Dumka by Election : दुमका उपचुनाव, आकलन एवं संभावनाएं

Insightonlinenews Team

दुमका विधानसभा सीट में अक्टूबर के लगभग उपचुनाव होने की संभावना है। यह सीट मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 2019 चुनाव में दो सीटों पर विजय प्राप्त करने के बाद खाली की है। झारखंड में झामुमो, कांग्रेस और राजद गठबंधन है और सीटों के बंटवारे में यह सीट झामुमो के खाते में जाती है।

2014 के चुनाव में भाजपा की लुइस मरांडी ने इस सीट पर वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को लगभग 5 हजार मतों से हराकर विजय प्राप्त की थी। वहीं 2019 के चुनाव में हेमंत सोरेन जिन्होंने यह सीट खाली है, भाजपा की लुइस मरांडी को लगभग 13 हजार मतों से हराया।

अब अक्टूबर में चुनाव होने है, परंपरागत इस सीट पर भाजपा और झारखंड मुक्ति मोर्चा के मतदाताओं में ही संघर्ष सीमित रहा है। उपचुनाव में पार्टी के साथ-साथ उम्मीदवार पर भी मतदाताओं की नजर होती है। मतदाताओं की कसौटी में उम्मीदवार का वजन भी काफी मायने रखता है। यह तो चुनाव में उम्मीदवारों की घोषणा के बाद ही साफ हो पायेगा। भाजपा लगभग अपने पूर्व के उम्मीदवार लुइस मरांडी पर ही पुनः दांव लगायेगी। वहीं झामुमो के संभावित उम्मीदवार मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के अनुज का नाम उछाला जा रहा है। देखना यह है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा किस उम्मीदवार पर अपना दांव उपचुनाव में लगायेगी।

हेमंत सोरेन की सरकार को लगभग आठ महीने हो गये और इन आठ महीनों में दुमका विधानसभा क्षेत्र और उसके आसपास में सड़कों एवं पुलों की स्थिति बहुत दयनीय है। जहां सड़कों में बड़े-बड़े गढ्ढे नजर आने लगे हैं वहीं कुछ जगहों पर पुलों के धंसने के भी समाचार आ रहे हैं। आठ महीने की अवधी और कोरोना संकटकाल से उत्पन्न स्थिति के कारण कोई ठोस विकास के कार्यक्रमों में गति नहीं आई है, लेकिन ये जो गढ्ढों और पुल धंसने की चर्चा व्यापक हो रही है इसका दुष्प्रचार भी हो रहा है जो उपचुनाव में झामुमो के लिए गले की हड्डी साबित हो सकता है।

सर्वविदित है कि सड़कों और पुलों और बांधों की वर्तमान स्थिति पिछली सरकार की देन है लेकिन आमजनों की यादाश्त बहुत अल्पकालिन होती है और इसका ठिकरा वर्तमान सरकार पर फुटने की संभावना दुष्प्रचार से बढ़ती नजर आ रही है।

किसानों कीे कर्जमाफी और उचित दर पर खाद् और बीज दिलाने की घोषणाएं समाचार पत्रों में लगातार हो रही है पर धरातल पर अभी तक उतरी नहीं है, जिसका असर ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों और खेतीहर मजदूरों पर साफ दिखाई देता है। दोनों दलों के कार्यकर्मियों द्वारा तीव्र गति से मतदाताओं को अभी से रिझाने का प्रयास चल रहा है पर मतदाताओं की चुप्पी सत्ताधारी दल के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

बाबूलाल मरांडी भाजपा से दुमका लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और एक प्रभावशाली नेता हैं जो वर्तमान में भाजपा की कमान थामे हुये हैं और उनका प्रभाव भी भाजपा के उम्मीदवार के लिए दूर की कौड़ी साबित हो सकता है।

आठ महीने कीे अवधि में कोई भी सरकार करिश्मा नहीं कर सकती पर लोगों की आकांक्षाओं की सीमा में इतना अधिक वेग होता है कि उपचुनाव में उलटी गिनती कराने की होड़ लगा देती है।

दुमका में आदिवासी मतदाताओं के साथ-साथ गैरआदिवासी मतदाताओं तथा अल्पसंख्यक समुदाय की संख्या भी काफी है। 2019 के चुनाव में मुस्लिम एवं किश्चिन अल्पसंख्यक मतदाताओं ने एक मूस्त मत झामुमो गठबंधन को दिये थे। वहीं अन्य समुदायों में दोनों दलों के बीच मतों का बंटवारा हुआ था। जहां खेतीहर किसान जो अधिकतर आदिवासी समुदाय के हैं निराश नजर आ रहे हैं।

झारखंड सरकार द्वारा स्थानीय नीति में बदलाव या रूपांतरण की प्रक्रिया की घोषणा से गैरआदिवासी मतदाता सकते में हैं उसका प्रभाव चुनाव में कितना होगा ये देखना है। गठबंधन के एक घटक द्वारा राम मंदिर निर्माण में भाजपा की डगर अपनाने का असर भी अल्पसंख्यक मतदाताओं को उदासीन कर सकता है।

दुमका उपचुनाव के बहुुत संवेदनशीलन होने की संभावना है देखना है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा अपनी इस प्रतिष्ठित सीट को समेट पायेगा। वहीं क्या भाजपा भी झामुमो से इस सीट को छीनने में सफल हो पायेगा?

आज की परिस्थिति के आकलन में दोनों तरफ मतदाताओं का झुकाव लगभग बराबर-बराबर ही नजर आता है।

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