Jharkhand BJP update : पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास को भाजपा ने किया पुनः स्थापित

Insight Online News Team

भाजपा की घोषित नई कार्यकारणी समिति ने पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास की पहचान भाजपा के झारखंड ही नहीं देश में भी स्थापित नेता के रूप में बनाई। झारखंड विधानसभा चुनाव भाजपा रघुवर दास के नेतृत्व में लड़ी और सत्ता से बेदखल हो गइ। सत्ता से बेदखली का भाजपा के अधिकतर कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने इसका ठिकरा रघुवर दास पर फोड़ा जो बहुत चर्चित हुआ। विधानसभा चुनाव में चूंकि विपक्ष के पास सारे आदिवासी चेहरे थे और उन चेहरों में बाबूलाल मरांडी भी विपक्ष की भूमिका में थे। जिसका खामियाजा भाजपा को सत्ता से बेदखल होने का भुगतना पड़ा।

इनसाईट ऑनलाइन न्यूज ने अपनी अलग-अलग समीक्षाओं में साफ किया था कि भाजपा को सत्ता में आने के लिए 28 आदिवासी सीटों में से अधिकतर सीटें, अर्थात 14 तक अपने पाले में लानी होगी। विडंबना ये हुई कि आदिवासी चेहरे की कमी के कारण 28 में से सिर्फ 2 सीटें ही भाजपा की झोली में गई, जबकि 2014 में 11 सीटें मिली थी और रघुवर दास की सरकार बनी थी।

बाबूलाल मरांडी को विपक्ष के खेमेे से उठाकर भाजपा में लाने की आलाकमान की नीति भविष्य की रणनीति के तहत की गई।
एक समय लगने लगा था कि रघुवर दास भाजपा में अपनी पैंठ खोते जा रहे हैं लेकिन भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारीणी समिति को उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप मंे सम्मानित करना, भाजपा के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के लिए बड़ा संदेश है।
झारखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा को मात्र 33.37 प्रतिशत मत प्राप्त हुये जबकि लोकसभा चुनाव में भाजपा के मत प्रतिशतों की संख्या लगभग 51.6 थी और विधानसभा में उसे 17.9 प्रतिशत का घाटा हुआ। लोकसभा चुनाव में पूरे देश में जहां नरेंद्र मोदी चेहरा थे वहां झारखंड में हुये लोकसभा चुनाव में उन्हीें के चेहरे पर भारी प्रतिशत मतदान हुआ, जिसका लाभ विधानसभा चुनाव में प्रांतीय चेहरे की वजह से नहीं मिला।

ज्ञातव्य हो कि 2019 के चुनाव में भाजपा को 2014 के मुकाबले मत प्रतिशत अधिक प्राप्त हुये किन्तु गठबंधन पर गलत निर्णय की वजह से वह सत्ता से बेदखल हो गई वहीं सत्तासीन जेएमएम को 2014 से भी 1 प्रतिशत के लगभग कम मत प्राप्त हुये और वो गठबंधन की वजह से सत्ता में काबिज हो गयी। इसलिए भाजपा नेतृत्व ये मानती है कि स्थानीय नेताओं की गलत सूझबूझ का नतीजा भाजपा को भोगना पड़ा।

इनसब को दरकिनार करते हुए रघुवर दास की झारखंड और देश के अन्य भागों में उपयोगिता को देखते हुुए उन्हें भाजपा ने पुनः भारी-भरकम ढंग से स्थापित कर यह संदेश दिया कि भाजपा सोशल इंजिनियरिंग समीकरण का भी पूरा तालमेल रखती है।

भाजपा से अलग हुए सत्ता के लोभ में सरयू राय के लिए भी ऐसा प्रतित होता है कि भाजपा को उनके लिए दरवाजे खोलने से हमेशा परहेज रहेगा। भाजपा की टिकट नहीं मिलने पर सरयू राय द्वारा बागी उम्मीदवार के रूप में भाजपा के खिलाफ ही चुनाव लड़ना उनकी भाजपा के प्रति निष्ठा को एक बड़ा प्रश्न चिह्न लग गया! देखा गया है कि टिकट नहीं मिलने पर जिन नेताओं ने संयम का सहारा लिया वो पुनः अपनी ही पार्टी में बड़े नेता बनकर उभरे।

इसकी एक मिशाल कांग्रेस के डाॅ. रामेश्वर उरांव हैं, जिनकी वफादारी या यूं कहिए लाॅयल्टी पार्टी के प्रति दृढ़ रही जबकि उनका टिकट 2018 के लोकसभा चुनाव में झारखंड के लोहरदगा लोकसभा से काट दिया गया।

डाॅ. रामेश्वर उरांव लोहरदगा लोकसभा क्षेत्र में बहुत लोकप्रिय हैं और यदि वो दूसरे किसी दल से लड़ते तो चुनाव में विजय हासिल कर सकते थे पर उनके संयम और पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता ने आज उन्हें एक बड़े मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया।

विडंबना यह है कि सरयू राय जो भाजपा के स्तंभ माने जाते थे उन्होंने काफी अनरगल बातें पार्टी के खिलाफ बागी उम्मीदवार के रूप में चुनाव में कहीं और पार्टी को अन्य सीटों पर भी भारी नुकसान पहुंचाया। भाव यह है कि रघुवर दास को भाजपा द्वारा पुनः स्थापित किया जाना सरयू राय जैसे अन्य बागी नेताओं के लिए भी एक बड़ा संदेश है।

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