Madhupur by Election Update : नेताओं का तीर्थ बने मधुपुर क्या करे उम्मीद

छोटे से कस्बे मधुपुर में इन दिनों बहार है। वही क्यों, इस विधानसभा क्षेत्र के हर गांव-गिरावं में भी बसंत ही बसंत है। भले ही सूर्य की किरणें असहनीय धूप और इस कारण उपजी गर्मी से लोगबाग की कौन कहे, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और कुएं-तालाब तक परेशान-हलकान हैं, लेकिन हर तरफ मिल रहे आश्वासनों और शहद टपकाते स्वरों से सबके कान निहाल हैं। हर किसी को उम्मीद हो चली है कि अब उनका इलाका वास्तव में मधु बन जाएगा। राज्य के बड़े-बड़े नेताओं द्वारा हर तरफ उगले जा रहे शरबत से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो अब वहां कोई मुसीबत नहीं आनेवाली। आई भी तो खुद-ब-खुद शरमा कर उल्टे पांव लौट जाएगी। 17 अप्रैल को इस इलाके में उपचुनाव के लिए मतदान निश्चित है। ऐसी स्थिति में 15 अप्रैल तक आश्वासनों और उम्मीदों के घूंट से यह क्षेत्र निहाल होता रहेगा। उसके बाद? हकीकत यही है, चुनाव खत्म, बात खत्म। ऐसा नहीं होता तो गुजरे बीस-इक्कीस वर्षों में हुए चुनावों के वायदे हर आम-वो-खास को निश्चय ही इस स्थिति में ला चुके होते कि कम से कम बिजली, पानी, शिक्षा, सेहत जैसी सामान्य जरूरतों के लिए उनको नेताओं के ये ‘आर्ष वचन’ सुनने की जरूरत ही नहीं रहती।

इस इलाके की खासियत यह कि छोटा होने के बावजूद अपना महत्व दर्शाता रहा है। तभी तो राज्य में चाहे भाजपा की सरकार रही हो या झामुमो-कांग्रेस की, इस क्षेत्र से चुनकर गया जनप्रतिनिधि अक्सर ललबतिया और कम से कम वाई श्रेणी की सुरक्षा गारद लेकर लौटता रहा है। पिछली सरकार में पंडा बाबा राज पलिवार मंत्री थे तो इस सरकार में जनाब हाजी हुसैन अंसारी मंत्री बनाये गये थे। उनके बेवक्त इंतकाल के बाद बिना चुनाव जीते ही हफीजुल हसन मंत्री पद पर आसीन करा दिये गये। वे मरहूम हाजी हुसैन के बेटे हैं। इसके पहले भी यह क्षेत्र मंत्री का इलाका कहलाकर गौरवान्वित होता रहा था।

इस उपचुनाव में मंत्री हफीजुल हसन की टक्कर राज पलिवार की पार्टी में नये-नये अवतरित हुए गंगा नारायण सिंह से है। सिंह महोदय पहले आजसू में थे और 2019 में हुए चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे थे। यह अलग बात है कि उस समय हाजी हुसैन को मिले मतों के सापेक्ष गंगा नारायण को बहुत कम वोट प्राप्त हुए थे। अलबत्ता राज पलिवार को अपेक्षाकृत अधिक मत मिले थे लेकिन उपचुनाव में उनको पार्टी ने बैठाकर गंगा नारायण को आयात कर लिया। ताजा स्थिति यह कि इस उपचुनाव में पलिवार महोदय पोस्टर में ही झलक रहे हैं। उनका साक्षात्कार नहीं हो पा रहा। वे कोप भवन गामी हो गए हैं, हालांकि पार्टी और प्रत्याशी उन्हें अपने से दूर नहीं मानते। प्रत्याशी महोदय तो खुद को उनका आशीर्वाद प्राप्त बताते हैं लेकिन यह रहस्य अबूझ नहीं कि पलिवार जनता जनार्दन के सामने क्यों नहीं आ रहे। इस विषय पर हो रही चर्चाओं पर जाने से बेहतर होगा यह समझ लेना कि सामने की थाली छीन ली जाय तो कैसा महसूस होता है।

