आईआईटी शोधकर्ताओं ने इस्केमिक स्ट्रोक का जल्द पता लगाने के लिए बनाया आसान उपकरण

मंडी, 29 सितंबर। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मंडी) के शोधकर्ताओं ने स्ट्रोक का जल्द से जल्द पता लगाने का आसान, पोर्टेबल और सस्ता उपकरण (डिवाइस) का विकास किया है।

स्ट्रोक की वजह मस्तिष्क में निरंतर खून नहीं पहुंचना है जिसका पता लगाने के इस डिवाइस के विकास में पीजीएमआईईआर चंडीगढ़ का सहयोग लिया गया है। डिवाइस और इसके उपयोग के बारे में हाल ही में आईईईई सेंसर जर्नल में एक शोध पत्र प्रकाशित किया गया था। यह शोध पत्र संयुक्त रूप से डॉ. शुभजीत रॉय चौधरी, एसोसिएट प्रोफेसर, स्कूल ऑफ कंप्यूटिंग एंड इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, आईआईटी मंडी, और उनके छात्र दालचंद अहिरवार के साथ-साथ डॉ. धीरज खुराना, पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़ ने तैयार किया है।

इस्केमिक स्ट्रोक का भारतीय आंकड़ा चिंताजनक है। हर साल हर 500 भारतीयों में एक स्ट्रोक को लगता है। इसका कारण मस्तिष्क में पूरा खून नहीं पहुंचना या रुक-रुक कर पहुंचना है। सर्वे बताते हैं कि स्ट्रोक के कुल मामलों में लगभग 10 प्रतिशत से 15 प्रतिशत 40 वर्ष से कम उम्र के लोगों में देखा गया है। इसके उपचार की कारगर व्यवस्था और इलाज इस पर निर्भर करता है कि समस्या का जल्द से जल्द पता चले और निदान शुरू किया जाए। वर्तमान में मैग्नेटिक रेज़ोनेंस इमेजिंग (एमआरआई) और कंप्यूटर टोमोग्राफी (सीटी) को इस्केमिक स्ट्रोक का पता लगाने का सबसे सटीक परीक्षण (गोल्ड स्टैंडर्ड) माना जाता है। ये निदान निस्संदेह भरोसंद हैं लेकिन इनके लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर और लागत काफी अधिक है।

गौरतलब है कि देश में प्रत्येक 10 लाख लोगों पर केवल एक एमआरआई सेंटर है।

शोध के बारे में आईआईटी मंडी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शुभजीत रॉय चौधरी ने बताया, “हमारा प्रयास जहां मरीज है वहीं इस्केमिक स्ट्रोक की सटीक जांच के लिए सस्ता डिवाइस तैयार करना है। खास कर गांव-देहात में मरीजों को इसका बहुत लाभ होगा। साधनहीन और दूरदराज के पिछड़े क्षेत्रों में समय से निदान मिलेगा। हमारी टीम ने एक छोटा वियरेबल डिवाइस डिजाइन और उसका विकास किया है जो नियर इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी डायोड (एनआईआरएस एलईडी) के उपयोग से इस्केमिक स्ट्रोक का पता लगाने के लिए 650 एनएम से 950 एनएम रेंज़ में प्रकाश उत्सर्जन करता है। यह प्रकाश खून के रंगीन घटकों जैसे हीमोग्लोबिन से प्रतिक्रिया करता है और खून के विशेष लक्षणों को सामने रखता है जैसे संबंधित हिस्से में ऑक्सीजन सैचुरेशन, ऑक्सीजन उपयोग और खून की मात्रा का सूचक।

आईआईटी मंडी की टीम ने इस्केमिक स्थितियों में ‘फोरआर्म’ और मस्तिष्क के ‘फ्रंटल लोब’ में जैव-मार्करों का अध्ययन किया। शोधकर्ताओं ने अपने डिटेक्टर प्रोटोटाइप के वैलिडेशन के लिए फोरआर्म का एक्सपेरिमेंटल ऑक्ल्जून किया और फिर फ्रंटल लोब पर इस्केमिक स्ट्रोक उत्पन्न किया और यह पाया कि डिवाइस में निदान की बेजोड़ क्षमता है।

शोध के बारे में आईआईटी मंडी के शोध विद्वान दालचंद अहिरवार ने कहा, “हमें प्राप्त जानकारी के अनुसार संयुक्त मैट्रिक्स से खून में हीमोग्लोबिन की अस्थायी गतिविधि दिखती है, जिसकी मदद से उस हिस्से के टिश्यू में खून के नहीं पहुंचने या रुक-रुक कर पहुंचने का आसानी से पता लगाया जा सकता है। हम ने इस्केमिक स्थितियों का अध्ययन करने के लिए ऑक्सीजन सैचुरेशन, संबंधित हिस्से में ऑक्सीजन की खपत और खून की मात्रा सूचकांक जैसे बायोमार्करों का उपयोग किया है जो अन्य तकनीकों की तुलना में इस्केमिक स्थितियों का अधिक सटीक अनुमान दे सकते हैं।”

भारतीय आबादी में स्ट्रोक का खतरा बढ़ रहा है। इसलिए भारत सरकार कैंसर, मधुमेह, हृदय रोग और स्ट्रोक की रोकथाम और नियंत्रण के लिए अपने राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपीसीडीसीएस) के तहत स्ट्रोक समेत सभी गैर-संक्रामक रोगों के लिए विभिन्न स्तर पर जल्द से जल्द जांच और उचित निदान व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित कर रही है। आईआईटी मंडी टीम द्वारा हाल में विकसित डिवाइस से पूरे देश में स्ट्रोक का इलाज सुलभ कराने में मदद मिलेगी।

वार्ता

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