झारखंड में उपजे नाना प्रकार के देहाती साग से होता है कई रोगों का उपचार

झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में देशी सगों के सेवन ने कोरोना महामारी को नहीं ज़माने दिए पांव

Insightonlinenews Team

झारखण्ड प्रदेश ऐसे विशेष क्षेत्र में शामिल है, जिसके वन-प्रांतर में निवास करने वाली आदिवासी और मूलवासी की बड़ी आबादी के आहार में विविध प्रकार के व्यंजनों के अतिरिक्त पौष्टिक भोजन के रूप में साग की प्रधानता है। प्रतिदिन किसी न किसी साग का एक व्यंजन प्रत्येक घर में निश्चित रूप से पकता है। साफ शब्दों में कहा जाए तो आदिवासी जनक्षेत्र का पौष्टिक आहार साग ही है।

गांवों में सर्वेक्षण के दौरान पता चलता है कि मौसम की विविधता के कारण यदि तत्काल ताजा साग उपलब्ध नहीं हो सकता तो पहले से सूखाकर रखे गए अनेक किस्म के सागों को ही पका कर खाया जाता है। इस तरह के साग के व्यंजन भात के माड़ में मिलाकर भी सीझाए जाते हैं जो दाल के बदले भात के साथ सानकर (मिलाकर) खा लिए जाते हैं। विशेष रूप से झारखण्ड में जनजातीय (आदिवासी) परिवार हो या मूलवासी परिवार हो, परम्परागत रूप से दोनों के आहार में समानता होती है। इन परिवारों के भोजन में दाल की उपलब्धता नहीं होने पर भी माड़-भात और साग मुख्य मेनू के रूप में यहां प्रिय है। विविध किस्म के साग में उसके प्राकृतिक स्वाद को तेज और चटख करने के लिए प्याज, मिर्च और टमाटर डालकर भी पकाया जाता है।

गांवों में लोग बताते हैं कि साग की प्रत्येक किस्म किसी न किसी रोग की औषधि होती है। विशेषज्ञ वैद्य साग को जड़ी-बूटी की तरह भोजन में शामिल कर रोग निदान करते हैं। इस तरह फायदा होने से घरों में नियमित रूप से साग का व्यंजन खाने की परम्परा शुरू हो गई। साग के रूप में उपलब्ध जड़ी-बूटियों के द्वारा विविध प्रकार के रोगों के निदान या उनसे बचाव के लिए ‘होड़ो पैथी’ नामक चिकित्सा-प्रणाली भी यहां प्रचलित हुई है जिसके विशेषज्ञ गांव-गांव में लोगों को लाभ पहुंचा रहे हैं।

इस तरह से आम लोग भी स्व-चिकित्सा के रूप में औषधीय गुणों से भरपूर साग का सेवन करने में पीछे नहीं हैं। अंगुलियों पर गणना की जाए तो कम से कम पचास किस्म के साग प्रत्येक गांव में प्रत्येक परिवार के रसोई घर के दायरे में उपलब्ध हैं, जिसका सेवन होता ही है।

ऐसी किस्मों के प्रमुख सागों की जो सूची एक सर्वेक्षण में उपलब्ध हुई है, उसका अवलोकन करने से साग-सेवन के महत्व को समझा जा सकता है जो इस प्रकार हैः-

बेंग साग: यह पीलिया सहित पेट के समस्त रोगों की महौषधि है। 2.नेठा साग: नस-नाड़ी एवं ठेहुने के जोड़ों में दर्द का निदान होता है। 3. कटेयी साग: यह झाड़ीदार होता है और इसकी पत्तियों का साग पेट के रोगों में कारगर है। 4. मुनगा: इसे सहजन भी कहते हैं। इसकी पत्तियों का साग, फूल और डँडीनुमा फल महौषधि है। रक्तचाप, सर्दी-खांसी और चेचक में उपयोगी। 5. फुटकल साग: पेचिश में लाभकारी। माड़ में सीझाकर दाल जैसा झोर बनाकर खाया जाता है। यह कान के रोग में भी लाभकारी है। 6. कचनार: यह पेड़ होता है। इसकी कोमल पत्तियों को साग के रूप में सीझा कर खाया जाता है। इसका फूल भी तरकारी बनाकर खाया जाता है। 7. सनई फूल : भूनकर इसकी स्वादिष्ट चटनी बनायी जाती है। पेट रोग में उपयोगी।

