Kumbh 2021 : हरिद्वार में महाकुंभ का आगाज, दिव्य और भव्य हुई धर्मनगरी

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एक अप्रैल से देवभूमि उत्तराखंड में महाकुंभ का मेला शुरू हो गया है। हरिद्वार में 1 अप्रैल से शुरू हुआ महाकुंभ 30 अप्रैल तक चलेगा। महाकुंभ मेले की दिव्यता और भव्यता के लिए हरिद्वार में खास इंतजाम किए गए हैं।

कुंभ की उत्पत्ति बहुत पुरानी है और उस काल के समय की है जब समुद्र मंथन के दौरान अमरता को प्रदान वाला कलस निकला था। इस कलस के लिए राक्षसों और देवताओं के बीच भयंकर युद्व हुआ था। अमृत कलस को असुरों से बचाने के लिए जो देवताओं से अधिक शक्तिशाली थे उन देवताओं की सुरक्षा ब्रहस्पति,सूर्य,चंद्र और शनि को सौपीं गई थी। चार देवता असुरों से अमृत कलस को बचाकर भागे और इसी दौरान असुरों ने देवताओं का पीछा 12 दिन और रातों तक किया। पीछा करने के दौरान देवताओं ने कलस को हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में रखा। इस पवित्र समारोह की स्मृति में ही हर 12 साल में इन 4 जगहों पर कुंभ मनाया जाता है।

उक्त चार स्थानों पर प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराम में कुंभ का आयोजन होता है, इसीलिए किसी एक स्थान पर प्रत्येक 12 वर्ष बाद ही कुंभ का आयोजन होता है। जैसे उज्जैन में कुंभ का अयोजन हो रहा है, तो उसके बाद अब तीन वर्ष बाद हरिद्वार, फिर अगले तीन वर्ष बाद प्रयाग और फिर अगले तीन वर्ष बाद नासिक में कुंभ का आयोजन होगा। उसके तीन वर्ष बाद फिर से उज्जैन में कुंभ का आयोजन होगा। उज्जैन के कुंभ को सिंहस्थ कहा जाता है।

यह त्योहार हिंदुओं के लिए धार्मिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण है। हर कुंभ अवसर पर, लाखों हिंदुओं ने समारोह में भाग लिया है। हरिद्वार में 2003 में कुंभ के दौरान 10 लाख से अधिक भक्त इकट्ठे हुए थे। भारत के सभी कोनों से संन्यासी, पुजारी और योगी कुंभ में भाग लेने के लिए एकत्र हुए। हरिद्वार को बहुत ही पवित्र माना जाता है, इस तथ्य के कारण कि गंगा यहां से पहाड़ों से मैदानों में प्रवेश करती है।

इस त्योहार पर पूरे भारत के सभी आश्चर्यजनक संतों द्वारा दौरा किया जाता है। नागा साधु एक ऐसे हैं, जो कभी भी कोई कपड़ा नहीं पहनते है और राख में लिप्त रहते हैं। इन लंबे बाल वाले नागाओं पर भीषण सर्दी और गर्मी को कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। उर्द्धवावाहुर्रस वो लोग हैं जो शरीर को तप से निकालने में विश्वास करते हैं। पारिवाजक वो लोग हैं जो चुप्पी साधे रहते हैं और लोगों को अपने रास्तों से बाहर निकालने के लिए घंटियों का प्रयोग करते हैं। सिरसासिन वो लोग हैं जो 24 घंटे सर के बल खड़े होकर तप करते हैं। कल्प वासी वे लोग हैं जो दिन में तीन बार स्नान करते हैं और पुरे कुंभ के दौरान गंगा के किनारों पर समय बिताते हैं।

यह माना जाता है कि कुंभ के दौरान स्नान करना सभी पापों और बुराइयों का इलाज करता है और बाघ, मोक्ष प्रदान करता है। यह भी माना जाता है कि कुंभ योग के समय गंगा का पानी सकारात्मक ऊर्जा से भरा होता है और कुंभ के समय जल सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति की सकारात्मक विद्युत चुम्बकीय विकिरणों से भरा होता है।