खैर, टिकटकटे राज पलिवार भले ही खुद को कटा रख रहे हैं लेकिन आज की तारीख में पार्टी ने कई पलिवारों को इस भीषण तपिश में भी उपचुनावी मैदान में उतार रखा है। पार्टी विधायक दल के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी गांव-गांव घूम रहे हैं तो उनकी ही तरह डेढ़ दर्जन विधायक, आधा दर्जन सांसद और कई पूर्व विधायक भी शहद और मिश्री जैसी जुबान से हर किसी को लुभाने में लगे हुए हैं। भाजपा के लिए यह एक अवसर जैसा है। यदि वह अपने प्रत्याशी को जिता ले जाती है तो मंत्री को मात देने का सुख हासिल करेगी। रही बात जनता या मतदाता की तो यह स्थापित सत्य है, उसके हिस्से में वोट देना लिखा है, जिसे वह हर दफा देती ही रहती है।

दूसरी तरफ का भी वही हाल है। चूंकि यह पक्ष सत्ताधारी गठबंधन का है, इसलिए इसमें खुद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ही लगे हुए हैं। बाकी सहयोगी कांग्रेस और राजद के मंत्री-विधायक भी जोर लगाए हुए हैं। यूपीए के लिए यह प्रतिष्ठा की सीट है। 2019 के चुनाव में यह उसकी जीती हुई सीट है। इसलिए उपचुनाव में उसके सामने इसे बचाये रखने की चुनौती है। इसके पूर्व दुमका और बेरमो सीट पर हुए उपचुनाव में यूपीए ने अपना कब्जा कायम रखा था। चूंकि इस सीट से जीत के बाद हाजी हुसैन मंत्री बनाये गये थे और उनके इंतकाल के कुछ काल बाद ही हफीजुल को मंत्री बना दिया गया, इसलिए यूपीए, खासकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए यह सीट कुछ ज्यादा ही महत्व रखती है। हफीजुल निजी तौर पर पहली मर्तबा चुनाव मैदान में हैं। ऐसी स्थिति में उनकी जीत-हार का दारोमदार एक तो सहानुभूति पर निर्भर है, दूसरे उनके समर्थन में उतरे नेताओं पर।

पूर्व के उपचुनावों के सापेक्ष मधुपुर का उपचुनाव बहुत कुछ अलग है। पहले जहां कतिपय केंद्रीय नेता तक उपचुनावों में रैली, जुलूस जैसे टोटके आजमाया करते थे, जबकि इस बार चाहे भाजपा हो या कांग्रेस, दोनों के केंद्रीय नेताओं की मौजूदगी अबतक नहीं हुई है। उनलोगों का ध्यान असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी पर रहा, जहां हाल ही मतदान संपन्न हुआ है। इसी के साथ खासकर भाजपा अपनी पूरी टीम और ताकत के साथ पश्चिम बंगाल के चुनाव में लगी हुई है। वहां अभी पांच चरणों की वोटिंग बाकी है। दूसरी बात शायद यह भी हो कि मधुपुर की जीत-हार से कोई विशेष फर्क नहीं पड़नेवाला है। झारखंड के उपचुनावों का इतिहास भी बहुत कुछ कहता है।

कुल मिलाजुलाकर यह उपचुनाव राज्य स्तरीय नेताओं की अग्निपरीक्षा बना हुआ है। भाजपा में मोदी-शाह के उभार ने चुनावी राजनीति को नया फ्लेवर दिया है। इसके  तहत चुनाव मैदान में रथी, अर्द्धरथी से लेकर महारथियों तक को उतार देने की परंपरा कायम की जा रही है। संभवतः इसी को देखते हुए प्रदेश भाजपा ने जिस प्रकार प्रभाव डालने वाले अपने सभी नेताओं का मधुपुर में जमघट लगा दिया है, वैसे ही झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन ने भी फिलहाल इस इलाके को नेताओं का तीर्थ बना दिया है। मैदान में चार निर्दलीय भी डटे हुए हैं, जो किसी न किसी पक्ष के वोट काटकर उसे प्रभावित कर सकते हैं।

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