8. खेपा साग: यह कुदरूम के नाम से भी प्रसिद्ध है। बाजार में मिलता है। इसके लाल-लाल फूल की चटनी बनती है और कोमल पत्तियों का साग बनता है। 9. चकोर साग: ताजा पत्तियों का साग तो बनता ही है, इसे सूखाकर भी चूर्ण बनाकर रखा जाता है। जरूरत होने पर माड़ में सीझा कर खाया जाता है। कफ-सर्दी में लाभकारी है। 10. मोट मोटी: यह लतर की तरह होता है। लकवा में लाभकारी है। 11. पेकची: इसका साग खुजली में लाभ करता है। 12. करौंदा: किसी भी प्रकार के बुखार में लाभकारी। 13. चिम्टी: क्रोनिक सर्दी में फायदेमंद। 14. तिता साग: पतला दस्त का निदान होता है। 15. पोय साग: एक्जीमा में लाभकारी। 16. कलमी साग: हृदय रोग में लाभकारी। 17. सोरौती साग: खांसी में फायदा करता है।

दुर्लभ श्रेणी के उपरोक्त सागों के अतिरिक्त झारखण्ड में अनेक प्रचलित नामों वाले साग भी सुलभ हैं, जिनका सेवन किया जाता है। ऐसे सागों में भी रोग निदान के गुणों की पहचान की गई है जो इस प्रकार हैः-

पालक साग-खून साफ करता है। 2. बथुआ साग: पेट साफ करता है। 3. मेथी साग: मधुमेह और बाल झड़ने में लाभकारी। 4. सरसो साग: गठिया में लाभकारी। 05. चना साग: पेट रोग, उल्टी में फायदा। 6. खेसारी साग: केश झड़ना रोकता है। 7. गेंधारी का साग (लाल): मधुमेह नियंत्रण 8. गेंधारी का साग (सादा) -निम्न रक्तचाप पर नियंत्रण 09. मूली का साग: जांडिस, चर्म रोग में फायदेमंद।

उपरोक्त सूचीबद्ध सागों के अतिरिक्त अन्य प्रकार के सागों की उपलब्धता प्रकृति में है जिसका उपयोग और सेवन मानव शरीर के लिए बहुत लाभकारी है। झारखण्ड में सागों की बहुलता का लाभ यहां के निवासी सहज ही उठाते हैं। इसका लाभ उनके स्वास्थ्य को भी मिलता है। आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था की कमी यहां के लोग साग के चिकित्सीयगुणों से पूरी करते हैं।

कठिन परिस्थिति के बावजूद झारखण्ड के आम आदिवासीजनों और अन्य वर्ग के किसानों और श्रमिकों के उत्साह और शरीर-बल सम्पन्न बने रहने का कारण प्रकृति के साथ अनुकूलता बनाए रखने के साथ उपलब्ध प्राकृतिक फल-फूल, कंद-मूल एवं अन्य उपलब्ध खाद्य पदार्थों का सेवन महत्वपूर्ण है।

यहां के लोगों के भोजन में दलहन शामिल हो न हो माड़-भात के साथ विभिन्न गुण-श्रेणी के सागों के निश्चित सेवन का यही रहस्य है। सभी प्रकार के साग पौष्टिकता से पूर्ण होते हैं। साग-सेवन से निरोगता के साथ शरीर में अतुल उर्जा और श्रम-शक्ति का भी संचय होता है।

झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना महामारी नहीं जमा पाई पांव

सर्वेक्षण कहते हैं कि झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में जहां-जहां देहाती सागों का सेवन किया जाता है वैसे क्षेत्र काफी संख्या में है और कोरोना महामारी के इस संकटकाल में लगभग झारखंड अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना महामारी नहीं पहुंच पाई। जहां-जहां प्रवासी मजदूरों का आगमन हुआ उन्हीं के बीच में ये महामारी सिमट कर रह गई।

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