Jain Religion Update : तृप्ति भोग से नहीं, योग साधना से होती है : श्रमण मुनि विशल्य सागर

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जिनवाणी की देशना सर्वत: कल्याणकारी है। जिनवाणी की देशना के बिना कल्याण नहीं हो सकते। जिनेंद्र की वाणी अमृतमयी है। तत्व बोध आत्म शोध का कारण है, तत्व बोध के बिना आत्म शोध संभव नहीं है, तथा तत्व बोध तत्व देशना से संभव होता है। श्री दिगंबर जैन पंचायत मंदिर में विराजमान श्रम आगम प्रवक्ता श्रमण मुनि विशल्य
सागर ने अपने प्रवचन में उक्त बातें कहीं।

उन्होंने कहा कि बोध के बिना बोधी नहीं और बोधी के बिना समाधि नहीं। स्वयं को देखने की दृष्टि आत्मज्ञान से मिलती है। आत्मज्ञान के अभाव में आतर्ध्यान होता है। आचार्य कहते हैं कि जैसे दो तत्व ज्ञान होता है वैसे दो सुलभ विषय पदार्थ अरुचिकर लगने लगते हैं। जिसका जीवन तत्वज्ञान रहित है उसके जीवन में विषय भोग पदार्थ रुचिकर प्रतीक होते हैं। जिसने जीवन में त्याग का भी त्याग कर दिया , वह योगी है। क्योंकि तृप्ति, भोग से नहीं योग साधना से होती है। मुनि श्री ने कहा कि यदि पदार्थ सुख का कारण बन जाए तो हमेशा वह सुख का कारण होना चाहिए।

वह कभी दुख का कारण नहीं होना चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की है कि हमारी दिशा बदल जाए । हमारा ज्ञान जिस ओर भाग रहा है, उसे सही दिशा मिल जाए। यह बोध हो जाए कि शांति बाह्य पदार्थों में नहीं, वस्तुओं के संग्रह में नहीं है। शांति तो आत्मतत्व की ओर आने में है, उसे पाने में है।

बड़े-बड़े वैज्ञानिकों को इस तत्व का बोध जीवन के अंत समय में हुआ, कि जिसके द्वारा दुख होता है, वह असत्य है। सत्य तो वह है, जिसके द्वारा आत्मोत्थ सुख होता है।

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