Khajuraho : कामुक मूर्तियों की नगरी खजुराहो, जहां पत्थर सुनाते हैं इतिहास

Insightonlinenews Desk

खजुराहो भारत के मध्य प्रदेश के छतरपुर स्थित एक प्रमुख शहर है जो प्राचीन एवं मध्यकालीन मंदिरों के लिये लोकप्रसिद्ध है। खजुराहो को प्राचीन काल में खजूरपुरा और खजूर वाहिका के नाम से भी जाना जाता था। मंदिरों का शहर खजुराहो पूरे विश्व में मुड़े हुए पत्थरों से निर्मित मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। खजुराहो को इसके अलंकृत मंदिरों की वजह से जाना जाता है जो कि देश के सर्वोत्कृष्ठ मध्यकालीन स्मारक हैं।

भारत के अलावा दुनिया भर के आगन्तुक और पर्यटक प्रेम के इस अप्रतिम सौंदर्य के प्रतीक को देखने के लिए आते रहते है। हिंदू कला और संस्कृति को शिल्पियों ने इस शहर के पत्थरों पर मध्यकाल में उत्कीर्ण किया था। विभिन्न कामक्रीडाओं को इन मंदिरों में बेहद खूबसूरती के उभारा गया है। यहां का जीवन दर्शन युवाओं और नव युगल में नई ऊर्जा का संचार कर देता है। मूर्तियों की सुंदरता, उनकी भाव-भंगिमा को देखना अद्भुत है।

मूर्तियों की श्रृंखला में 3 कतारों में प्रमुख मूर्तियां थीं। उनके अतिरिक्त कुछ कतारें छोटी मूर्तियों की थीं। मध्य में बने आलों में देव प्रतिमाएं हैं। अधिकतर मूर्तियां उस काल के जीवन और परंपराओं को दर्शाती हैं। इनमें नृत्य, संगीत, युद्ध, शिकार आदि जैसे दृश्य हैं। प्रमुख मूर्तियों में विष्णु, शिव, अग्निदेव आदि के साथ गंधर्व, सुर-सुंदरी, देवदासी, तांत्रिक, पुरोहित और मिथुन मूर्तियां हैं। एक मूर्ति में तो नायक-नायिका द्वारा एक-दूसरे को उत्तेजित करने के लिए नख-दंत का प्रयोग कामसूत्र के किसी सिद्धांत को दर्शाता रहा है।

सेक्स न तो रहस्यपूर्ण है और न ही पशुवृत्ति। सेक्स न तो पाप से जुड़ा है और न ही पुण्य से। यह एक सामान्य कृत्य है लेकिन इस पर प्रतिबंध के कारण यह समाज के केंद्र में आ गया है। पशुओं में सेक्स प्रवृत्ति सहज और सामान्य होती है जबकि मानव ने इसे सिर पर चढ़ा रखा है। मांस, मदिरा और मैथुन में कोई दोष नहीं है, दोष है आदमी की प्रवृत्ति और अतृप्ति में। कामसुख एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है, लेकिन मनुष्य ने उसे अस्वाभाविक बना दिया है।

खजुराहो का इतिहास लगभग एक हजार साल पुराना है। यह शहर चन्देल साम्राज्य की प्रथम राजधानी था। चन्देल वंश और खजुराहो के संस्थापक चन्द्रवर्मन थे। चन्द्रवर्मन मध्यकाल में बुंदेलखंड में शासन करने वाले गुर्जर राजा थे। वे अपने आप को चन्द्रवंशी मानते थे। चंदेल राजाओं ने दसवीं से बारहवी शताब्दी तक मध्य भारत में शासन किया। खजुराहो के मंदिरों का निर्माण 950 ईसवीं से 1050 ईसवीं के बीच इन्हीं चन्देल राजाओं द्वारा किया गया। मंदिरों के निर्माण के बाद चन्देलो ने अपनी राजधानी महोबा स्थानांतरित कर दी। लेकिन इसके बाद भी खजुराहो का महत्व बना रहा।

खजुराहो के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कामकला के आसनों में दर्शाए गए स्त्री-पुरुषों के चेहरे पर एक अलौकिक और दैवी आनंद की आभा झलकती है। इसमें जरा भी अश्लीलता या भोंडेपन का आभास नहीं होता। ये मंदिर और इनका मूर्तिशिल्प भारतीय स्थापत्य और कला की अमूल्य धरोहर हैं। इन मंदिरों की इस भव्यता, सुंदरता और प्राचीनता को देखते हुए ही इन्हें विश्व धरोहर में शामिल किया गया है। इसमें मैथुन क्रिया के आरंभ में आलिंगन व चुंबन के जरिए पूर्ण उत्तेजना प्राप्त करने का महत्व दर्शाया गया है। एक अन्य दृश्य में एक पुरुष शीर्षासन की मुद्रा में 3 स्त्रियों के साथ रतिरत नजर आता है।

कहा जाता है कि चंदेल राजाओं के काल में इस क्षेत्र में तांत्रिक समुदाय की वाममार्गी शाखा का वर्चस्व था, जो योग तथा भोग दोनों को मोक्ष का साधन मानते थे। ये मूर्तियां उनके क्रिया-कलापों की ही देन हैं। वात्स्यायन के कामसूत्र का आधार भी प्राचीन कामशास्त्र और तंत्रसूत्र है। शास्त्रों के अनुसार संभोग भी मोक्ष प्राप्त करने का एक साधन हो सकता है, लेकिन यह बात सिर्फ उन लोगों पर लागू होती है, जो सच में ही मुमुक्षु हैं।

खजुराहो स्थित कन्दारिया महादेव में सबसे अधिक मैथुन (स्त्री-पुरुष संगम मुद्रा) को दिखलाया गया है। काम वासना में डूबे जोड़ो की मुर्तियां ,स्त्री-पुरुष के शारीरिक संबधो को बहुत सुंदर सहज और जीवंत रूपों में दर्शाया गया है। कुछ मुर्तियां इतनी सुंदर और जीवंत लगती है मानो वो अभी बोल पड़ेगी। इनका आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्व भी है तभी तो ये मन्दिरों में प्रतिष्टित है। खजुराहो के प्राय:सभी मन्दिर ग्रेनाईट और बलुआ पत्थर से निर्मित है। यहां गभर्गृह, अंतराल, महामंडप, मंडप तथा अर्द्धमंडप कई मंदिरों में मिलते है। यहा देवताओं, सुन्दरियों, परियोर नाग-कन्याओं की भी सैकड़ो मुर्तियां है। ऐसा कहा जाता है कि लम्बी नाक और लम्बी गर्दन वाली औरतो की मुतिर्या गुप्तकाल की है।

-Agency

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