Holi-होली Festival 2021 : रंगों का त्योहार एवं भाईचारे का संदेशवाहक

पिछले साल ताजा-ताजा उभरे कोरोना संकट के कारण तो इस वर्ष 28-29 मार्च की होली, कोरोना के दूसरे उभार के कारण झूम-झूमकर होली मनाने पर आई आफत ने मशहूर होली गीत ‘भर फागुन बुढ़वा देवर लागे’ का रस बहुत हद तक फीका कर दिया है। कोराना नामक अदृश्य विषाणु ने अत्यंत संक्रामक और घातक महामारी कोविड-19 फैलाकर आम जन जीवन की तरह उत्सवों को भी एक तरह से कैद कर लिया है।

इसके बावजूद कहने की बात नहीं कि होली का नाम लेते ही या इस शब्द की याद आते ही तन-मन तरंगित होने लगता है। यह है ही ऐसा रंगों का त्यौहार, जो बुराई पर भलाई की जीत, भाईचारे का संदेशवाहक और असीम आनंद का न केवल प्रतीक है, अपितु हमें  अत्यंत सकारात्मक और ऊर्जा से सराबोर महासागर में तैरने को विवश कर देता है। अब तो इसकी धमक भारत से दूर पश्चिमी देशों में भी देखने को मिलने लगी है। जहां-जहां भारतवंशी गये, वहां-वहां होली। है न अद्भुत और चामत्कारिक उत्सव। यह वह उत्सव है, जब गरीब-अमीर और बच्चे-बूढ़े का भेद मिट जाता है। सभी एक-दूसरे को रंगीन कर एक साथ आनंद के सागर में गोते लगाते हैं।

होली की पौराणिकता और कथा प्रायः सभी जानते हैं। प्राचीन काल में हिरण्यकश्यपु नामक एक असुर राजा हुआ करता था। उसकी एक दुष्ट बहन होलिका थी। हिरण्यकश्यपु स्वयं को भगवान मानता था। वह भगवान विष्णु का विरोधी था।

उसका एक पुत्र था प्रह्लाद, जो भगवान विष्णु का परम भक्त था। हिरण्यकश्यपु ने प्रह्लाद को भगवान विष्णु के महिमा गायन से मना किया, लेकिन वे नहीं माने। इससे नाराज हिरण्यकश्यपु ने प्रह्लाद को मार डालने का प्लान किया। उसने होलिका को इस कार्य के लिए तैयार किया, क्योंकि उस पर अग्नि का प्रभाव नहीं पड़ता था, जबकि प्रह्लाद को जलाकर मार डालने का प्लान था।

इसके पहले प्रह्लाद पर कई तरह के आक्रमण कराये गये थे लेकिन हर बार वे बच निकले थे। इसलिए नई कपट नीति के तहत प्रह्लाद को गोद में लेकर होलिका को चिता पर बैठाने का षडयंत्र रचा गया था। यह कुकृत्य फाल्गुन पूर्णिमा को किया गया था। हिरण्यकश्यपु तब हैरान रह गया, जब चिता में होलिका जल मरी और भक्त प्रह्लाद हरिनाम भजते-मुस्कुराते बिना किसी नुकसान के बचे रहे। भारत सहित कई देशों में अग्नि को एक तो ऐसे ही अत्यंत पवित्र माना जाता

है, दूसरे चिता की अग्नि को अपेक्षाकृत अधिक पवित्र समझा जाता है। जिस अग्नि में होलिका जैसी दुष्टा का दाह हुआ हो, उसकी पवित्रता का अंदाजा लगाया जा सकता है। यही कारण है कि होली की पूर्व रात्रि में गांव-गांव, मुहल्ले-मुहल्ले होलिका दहन किया जाता है। इस पवित्र अग्नि में शरीर में लगी उबटन के उच्छिष्ट को जलाकर यह माना जाता है कि शरीर के कई रोगों को जला दिया गया। इसी तरह इस मौसम की ताजा उपज गेहूं, जौ और चना को डंठल समेत भूनकर खाया जाता है। यह एक तरह से प्रकृति का भी उत्सव हुआ।