कुंभ क्या है?:- कलश को कुंभ कहा जाता है। कुंभ का अर्थ होता है घड़ा। इस पर्व का संबंध समुद्र मंथन के दौरान अंत में निकले अमृत कलश से जुड़ा है। देवता-असुर जब अमृत कलश को एक दूसरे से छीन रह थे तब उसकी कुछ बूंदें धरती की तीन नदियों में गिरी थीं। जहां जब ये बूंदें गिरी थी उस स्थान पर तब कुंभ का आयोजन होता है। उन तीन नदियों के नाम है:- गंगा, गोदावरी और क्षिप्रा।

अर्धकुंभ क्या है?:- अर्ध का अर्थ है आधा। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का आयोजन होता है। पौराणिक ग्रंथों में भी कुंभ एवं अर्ध कुंभ के आयोजन को लेकर ज्योतिषीय विश्लेषण उपलब्ध है। कुंभ पर्व हर 3 साल के अंतराल पर हरिद्वार से शुरू होता है। हरिद्वार के बाद कुंभ पर्व प्रयाग नासिक और उज्जैन में मनाया जाता है। प्रयाग और हरिद्वार में मनाए जानें वाले कुंभ पर्व में एवं प्रयाग और नासिक में मनाए जाने वाले कुंभ पर्व के बीच में 3 सालों का अंतर होता है। यहां माघ मेला संगम पर आयोजित एक वार्षिक समारोह है।

सिंहस्थ क्या है?:- सिंहस्थ का संबंध सिंह राशि से है। सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर उज्जैन में कुंभ का आयोजन होता है। इसके अलावा सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुंभ पर्व का आयोजन गोदावरी के तट पर नासिक में होता है। इसे महाकुंभ भी कहते हैं, क्योंकि यह योग 12 वर्ष बाद ही आता है। इस कुंभ के कारण ही यह धारणा प्रचलित हो गई की कुंभ मेले का आयोजन प्रत्येक 12 वर्ष में होता है, जबकि यह सही नहीं है।

कुंभ का पर्व इन चार जगहों पर:-

1.हरिद्वार में कुंभ : हरिद्वार का सम्बन्ध मेष राशि से है। कुंभ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुंभ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का भी आयोजन होता है।

2.प्रयाग में कुंभ : प्रयाग कुंभ का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह 12 वर्षो के बाद गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम पर आयोजित किया जाता है। ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार जब बृहस्पति कुंभ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब कुंभ मेले का आयोजन प्रयाग में किया जाता है। अन्य मान्यता अनुसार मेष राशि के चक्र में बृहस्पति एवं सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन कुंभ का पर्व प्रयाग में आयोजित किया जाता है। एक अन्य गणना के अनुसार मकर राशि में सूर्य का एवं वृष राशि में बृहस्पति का प्रवेश होनें पर कुंभ पर्व प्रयाग में आयोजित होता है।

3. नासिक में कुम्भ : 12 वर्षों में एक बार सिंहस्थ कुंभ मेला नासिक एवं त्रयम्बकेश्वर में आयोजित होता है। सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुकुंभ पर्व गोदावरी के तट पर नासिक में होता है। अमावस्या के दिन बृहस्पति, सूर्य एवं चन्द्र के कर्क राशि में प्रवेश होने पर भी कुंभ पर्व गोदावरी तट पर आयोजित होता है।

4.उज्जैन में कुंभ: सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है। इसके अलावा कार्तिक अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र के साथ होने पर एवं बृहस्पति के तुला राशि में प्रवेश होने पर मोक्षदायक कुंभ उज्जैन में आयोजित होता है।

कुंभ की कथा : दरअसल, अमृत पर अधिकार को लेकर देवता और दानवों के बीच लगातार बारह दिन तक युद्ध हुआ था। जो मनुष्यों के बारह वर्ष के समान हैं। अतएव कुंभ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और आठ कुंभ देवलोक में होते हैं।

