हिन्दू संस्कृति का प्रतिक ऊँ का सूर्य की आवाज में सुनाई देना अद्भुत: नासा

Insightonlinenews Team

भारतवर्ष आश्चर्यजनक रहस्यों और अचंभित करने वाले तथ्यों का देश रहा है। इसकी सभ्यता का उदय दूसरे सभ्य देशों से कई वर्षों पूर्व ही धरती पर हो चुका था। काल और समय के अनुसार पृथ्वी के दूसरे हिस्सों में जब सभ्यता जन्म ले रही थी तब भारत मानवीय सभ्यता के अपने शिखर था, उसके कई प्रमाण भगौलिक खुदाइयों जैसे मोहन जोदड़ो, हड़प्पा इत्यादि से मिलते हैं। तात्पर्य यह है कि जब पृथ्वी के दूसरे हिस्से में मनुष्य गुफाओं और पेड़ों की छांवों में जीवनयापन कर रहा था तो भारत पक्के भवनों का निर्माण कर रहा था। ईसा से भी 4 हजार वर्ष पूर्व गीता का उदय हुआ था और उसी के लगभग सारे वेदों को भी अलंकृत किया गया था।

भाव यह है कि वेदों में सूर्य की महिमा का वर्णन करते हुए दर्शाया गया है कि ऊँ शब्द का उच्चारण भारत के उसी काल में प्रचलित था और आज भी हिन्दू संस्कृति में प्रचलित है।
ऋग्वेद में विज्ञान सहित ज्ञान का उल्लेख है इसी उल्लेख के तहत ऋग्वेद के एक श्लोक में सूर्य की महिमा का वर्णन है जो दर्शाता है कि सूर्य की आवाज में ऊँ उच्चारण होना आज के विज्ञान के विशेषज्ञ नासा की खोज सही है।

पञ्चारे चक्रे परिवर्तमाने तस्मिन्न् आ तस्थुर् भुवनानि विश्वा |
तस्य नाक्षस् तप्यते भूरिभारः सनाद् एव न शीर्यते सनाभिः ||

(ऋग्वेद 1.164.13)

अर्थात, ये सूर्य अपनी ऑर्बिट यानी कक्षा में घूमता है और बाकी सारे ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं। पृथ्वी भी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। सूर्य ने अपनी शक्ति से समस्त ग्रहों को पकड़ रखा है।

भारतवर्ष की परम्परा प्राचीनतम तो रही ही है, किन्तु सबसे ज्यादा विकसित भी रही है। विचार कीजिए कि क्या ऐसा 4000 वर्ष पूर्व पता करना संभव था? भारत की इस प्राचीन परंपरा को नासा भी प्रमाण स्वरूप प्रणाम करता है।

आदर्शेयं सुप्राणीनां भूतानां सुगतीप्रदाम्।
तारिणी सर्व पापेभ्यः वन्दे आर्ष परम्पराम्।। (स्वरचित)

नमो नमस्ते!

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