Illusion in Petrol-Diesel Price Prevail : पेट्रोल-डीजल की कीमत में पांच टके का छलावा ?

Shyam-Kishor

नरेंद्र मोदी सरकार पहली बार पेट्रोल पर पांच रुपये प्रति लीटर और डीजल पर दस रुपये प्रति लीटर एक्साइज टैक्स की कटौती कर अपनी उदारता दिखाना चाह रही है लेकिन दिवाली के ऐन पहले तीन नवंबर को की गई इस घोषणा का निहितार्थ कुछ और है। उसके ठीक एक दिन पहले उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने होली तक न केवल मुफ्त राशन योजना चालू रखने की बात कही, अपितु दाल, एक लीटर सरसों तेल और नमक भी देने का ऐलान किया। सरकार के इस कदम को भाजपा और एनडीए वाले परम दयालुता मान रहे हैं, जबकि गैर-एनडीए दल इसे वोट बिछुड़ने के डर से लिया गया निर्णय करार दे रहे हैं। इन सबसे अलग हमें नागरिक की हैसियत से यह मान कर चलना होगा कि सत्ता का चरित्र एक ही होता है, चाहे वह जिस दल के हाथ में हो। सत्ता का स्वभाव क्रूरतम होता है, हालांकि वह स्वयं को जनाभिमुख, लचीला और दयालु बताने में कतई नहीं हिचकती। यदा-कदा वह निहायत फिल्मी अंदाज में टेंसुए बहाने में भी बाज नहीं आती।

मोदी भक्तों को यह लग सकता है कि जो लोग पेट्रोल, डीजल की कीमतों और महंगाई को लेकर हायतौबा मचा रहे थे, वे ईंधन तेलों की कीमतों में दी गई राहत की सराहना क्यों नहीं कर रहे? छोटी दिवाली की रात जब सरकार ने उक्त घोषणा की तो मीडिया के एक बड़े वर्ग ने इसे दिवाली का उपहार, तोहफा और राहत जैसी संज्ञा दी। क्या सरकार का यह कदम वाकई उपहार, तोहफा या राहत है या इसके पीछे छिपी मंशा कुछ और है? सरकार इतनी ही संवेदनशील है तो पिछले वर्षों आये दिन हर सामग्री की बढ़ती रही कीमतों और ईंधन तेलों की दर में तो अमूमन हर दिन कुछ पैसे जोड़ते रहने की फितरत पर उसने ब्रेक क्यों नहीं लगाई? जब हर सामान की कीमत हिमालय बन गई, तब उसके द्वारा ईंधन तेलों की कीमत में ऊंट के मुंह में जीरे की छौंक के समान की गई इस कटौती का व्यापक असर पड़ने से तो रहा।

जरा सोचिए, हिमाचल, बंगाल, राजस्थान आदि राज्यों में हुए उपचुनावों में मिली शिकस्त और यूपी, उत्तराखंड आदि पांच राज्यों में छह महीने के अंदर होनेवाले चुनावों का मोदी सरकार के इस कदम से क्या कोई रिश्ता-वास्ता नहीं है?

मोदी के हनुमान कहे जाने वाले अमित शाह ने पिछले हफ्ते लखनऊ में मार्के की एक बात कही। उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी को जीत दिलानी है तो 2022 के यूपी चुनाव में योगी को जिताना होगा। इस एक वाक्य में अमित शाह ने बड़े कायदे से सारी पीड़ा रख दी। अगले वर्ष योगी नहीं लौटे तो 2024 में मोदी भी नहीं लौटेंगे।

इस लिहाज से योगी बड़े हुए कि मोदी, इस बात को अलग रखकर इतना तो समझा ही जा सकता है कि योगी पर मोदी का भविष्य टिका हुआ है।

