Jharkhand : कोरोना संक्रमण से आज भी अछूते हैं खूंटी के कई जनजातीय बहुल गांव

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  • चीदी, मालादोन, अंबाटोली सहित कई गांवों में एक भी व्यक्ति नहीं हुआ संक्रमित
  • न मास्क का प्रयोग न ही शरीरिक दूरी से कोई मतलब
  • किसी ने नहीं लिया कोरोना का टीका

अनिल मिश्रा
खूंटी, 16 मई : भले ही आज पूरी दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रहा हो, पर आज भी जनजातीय बहुल कई ऐसे गांव हैं, जहां न तो कोरोना का प्रकोप है और न ही लोगों में इसको लेकर कोई खौफ। आदिवासी बहुल गांव के लोग कोरोना का नाम तो जानते हैं, पर यह है क्या, इससे उनका कोई लेना-देना नहीं है। गांव के लोग न तो कभी मास्क का प्रयोग करते हैं और न ही शारीरिक दूरी का पालन किया जाता है। हां, जब शहर या बाजार जाना होता है, तो पुलिस के भय से मास्क का प्रयोग कर लेते हैं। ऐसे ही तोरपा प्रखंड के मालादोन और कर्रा प्रखंड के चीदी, अंबा टोली आदि गांव हैं, जहां कोरोनो ने अब तक दस्तक नहीं दी है।

चीदी गांव के सेवानिवृत्त शिक्षक अभिमन्यु गोप कहते हैं कि गांव के लोग बहुत कम ही डाॅक्टर या अस्पताल का रूख करते हैं। सर्दी, खांसी, बुखार होने पर गिलोय, कोयनार साग, भेलवा और अन्य परंपरागत जड़ी-बूटियों से अपना इलाज करते हैं।

कोरोना के पहले और दूसरे दौर में भी इन तीनों गांव का कोई भी व्यक्ति कोरोना से संक्रमित नहीं हुआ है। यह अलग बात है कि किसी ने आज तक न तो कोविड का टीका लिया है और न ही कोरोना की जांच करायी है। अभिमन्यु गोप बताते हैं कि गांव के लोग सादा भोजन करने और हाड़तोड़ मेहनत करते हैं। पिछले एक साल के दौरान चीदी, मालादोन और अंबाटोली गांव में किसी की अस्वाभाविक मौत नहीं हुई है। चीदी गांव में लगभग 85 घर हैं, जबकि मामलादोन 55 और और अंबाटोली में 60 घर है।

लाल चींटी के अंडे का भोजन में करते हैं अधिक प्रयोग
चीदी गांव के ही निस्तार आईंद बताते हैं कि वे पेड़ों पर रहने वाली लाल चींटी, जिसे स्थानीय भाषा में देमता या माटा कहते हैं, उसके अंडे का वे अपने भोजन में अधिक से अधिक प्रयोग करते हैं। मसालेदार भोजन तो वे कभी करते ही नहीं। तेल और चिकन-चाऊमिन जैसे शहरी भोजन से वे कोसों दूर रहते हैं।

चीदी गांव के निस्तार आईंद, सुनील हेमरोम, लगनु हेमरोम, मनोहर सांगा और सुनील सांगा कहते हैं कि किसी को बुखार, खांसी आदि होने पर वे अंग्रेजी दवा खाने के बदले पारंपरिक जड़ी-बूटियों से ही इलाज करते हैं और सभी मरीज इसी से ठीक भी हो जाते हैं।

मनोहर आईंद बताते हैं कि कोयनार(कचनार) का साग, गिलोय, घृतकुमारी, हडजोड़, आंवला, इमली के पत्ते, चकोड़ साग जैसी जड़ी-बूटियों का प्रयोग करते हैं। गांव के अधिकतर लोग माड़ भात का ही सेवन करते हैं। सुबह रात का बचा भात और कोई साग अथवा सब्जी खाकर काम करने खेतों में निकल जाते हैं। कड़ी मेहनत के कारण न तो गांव में कोई व्यक्ति ब्लड प्रेशर अथवा ब्लड शुगर से पीड़ित है। गांव में किसी की आंखों पर चश्मा नजर नहीं आता। गांव के ही बताते हैं कि सादा भोजन और कड़ी शारीरिक मेहनत के कारण ही गांव के लोग विभिन्न प्रकार के रोगों से बचे रहते हैं।

हिन्दुस्थान समाचार

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