होली उत्सव ऐसे समय में मनाने की परंपरा है, जब प्रकृति का यौवन चरम पर होता है। वृक्षों के फूलने और नये पत्ते उगने का यह समय होता है। जगह-जगह टेसू के मादक फूल, आम-जामुन के मंजर सुवासित कर रहे होते हैं। फूल और मंजर ऐसे ही तरूणाई के द्योतक हैं।

मतलब, जब चारों ओर तरूणाई बिखरी होती है, तो होली की मस्ती बूढ़ी रगों में भी जवानी भर देती है। शारीरिक तौर पर भले ही यह जवानी बूढ़ों में न दिखती हो किंतु मानसिक तौर पर वे भी मस्ती से भर जाते हैं।

… कुछ ऐसे वातावरण में जब रंग-गुलाल उड़ाए जाते हैं तो बच्चे-बूढ़े का भेद मिट जाता है। इसीलिए गाया जाता है, भर फागुन बुढ़वा देवर लागे…। इसी कारण इसे मदनोत्सव भी कहते हैं।

भारतीय त्यौहारों का महत्व केवल उनकी धार्मिकता में ही नहीं है, अपितु उनमें प्रकृति के संग चलने, स्वच्छता, अपनापन, नयापन और आनंद का भी समावेश होता है। होली को ही देखिए तो इस मौके पर घर-मकान की सफाई तो कराई ही जाती है, किसी न किसी बहाने नालियों-गलियों की भी सफाई हो जाती है।

जब चारों तरफ स्वच्छता का वातावरण हो, मस्ती भरा गायन-वादन हो, समाज में परस्पर भाईचारे के साथ मिलन और जुटान हो तो जाहिर है कि पुए-पक्वान भी चलेंगे ही।

इस महत्वपूर्ण, गरिमामय और पवित्र त्यौहार का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि बसंत पंचमी के बाद से ही इसकी तैयारियां प्रारंभ कर दी जाती हैं। होली गायन उसी समय से शुरू हो जाता है। यह सामान्य व्यवहार की बात है कि जिन-जिन परिवारों के सदस्य घर से दूर रोजगार कर रहे होते हैं, उनकी हरसंभव कोशिश होती है कि होली अपने परिवारीजन के साथ ही मनाएं। वे इस अवसर पर अपने गांव-घर आना नहीं भूलते।

भारत विविधता भरा सामासिक-सांस्कृतिक देश है। यहां होली जैसे त्यौहार प्रायः हर जगह मनाए जाते हैं। फर्क सिर्फ उनके आयोजन में होता है। बिहार, झारखंड, दिल्ली आदि में इसे रंगोत्सव के ही रूप में मनाया जाता है, जबकि ब्रजभूमि में पखवाड़े भर आयोजन होता है, जिसमें लठमार होली बहुत ही मशहूर है। राधा रानी की ससुराल बरसाना सहित नंदग्राम, वृंदावन आदि में फाल्गुन पूर्णिमा से पूर्व कान्हा स्वरूप पुरुष गोपिकाएं बनीं महिलाओं पर रंग डालते हैं, जबकि महिलाएं पुरुषों पर लाठियां बरसाती हैं।

पुरुष सिर पर मोटी पगड़ी बांधकर ढालनुमी चीज सिर पर धारण कर लेते हैं, जिस पर महिलाएं लाठियों या कपड़े के कोड़े से प्रहार करती हैं। कुमाऊं में गीत बैठकी होती है, जिसमें शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियां होती हैं। हरियाणा की धुलकी में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने की प्रथा प्रचलित है। एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाने की प्रथा हो कि लठमार होली की अथवा देवरोंको सताने की, यह सब बहुत ही प्रेम और स्नेह से किया जाता है।

यह प्यार की मार होती है, न कि दुश्मनागत की। समाज में हैं, सामाजिक हैं तो प्यार के तमाचे भी सहने पड़ेंगे और साथ में आनंदपूर्वक पुए-मालपुए भी खाएंगे। इस बार की होली में कोरोना भले ही प्रभावी है, लेकिन वह परस्पर प्रेम और भाईचारे के आदान-प्रदान में कतई बाधक नहीं बन सकता क्योंकि हम अपनी संस्कृति से न तो विमुख हो सकते हैं, न ही अपनापन भूल सकते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *