 2019 के चुनावी एजेंडे में हेमंत की पार्टी झामुमो ने उस नीति को ‘गैर झारखंडी’ करार देते हुए ‘32 की खतियानी नीति लाने का वादा किया था।

हेमंत की सरकार आई तो दो वर्षों बाद पिछली फरवरी से उस पर एक तो विपक्षी भाजपा की घेराबंदी बढ़ गई, दूसरे महागठबंधन में भी टन-फिस्स होने लगी। विपक्ष का आक्रामक रूख अपनाना लाजिमी है, जबकि सत्ताधारी महागठबंधन की पार्टनर कांग्रेस बोर्ड-निगमों में हिस्सेदारी, विधायकों की बातें सुनने जैसी मांगों के साथ दबाव बनाने लगी। तनातनी इसी वर्ष राज्यसभा चुनाव में भी दिखी, जब हेमंत ने अपने पिता शिबू सोरेन को प्रत्याशी बना दिया। ऐसे ही राष्ट्रपति चुनाव में महागठबंधन/यूपीए की लाइन से अलग झामुमो ने एनडीए प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू को वोट दिया। फिर सवाल भाजपा के कथित ‘लोटस ऑपरेशन’ का भी उठा, जब 29 अगस्त को हावड़ा के निकट कांग्रेस के तीन विधायक 49 लाख बेहिसाबी कैश के साथ पकड़े गए।

सवाल केवल कांग्रेस का ही नहीं, झामुमो के अंदरखाने का भी है। मंत्री पद से महरूम रखे गये कतिपय सीनियर झामुमो विधायक असंतुष्टों की ही श्रेणी में हैं। एक सीनियर विधायक लोबिन हेम्ब्रम ईसीएल कर्मी अपने बेटे की फर्जी सर्टिफिकेट मामले में गिरफ्तारी को पचा नहीं पा रहे। लोबिन ‘32 के खतियानी मामले से लेकर संताल परगना में अवैध माइनिंग पर सदन के अंदर और बाहर मुखर रहे हैं। उनके और भी संगी-साथी हैं, लेकिन पार्टी के सवाल पर वे मौन रहते हैं।

हेमंत एक विशेष मामले में असमंजस में हैं। 2021 में उन्होंने अपने नाम राजधानी रांची की बगल के अनगड़ा क्षेत्र में 88 डिसमिल की पत्थर माइनिंग लीज ली थी। हालांकि बाद में उन्होंने इसे सरेंडर कर दिया लेकिन भाजपा ने शिकायत की, यह ऑफिस ऑफ प्राॅफिट यानी दोहरे लाभ का केस है। इस पर गवर्नर ने चुनाव आयोग का मंतव्य मांगा था। जैसा कि पहली सितंबर को महागठबंधन प्रतिनिधिमंडल को राज्यपाल ने बताया था, ‘चुनाव आयोग का मंतव्य उनको हासिल हो गया है। जल्द ही वे इस पर निर्णय लेंगे’।

हेमंत की परेशानी यह है कि यदि उनको विधायकी से अयोग्य ठहरा दिया गया तो उनको क्या करना चाहिए। 15 सितंबर को व्यक्तिगत तौर पर राज्यपाल रमेश बैस से मिलकर उन्होंने चुनाव आयोग के मंतव्य की प्रति मांगी, जबकि पखवाड़ा भर पूर्व पहली सितंबर को ही उनके वकील वैभव तोमर चुनाव आयोग को पत्र लिखकर रेफरेंस केस 3(जी)/2022, भाजपा बनाम हेमंत सोरेन मामले में उसके मंतव्य की प्रति की मांग कर चुके थे। जबतक चुनाव आयोग के लिफाफे का सच सामने नहीं आता, तबतक ऊहापोह कायम रहना लाजिमी है। हेमंत पर मामले और भी हैं, लेकिन फौरी तौर पर यही केस असल सरदर्द है।

इन घटनाक्रमों के बीच हेमंत ने नेतरहाट में एक कार्यक्रम में यह कहकर भाजपा पर वार किया कि मुझे सत्ता से बेदखल करने की साजिश रची जा रही है। राज्य का केंद्र पर बकाया 1.36 लाख करोड़ रुपये मांगा तो केंद्रीय एजेंसियां पीछे लगा दी गईं। फिर उन्होंने ट्विट किया, हम डरने वाले नहीं, लड़ने वाले लोग हैं। हमारे पूर्वजों ने बहुत पहले ही हमारे मन से डर-भय निकाल दिया है।

