Khan Abdul Ghaffar Khan : खान अब्दुल गफ्फार खान यानि सीमांत गांधी, एकीकृत भारत की प्रबल आवाज थे

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सीमांत गांधी यानि खान अब्दुल गफ्फार खान उनके कई नाम हैं, कोई उन्हें बाच्चा खान कहता है तो बादशाह खान, कोई सीमांत गांधी तो मुस्लिम गांधी। 6 फरवरी 1890 जन्मे खान अब्दुल गफ्फार खान बलूचिस्तान के महान राजनेता थे। 98 साल की जिंदगी में 35 साल उन्होंने जेल में सिर्फ इसलिए बिताए ताकि इस दुनिया को इंसान के रहने की एक बेहतर जगह बना सकें। उन्हें दो बार नोबेश शांति पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया।

1987 में उन्हें भारत रत्न भी मिला था। उनके दादा आबेदुल्ला खान ने पठानी कबीलाइयों भारत की आजादी के लिए कई लड़ाइयां लड़ी थीं। अजादी की लड़ाई लड़ने की वजह से उन्हें सजा-ए-मौत दी गई थी। उनके दादा सैफुल्ला खान भी आजादी की लड़ाई के सिपाही थे। यानि आजादी की लड़ाई का जज्बा बादशाहर खान को विरासत में मिला था। उनका सिर्फ नाम ही सीमांत गांधी नहीं था बल्कि उनमें वे सभी गुण थे जो महात्मा गांधी में थे।

पेशावर में जब 1919 में फौजी कानून (मार्शल ला) लागू किया गया उस समय उन्होंने शांति का प्रस्ताव पेश किया, फिर भी वे गिरफ्तार किए गए, अंग्रेज सरकार उन पर विद्रोह का आरोप लगाकर जेल में बंद रखना चाहती थी इसलिए उसकी ओर से ऐसे गवाह तैयार करने की कोशिश की गई जो यह कहें कि बादशाह खान के भड़काने पर जनता ने तार तोड़े, लेकिन कोई ऐसा व्यक्ति तैयार नहीं हुआ जो सरकार की तरफ ये झूठी गवाही दे, फिर भी इस झूठे आरोप में उन्हें 6 महीने की सजा दी गई।

एक समय उनका लक्ष्य संयुक्त, स्वतन्त्र और धर्मनिरपेक्ष भारत था, इसके लिये उन्होंने 1920 में खुदाई खिदमतगार नाम के संग्ठन की स्थापना की, यह संगठन श्सुर्ख पोशश् यानि लाल कुर्ती के नाम से भी जाना जाता है। बादशाह खान का कहना था कि हर खुदाई खिदमतगार की यही कसम होती है कि हम खुदा के बंदे हैं, दौलत या मौत की हमें कदर नहीं है और हमारे नेता हमेशा आगे बढ़ते चलते है, मौत को गले लगाने के लिए हम तैयार हैं। उनके बारे में एक किस्सा मशहरूर है।

उनकी पैदाइश के वक्त भारत और पाकिस्तान एक थे लेकिन देश के बंटवारे के बाद वे पाकिस्तान चले गए। 1969 में भारत की प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के बुलाने पर इलाज के लिए वह भारत आए, हवाई अड्डे पर उन्हें लेने इंदिरा गांधी और जयप्रकाश नारायण गए। बादशाह खान हवाई जहाज से बाहर आए तो उनके हाथ में एक गठरी थी जिसमें उनका कुर्ता पजामा था, मिलते ही इंदिर गांधी ने उनकी गठरी की तरफ हाथ बढ़ाकर कहा -इसे हमें दीजिए, हम ले चलते हैं। खान साहब ठहरे, बड़े ठंढे मन से बोले ष्यही तो बचा है, इसे भी ले लोगी? जेपी नारायण और इंदिरा गांधी दोनों ने सिर झुका लिया, जयप्रकाश नारायण अपने को संभाल नहीं पाए उनकी आंख से आंसू गिर रहे थे, बंटवारे का पूरा दर्द खान साहब की इस बात से बाहर आ गया था, क्योंकि वो बटवारे से बेहद दुखी थे, वे भारत के साथ रहना चाहते थे, लेकिन बलूचिस्तान पाकिस्तान के हिस्से में गया था इसलिए उन्हें भी वहीं जाना पड़ा।

उन्होंने भारत की आजादी की कई लड़ाइयां लड़ीं। 1930 में सत्याग्रह करने पर वे जेल भेजे गए। जेल में उनकी जान पहचान पंजाब के अन्य राजबंदियों से हुई। इसी दौरान उन्होंने सिख गुरुओं के ग्रंथ पढ़े और गीता का अध्ययन किया। हिंदु तथा मुसलमानों के आपसी मेल-मिलाप को जरूरी समझकर उन्होंने गुजरात के जेलखाने में गीता तथा कुरान के दर्जे लगाए, जहाँ योग्य संस्कृतज्ञ और मौलवी संबंधित दर्जे को चलाते थे, उनकी संगति से अन्य कैदी भी प्रभावित हुए और गीता, कुरान तथा ग्रंथ साहब आदि सभी ग्रंथों का अध्ययन सबने किया।
वे जवाहर लाल नेहरू, महात्मा गांधी सबके बहुत करीबी थे। 29 मार्च 1931 को लंदन दूसरे गोलमेज सम्मेलन के पहले महात्मा गांधी और तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन के बीच एक राजनैतिक समझौता हुआ जिसे गांधी-इरविन समझौता कहते हैं। इस समझौते के बाद बादशाह खान को जेल से छोड़ दिया गया और फिर वह समाज सेवा में लग गए।

गांधीजी इंग्लैंड से लौटे ही थे कि सरकार ने कांग्रेस पर फिर पाबंदी लगा दी। इसके बाद व्यक्तिगत अवज्ञा का आंदोलन शुरू हुआ, सीमाप्रांत में भी सरकार की ज्यादतियों के खिलाफ मालगुजारी आंदोलन शुरू कर दिया गया और सरकार ने उन्हें और उनके भाई डॉ. खान को आंदोलन का सूत्रधार मानकर पूरे घर को कैद कर लिया। 1934 में जेल से छूटने पर दोनों भाई वर्धा में रहने लगे और इस बीच उन्होंने सारे देश का दौरा किया। 1942 के अगस्त आंदोलन के सिलसिले में वे गिरफ्तार किए गए और 1947 में छूटे।

देश का बंटवारा होने पर उनका संबंध भारत से टूट सा गया लेकिन वे देश के विभाजन से किसी प्रकार सहमत न हो सके, इसलिए पाकिस्तान से उनकी विचारधारा बिल्कुल अलग थी। पाकिस्तान के खिलाफ उन्होने स्वतंत्र पख्तूनिस्तान आंदोलन पूरी जिंदगी जारी रखा। 1970 में वे भारत और देश भर में घूमे, उस समय उन्होंने शिकायत की भारत ने उन्हें भेड़ियों के समाने डाल दिया है और भारत से जो उम्मीद थी, एक भी पूरी न हुई, भारत को इस बात पर बार-बार विचार करना चाहिए, उन्हें वर्ष 1987 में भारत रत्न से सम्मनित किया गया। 1988 में पाकिस्तान सरकार ने उन्हें पेशावर में उनके घर में नजरबंद कर दिया गया। 20 जनवरी 1988 को उनकी मौत हो गई और उनकी आखिरी इच्छानुसार उन्हें जलालाबाद अफगानिस्तान में दफनाया गया।

-एजेंसी

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