Hindu Saints organise religious conference : पंचकोसी परिक्रमा में झलकती है बिहार की संस्कृति, धार्मिक पर्यटन में होता है साधु-संतो का जुटान

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बिहार/बक्सर: बिहार के परंपरागत खान-पान के साथ पांच कोस की परिक्रमा, जहां धर्म-अध्यात्म की बयार के बीच मन को मिलती है शांति। उस कल्पना के साथ उत्सव में बीत जाते हैं पांच दिन, जब प्रभु श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण संग यहां पहुंचे होंगे। बक्सर के गांवों में पांच दिनों तक मनाए जाने वाले इस उत्सव को कहते हैं पंचकोसी परिक्रमा या यूं कहें कि धार्मिक पर्यटन। कोरोना संक्रमण काल के कारण दो वर्षों तक यह बाधित रही, इस साल पुनः 24 नवंबर से 28 नवंबर तक पंचकोसी परिक्रमा होगी और उत्सव मनाया जाएगा।

  • पुआ-पूड़ी से लिट्टी चोखा तक

खास बात यह कि हर दिन अलग-अलग गांव में अलग-अलग प्रसाद मिलता है, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उत्तम है। यह प्रसाद इसलिए खाया और खिलाया जाता है, क्योंकि लोगों की आस्था और विश्वास में प्रभु श्रीराम व लक्ष्मण के स्वागत में उन्हें यही व्यंजन परोसे गए थे, जब वे महर्षि विश्वमित्र संग यहां आए थे। इनमें पुआ-पूड़ी से लिट्टी-चोखा तक शामिल है।\

  • सदियों पुरानी परंपरा

वैदिकाचार्य रामनाथ ओझा बताते हैं कि त्रेता युग में जब राक्षस ऋषि-मुनियों की साधना में विघ्न डाल रहे थे, तब महर्षि विश्वमित्र अयोध्या से प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को लेकर यहां आए। उन्होंने यहीं ताड़का वध किया था। इसके बाद ऋषियों से आशीर्वाद लेने अलग-अलग जगहों पर गए थे, जहां उन्हें भोजन में विभिन्न सामग्री परोसी गई। इसलिए यहां अगहन मास में कृष्णपक्ष पंचमी से पांच दिनों तक पंचकोसी परिक्रमा की परंपरा सदियों से चली आ रही है।

  • पांच गांव, पांच प्रसाद

पंचकोसी परिक्रमा का पहला पड़ाव अहिरौली से शुरू होता है, जहां पहले दिन पुआ-पूड़ी का प्रसाद दिया जाता है। दूसरे दिन नदांव गांव में प्रसाद के रूप में खिचड़ी बनाई जाती है। तीसरे दिन भभुअर में श्रद्धालु प्रसाद में दही-चूड़ा ग्रहण करते हैं। चैथे दिन बड़का नुआंव के उद्दालक आश्रम में प्रसाद में सत्तू और मूली चढ़ाई जाती है। यात्रा के अंतिम दिन चरित्रवन में लिट्टी-चोखा का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। इसके बाद देश के विभिन्न हिस्सों से आए साधु-संतों को बसांव मठिया से विदाई दी जाती है।

  • लोक सस्कृति में आज भी वही खानपान

पंचकोसी यात्रा पर शोध करने वाले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. देवेंद्र चैबे बताते हैं कि पंचकोसी में जिन भी व्यंजनों का भोग लगता है, वे आज भी हमारी लोक संस्कृति में खानपान का हिस्सा हैं। एक दिन पुआ-पूड़ी खाते हैं तो अगले दिन सुपाश्य खिचड़ी। पुआ बनाने के लिए आटा और गुड़ को मिलाकर घी में तल दिया जाता है। यह बहुत स्वादिष्ट होता है। दाल-चावल और आलू-गोभी आदि डालकर खिचड़ी बनाई जाती है। यह तो साधु-संतों का भोजन है। चने के सत्तू के साथ मूली पाचक का काम करती है। इसी तरह दही-चूड़ा भी सुपाश्य है। फिर लिट्टी-चोखा, इसके बिना तो भोजपुर का कोई उत्सव ही नहीं हो सकता है।

  • होता है संतों का जुटान

वैदिकाचार्य रामनाथ ओझा कहते हैं, श्सिद्धाश्रमसमं तीर्थ न भूतं न भविष्यति।श् स्कंद पुराण में बक्सर का जिक्र इस श्लोक से हुआ है। इसका अर्थ है कि पृथ्वी पर सिद्धाश्रम के समान न तीर्थ हुआ है और न होगा। आध्यात्मिक नगरी बक्सर का पुराना नाम सिद्धाश्रम और व्याघ्रसर है। यह 88 हजार ऋषि-मुनियों की तपोस्थली रही है। पंचकोसी यात्रा के पहले दिन अहिरौली में गौतम ऋषि के आश्रम में संतों का जुटान होगा। ऐसी मान्यता है कि यहां गंगा तट पर भगवान श्रीराम ने अहिल्या का उद्धार किया था। यात्रा के दौरान साधु-संत एवं श्रद्धालु नदांव, भभुअर, बड़का नुआंव का भ्रमण करते हुए 28 नवंबर को चरित्रवन पहुंचेंगे। प्रभु श्रीराम इन-इन जगहों पर ही गए थे। आयोजन समिति के अध्यक्ष बसांव पीठाधीश्वर अयुत प्रपन्नाचार्य जी महाराज कहते हैैं कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित इस पंचकोसी परिक्रमा का अनुगमन निरंतर होता आ रहा है। जिस मार्ग पर प्रभु चले हों, उस पर चलने से शांति मिलती है।

  • नदांव में नारद आश्रम, भभुअर में भार्गवाश्रम

प्रभु श्रीराम भ्राता लक्ष्मण के साथ प्रथम पड़ाव में अहिरौली स्थित गौतम आश्रम पहुंचे थे। अनुष्ठान का दूसरा पड़ाव नदांव में नारद आश्रम होता है। श्रद्धालु यहां बड़े से तालाब की परिक्रमा कर रात यहीं व्यतीत करते हैं। तीसरे पड़ाव में पड़ाव में भभुअर का भार्गवाश्रम है, जहां संतों का प्रवचन होता है। चैथा दिन बड़का नुआंव के उद्दालक आश्रम में व्यतीत होता है। पांचवें दिन चरित्रवन में महर्षि विश्वमित्र के आश्रम से भोजन कर प्रभु विदा हुए थे। इसलिए अंतिम पड़ाव यह होता है, जहां लिट्टी-चोखा उत्सव मनाया जाता है। अंतिम दिन बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैैं। इस परिक्रमा में उत्तरप्रदेश और झारखंड से भी श्रद्धालु आते हैं।

  • सरकारी स्तर पर सुविधा मिले तो बेहतर

पंचकोसी परिक्रमा समिति बक्सर के सदस्य डा. रामनाथ ने कहा कि इस धार्मिक पर्यटन के लिए सरकार के स्तर पर तो कोई टूर पैकेज नहीं है, पर स्थानीय स्तर पर आटो और वाहन चालक टूर इसके लिए प्रतिदिन पांच सौ से सात सौ रुपये लेते हैं। आयोजन समिति साधु-संतों के लिए बस का इंतजाम करती है। सरकारी स्तर पर भी सहयोग मिले तो श्रद्धालुओं को बहुत सुविधा मिलेगी।

साभार : दैनिक जागरण

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