राज्य में एक तरफ विपक्षी भाजपा तरह-तरह के कार्यक्रम चला रही है तो दूसरी तरफ हेमंत धड़ाधड़ लोकलुभावन फैसले ले रहे हैं। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर राजकीय जनजातीय महोत्सव में हेमंत ने ऐलान किया, अब कोई आदिवासी महाजनों और साहूकारों का कर्ज नहीं लौटाएगा। आदिवासी परिवार में विवाह या मृत्यु के मौके पर सामूहिक भोज के लिए सौ किलो चावल और दस किलो दाल दी जाएगी। ऐसे ही उन्होंने राज्य के करीब 70 हजार पुलिसकर्मियों को हर साल 20 दिनों का क्षतिपूर्ति अवकाश देने का निर्णय लिया। इतना ही नहीं, दिल्ली पुलिस की तर्ज पर झारखंड के पुलिसकर्मियों को साल में एक माह का अतिरिक्त वेतन देने का प्रावधान भी किया। इससे इंस्पेक्टर से लेकर चतुर्थ श्रेणी के पुलिसकर्मी तक लाभान्वित होंगे। इसी दौर में 50 हजार स्कूली शिक्षकों के लिए पद सृजित किये गए।

इसी प्रकार हेमंत सरकार ने पारा शिक्षकों को 04 प्रतिशत वेतन वृद्धि के साथ-साथ उनकी सेवा पुस्तिका खोलने और प्रशिक्षित के समान ही अप्रशिक्षित शिक्षकों को भी वेतन देने की स्वीकृति दी। इससे तकरीबन 65 हजार पारा शिक्षक लाभान्वित होंगे। अरसे से आंदोलनरत आंगनबाड़ी सेविका-सहायिका का मानदेय बढ़ाकर क्रमशः 9,500 और 4,750 रुपये कर उनके भविष्य निधि खाते में 6 प्रतिशत अतिरिक्त अंशदान देने की घोषणा भी हेमंत सरकार का एक बड़ा कदम है। इससे राज्य की करीब 38 हजार सेविकाएं-सहायिकाएं लाभान्वित हुई हैं। ऐसे ही हेमंत ने पहली सितंबर से पुरानी पेंशन योजना बहाल कर करीब सवा लाख सरकारी कर्मचारियों की वाहवाही लूटी।

हेमंत एक तरफ अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं तो दूसरी तरफ 2024 के चुनावों पर भी उनकी नजर है। उनके लोक लुभावन फैसले यही इंगित कर रहे हैं। ये फैसले निश्चय ही भाजपा के लिए चुनौती हैं। अलग बात है कि ‘32 के खतियानी निर्णय का कांग्रेस खेमे से ही विरोध शुरू हो गया है। पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा और उनकी पत्नी गीता कोड़ा, जो राज्य में कांग्रेस की एकमात्र लोकसभा सदस्य होने के साथ-साथ संगठन की प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष हैं, के अलावा झरिया की विधायक पूर्णिमा नीरज सिंह ने खुलकर विरोध किया है। उनके चुनाव क्षेत्र में ऐसे लोगों की तादाद बहुत है, जो ‘32 के खतियानी नहीं हैं। कोड़ा दंपति का कहना है कि यह निर्णय लागू हुआ तो अकेले कोल्हान क्षेत्र के 45 लाख लोग रिफ्यूजी हो जाएंगे। इस विषय पर आंदोलन अस्वाभाविक नहीं क्योंकि कोल्हान का सर्वे सेटलमेंट 1964, 1965 और 1970 में हुआ था। ऐसे में 1932 का खतियान कैसे चलेगा? और तो और 14 सितंबर की कैबिनेट बैठक के बाद हेमंत जब झारखंड मंत्रालय के पहले तल्ले से नीचे उतर फोटो सेशन के दौर से गुजर रहे थे, तो उनके ठीक आगे खड़े स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता का हाव-भाव नाराजगी भरा था।

झारखंड का असल राजनीतिक दर्द आदिवासी और ओबीसी वोट है। पिछले चुनाव में राज्य की कुल 28 जनजातीय विधानसभा सीटों में से 26 पर महागठबंधन का कब्जा हो गया था, जबकि ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत कर हेमंत सरकार ने प्रभावशाली कुड़मी/महतो वोटों पर भी डोरे डालने का उपक्रम कर दिया है। ऐसे में सियासी रस्साकशी तेज होने की आशंका बन गई है क्योंकि 2019 के पहले भाजपा तकरीबन दर्जन भर जनजातीय सीटें पा लेती थी। ये सीटें सरकार बनाने या सत्ता से बाहर रखने की कुंजी हैं। ‘32 का खतियानी मामला भले ही अदालत में न टिके, वोटरों तक संदेश तो चला ही गया। कहने की बात नहीं कि राजनीति संदेश/परसेप्शन का ही खेल है। बाकी तो सत्ता में जो भी रहता है, कम-बेसी काम करता ही है।

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