2014 में गला फाड़कर ‘बहुत सही महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार’ चिल्लाने वाली भाजपा पिछले सात वर्षों से बढ़ रही महंगाई और दिनोंदिन गरीबी की ओर जा रहे मध्य वर्ग के प्रति अजीबोगरीब तर्क ढूंढती रही है। लोग-बाग उन तर्कों को चाहे भले ही न स्वीकारते हों लेकिन वोट मोदी को ही देते रहे हैं, तभी तो 2019 में उनकी शानदार वापसी हुई। 545 सीटों के सापेक्ष 303 सीटें हासिल कर उन्होंने भाजपा को चरम पर पहुंचा दिया। विपक्ष मुंह दिखाने के काबिल न रहा। कोई भी विपक्षी दल तीन अंकों की कौन कहे, सम्मानजनक दो अंकों तक नहीं जा सका। मोदी-शाह की भाजपा ने भारत को जो सपने दिखाए, जो वादे किये और उसके जो इरादे सामने आये, उस स्थिति में सवाल तो उससे ही किये जाएंगे, सारी जवाबदेही उसको ही लेनी होगी।

अब देखिए, तेल और तेल की धार। याद करिए, चाहे बंगाल का चुनाव रहा हो या ऐसे किसी अन्य बड़े राज्य का, इन मौकों पर अज्ञात कारणों से ईंधन तेलों की कीमतें या तो स्थिर रहीं या उनमें दस-बीस पैसे की कमी दर्ज की जाती रही। कहा यह भी जाता है कि दिल्ली की सत्ता की राह उत्तरप्रदेश से होकर जाती है और उत्तरप्रदेश में राजनीतिक दलों ने अपने-अपने ढंग से चुनावी बिगुल बजा दिया है। ऐसे मौके पर केंद्र सरकार द्वारा दिखायी गई ‘उदारता’ संदेह से परे नहीं है।

एक तो किसान आंदोलन, दूसरे उत्तरप्रदेश में बदल रहा जातीय ध्रुवीकरण भाजपा के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है। अमित शाह की बोली, योगी द्वारा मुफ्तखोरी की खोली गई झोली और ईंधन तेलों की एक्साइज ड्यूटी पर जगा मोदी का आत्मज्ञान समझनेवालों को लिखना कम समझना ज्यादा का संदेश दे रहा है। यह वही तेल है, जिस पर मोदी सरकार ने पिछले छह वर्षों में 250 फीसद एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई। पेट्रोल पर 2014 में जो एक्साइज ड्यूटी 9.48 रुपये प्रति लीटर थी, वह मोदी की ताजा घोषणा के पहले 32.90 रुपये थी। इसी प्रकार डीजल पर 2014 में एक्साइज ड्यूटी 3.56 रुपये प्रति लीटर थी, जो तीन नवंबर 2021 तक बढ़कर 21.80 रुपये तक जा पहुंची थी। नवंबर 2017 में जो पेट्रोल 69.14 रुपये लीटर मिलता था, वह बीते तीन नवंबर तक 109.69 रुपये लीटर मिलने लगा।

ऐसे ही नवंबर 2017 में जो डीजल 57.73 रुपये लीटर मिलता था, वह तीन नवंबर 2021 को 98.42 रुपये लीटर मिल रहा था। 2020 के प्रथम कोरोना काल में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल कौड़ी के भाव 20 डॉलर प्रति बैरेल मिल रहा था, तब मोदी सरकार ने एक्साइज ड्यूटी का हथकंडा अपनाते हुए घरेलू बाजार में उसकी कीमत घटने नहीं दी। उसके बाद ऑयल कंपनियों ने ओपेक प्राइस के नाम पर उपभोक्ताओं की जेब जिबह करते हुए आये दिन 10,15, 20, 35 पैसे फी लीटर कीमत बढ़ाते हुए उसे सौ के पार पहुंचा दिया। अब सरकार को लगने लगा है कि उसकी नीयत और नीति उसी पर भारी गुजरनेवाली है तो उसने एक्साइज ड्यूटी में मामूली कमी का टुकड़ा उछाल दिया है। खासकर उत्तरप्रदेश का यही आलम बरकरार रहा तो बहुत संभव है कि कुछ और ‘राहती टुकड़े’ फेंके जाएं लेकिन मानकर चलना होगा कि यह फौरी कार्रवाई होगी। सरकार के मुंह में टैक्स और भावना का स्वाद लग चुका है, भले ही कोई इसके तले कुचलकर मरे या सांसें गिने।

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