Kirti Jha Azad joins TMC : कीर्ति झा आजाद ने ‘हाथ का साथ’ छोड़ थामा ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी का दामन

कोलकाता। कीर्ति झा आजाद ने कांग्रेस का साथ छोड़कर ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी का दामन थाम लिया है। ममता बनर्जी की उपस्थिति में कीर्ति झा आजाद टीएमसी से जुड़े हैं। पार्टी में शामिल होने के बाद कीर्ति झा आजाद ने कहा कि ‘मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में मैं देश के विकास के लिए काम करूंगा। आज देश में उनके जैसे व्यक्तित्व की जरूरत है जो देश को सही दिशा दे सके।

करीब 26 साल तक बीजेपी में रहने के बाद कीर्ति आजाद 2019 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले कांग्रेस में शामिल हो गए थे। कांग्रेस में लगातार साइडलाइन चल रहे कीर्ति आजाद अब टीएमसी के राष्ट्रीय विस्तार अभियान का हिस्सा बन सकते हैं।

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद के बेटे कीर्ति ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत बीजेपी से की थी। वे दिल्ली में गोल मार्केट विधानसभा सीट से विधायक चुने गए थे। दिल्ली में जब शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस ने 15 वर्षों तक एकछत्र राज किया तो कीर्ति ने बिहार को अपना नया राजनीतिक ठिकाना बना लिया। दरभंगा लोकसभा सीट से वे 1999, 2009 और 2014 में लोकसभा के लिए चुने गए थे, लेकिन इसके बाद उन्होंने बीजेपी के बड़े नेता और उस समय राष्ट्रीय महासचिव रहे अरुण जेटली के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

कीर्ति आजाद ने दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था जब जेटली इसके अध्यक्ष थे। उन्होंने वित्तीय घोटाले, सदस्यों को गलत तरीके से भुगतान और बिना टेंडर के गैरकानूनी खरीद-फरोख्त का दावा किया था। कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने आजाद के दावों की जांच के लिए सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिस (एसएफआईओ) की एक तीन-सदस्यीय समिति का गठन किया। समिति ने आजाद के आरोपों में सच्चाई पाई और इशारा किया कि डीडीसीए में हिसाब-किताब रखने के मापदंडों का पालन नहीं किया गया है। रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज ने डीडीसीए और इसके तीन पदाधिकारियों – सुनील देव, एस पी बंसल और नरेंद्र बत्रा पर 4 लाख रुपये का जुर्माना लगाया लेकिन जेटली पर कोई आंच नहीं आई। हालांकि तभी साफ हो गया कि कीर्ति आजाद के लिए बीजेपी में बने रहना मुश्किल होगा।

जेटली के खिलाफ लगातार बयानबाजी के चलते कीर्ति आजाद को 2015 में बीजेपी से निलंबित कर दिया गया। उनके पिता कांग्रेस में रहे थे, इसलिए कीर्ति ने भी कांग्रेस का दामन थाम लिया। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें दरभंगा की बजाय धनबाद से टिकट दिया, लेकिन वे हार गए। इसके बाद उन्होंने फिर से दिल्ली का रुख किया। शीला दीक्षित की मौत के बाद वे दिल्ली में कांग्रेस में अपने लिए बड़ी संभावनाएं तलाश रहे थे। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए कई बार उनके नाम की चर्चा भी हुई, लेकिन कीर्ति के हाथ कुछ नहीं आया।

-एजेंसी

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