समुद्र मंथन की कथा में कहा गया है कि कुंभ पर्व का सीधा सम्बन्ध तारों से है। अमृत कलश को स्वर्गलोक तक ले जाने में जयंत को 12 दिन लगे। देवों का एक दिन मनुष्यों के 1 वर्ष के बराबर है। इसीलिए तारों के क्रम के अनुसार हर 12वें वर्ष कुंभ पर्व विभिन्न तीर्थ स्थानों पर आयोजित किया जाता है।

युद्ध के दौरान सूर्य, चंद्र और शनि आदि देवताओं ने कलश की रक्षा की थी, अतः उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, तब कुंभ का योग होता है और चारों पवित्र स्थलों पर प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराल पर क्रमानुसार कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है।

अर्थात अमृत की बूंदे छलकने के समय जिन राशियों में सूर्य, चंद्रमा, बृहस्पति की स्थिति के विशिष्ट योग के अवसर रहते हैं, वहां कुंभ पर्व का इन राशियों में गृहों के संयोग पर आयोजन होता है। इस अमृत कलश की रक्षा में सूर्य, गुरु और चन्द्रमा के विशेष प्रयत्न रहे थे। इसी कारण इन्हीं गृहों की उन विशिष्ट स्थितियों में कुंभ पर्व मनाने की परम्परा है।

अमृत की ये बूंदें चार जगह गिरी थी:- गंगा नदी (प्रयाग, हरिद्वार), गोदावरी नदी (नासिक), क्षिप्रा नदी (उज्जैन)। सभी नदियों का संबंध गंगा से है। गोदावरी को गोमती गंगा के नाम से पुकारते हैं। क्षिप्रा नदी को भी उत्तरी गंगा के नाम से जानते हैं, यहां पर गंगा गंगेश्वर की आराधना की जाती है।

ब्रह्म पुराण एवं स्कंध पुराण के 2 श्लोकों के माध्यम इसे समझा जा सकता है।

‘।।विन्ध्यस्य दक्षिणे गंगा गौतमी सा निगद्यते उत्त्रे सापि विन्ध्यस्य भगीरत्यभिधीयते.’
‘एव मुक्त्वाद गता गंगा कलया वन संस्थिता गंगेश्वेरं तु यः पश्येत स्नात्वा शिप्राम्भासि प्रिये।।’

कुम्भ में शाही स्नान

  • पहला शाही स्नान- 11 मार्च महाशिवरात्रि

वैसे तो हरिद्वार महाकुंभ मेले की औपचारिक शुरुआत 1 अप्रैल से हो रही है। नगर पहला शाही स्नान 11 मार्च 2021 को हो चुका है. धरती पर गंगा का अवतरण भगवान शिव की वजह से ही हुआ था। गंगा, शिव की जटाओं में समाहित हैं। इसलिए महाशिवरात्रि के दिन पवित्र गंगा में स्नान करने का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व काफी अधिक है।

  • दूसरा शाही स्नान- 12 अप्रैल, सोमवती अमावस्या का स्नान

हरिद्वार महाकुंभ का दूसरा शाही स्नान पहले स्नान के 1 महीने बाद 12 अप्रैल सोमवार को सोमवती अमावस्या के दिन होगा। अमावस्या के दिन वैसे भी पवित्र नदियों में स्नान और फिर दान का विशेष महत्व माना जाता है। सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है।

  • तीसरा शाही स्नान- 14 अप्रैल मेष संक्रांति और बैसाखी

हरिद्वार महाकुंभ का तीसरा शाही स्नान 14 अप्रैल बुधवार को मेष संक्रांति के मौक पर होगा। इस दिन बैसाखी भी है। ऐसी मान्यता है कि मेष संक्रांति के दिन गंगा का जल अमृत बन जाता है। ज्योतिषीय मान्यताओं के मुताबिक इस दिन गंगा में स्नान करने से व्यक्ति के जीवन के सारे पाप धुल जाते हैं।

  • चौथा शाही स्नान- 27 अप्रैल चैत्र पूर्णिमा के दिन

हरिद्वार महाकुंभ का चौथा और आखिरी शाही स्नान चैत्र के महीने में पूर्णिमा के दिन होगा। इसे शाही स्नान के सबसे अहम दिनों में से एक माना जाता है। इसलिए इस दिन को अमृत योग के नाम से भी जाना जाता है।

-Agency

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