Jharkhand 12th cabinet birth in waiting : झारखंड का बारहवां मंत्री कौन ?

Insight Online News

-श्याम किशोर चौबे

दो दिन पहले वित्त मंत्री सह कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के अचानक बारी-बारी दिल्ली गमन से सियासी हलकों और सूबाई मीडिया में अनुमानों-अटकलों का दौर शुरू हो गया कि राज्य बारहवां मंत्री कौन होगा? तकरीबन 18 महीने पहले जब झामुमो के हेमंत सोरेन के नेतृत्व में यूपीए सरकार अस्तित्व में आयी थी, तब से मुख्यमंत्री सहित ग्यारह मंत्रियों के भरोसे ही काम चलाया जा रहा है। बीच में  तत्कालीन मंत्री हाजी हुसैन अंसारी के इंतकाल के बाद तो मंत्रिमंडल में कुल जमा दस ही सदस्य रह गये थे। कुछ अरसा बाद पिछली फरवरी में हाजी हुसैन के पुत्र हफीजुल हसन को पिता की कुर्सी नवाजने और उपचुनाव में उनके विजयी होने के बाद उनका दर्जा बरकरार रखने से पहले वाली ग्यारह संख्या बनी रही।

उसके पहले हुए उपचुनाव में दुमका सीट से हेमंत के भाई बसंत के विजयी होने पर उम्मीद थी कि मंत्रियों की बारहवीं बर्थ उनको सौंप दी जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजनीतिक क्षेत्र में अनुमान लगाया जा रहा था कि बसंत को मंत्री की कुर्सी नहीं देने पर सोरेन परिवार में विवाद और तनाव बढ़ जाएगा, लेकिन अभी तक ऐसा भी न हुआ। यूं, बसंत मंत्री न रहते हुए भी प्रभाव में कतई  कम नहीं हैं। उनको मंत्री बनाने पर ही सोरेन परिवार में विवाद बढ़ने की पूरी आशंका है क्योंकि उनकी भाभी सीता सोरेन अपेक्षाकृत वरीय विधायक हैं, जो संभवतः मंत्री न बनाये जाने के कारण ही समय-कुसमय बोली-कुबोली बोलती रहती हैं। यदि बसंत को मंत्री बना दिया गया तो सीता अपने नाम के विपरीत रौद्र रूप धारण कर सकती हैं।

ऐसे में राज्य में बारहवें मंत्री का पद ऊंचाई पर लटका हुआ वह अंगूर है, जिसको देखकर सभी भाई-बंधु संतोष किए रहते हैं कि वह उनके ही पाले में आएगा। 2004 के बाद से ही झारखंड में मंत्री का बारहवां पद अक्सर विवादों में रहा है। नवंबर 2000 में जब यह राज्य अस्तित्व में आया था, तब गठबंधन की विवशताओं को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री और उपमंत्री सहित 27 मंत्री बनाये गये थे। 2004 में भारत सरकार ने केंद्र और राज्यों में मंत्री बनाये जाने का जो फार्मूला अख्तियार किया, उसके तहत सौ से कम विधायकों वाले विधानमंडल में मुख्यमंत्री सहित बारह मंत्री बनाया जाना तय हुआ। सौ से अधिक संख्या वाले विधानमंडलों में कुल सदस्य संख्या का 15 प्रतिशत पद मंत्रियों के लिए निर्धारित किया गया था। झारखंड पहली श्रेणी
का राज्य है।

इस राज्य में अबतक एक बार भी अकेले दल की पूर्ण बहुमत वाली सरकार अस्तित्व में न आने से गठबंधन का ही बोलबाला रहा है। ऐसी परिस्थिति में छोटे दल समर्थन के लिए बड़ा मुंह फाड़ते हैं। उनको शांत रखने का एक ही उपाय ढूंढा गया है, एक पद खाली रखो। यही फार्मूला 2006 में मधु कोड़ा ने आजमाने की कोशिश की थी, लेकिन गठबंधन में शामिल कांग्रेस के दबाव और प्रतिपक्षी भाजपा द्वारा इसे संवैधानिक मुद्दा बनाये जाने के बाद 12 वां मंत्री पद उन्हें भरना पड़ा था। बाद में यही रवायत बन गई लेकिन 2014 में रघुवर दास के नेतृत्ववाली एनडीए सरकार ने पांच वर्ष के अपने पूरे कार्यकाल के दौरान एक न सुनी। आंतरिक और बाहरी दबाव काम न आया। पांच साल बाद 2019 के अंतिम दिनों में जब हेमंत ने सरकार बनायी तो वे भी उसी राह पर चल पड़े। प्रतिपक्षी भाजपा कुछ कहने लायक न रही क्योंकि उसने भी ऐसा ही किया था। रही बात आंतरिक तो सरकार में सहयोगी की भूमिका अदा कर रही कांग्रेस समय-समय पर फुरफुराती जरूर है लेकिन उसके कुल जमा 16 विधायकों के सापेक्ष मिले चार मंत्री पद कम नहीं हैं। और तो और, पहली बार कांग्रेस की चार महिला विधायक जीत कर आई हैं लेकिन उसने इनमें से एक को भी मंत्री पद के लायक नहीं समझा। दूसरी बात यह भी कि कांग्रेस में अब पहले वाली हनक बची नहीं है, जबकि गठबंधन में हेमंत की हनक बढ़ गई है।

बचे-खुचे कार्यकर्ताओं-नेताओं की इस शिकायत से कांग्रेस खुद ही परेशान रहती है कि मंत्री किसी की बात नहीं सुनते। बेचारे सुनें भी किसकी, अपनों से फुरसत मिले तब तो! इन हालात में राज्य में बारहवें मंत्री का पद रिक्त ही रहने की पूरी संभावना है। यह अलग बात है कि कतिपय कुर्सी पिपासु जन न्यूज बाजार में अपने लिए ‘जगह’ बनवाते रहते हैं।

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