दो स्वरूपों में विराजमान है ओंकारेश्वर- ज्योतिर्लिंग

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पुराणों के अनुसार जहां भगवान शिव खुद प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है. शिव पुराण के  अनुसार इनकी संख्या 12 बताई गई है 

शिवजी के 12 ज्योतिर्लिंगों में से चौथा ज्योतिर्लिंग श्री ओंकारेश्वर- ज्योतिर्लिंग है. यह मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में नर्मदा नदी के बीच मन्धाता या शिवपुरी नाम के द्वीप पर  स्थित है.

यहां ज्योतिर्लिंग दो स्वरूप में  मौजूद है. जिनमें से एक को ममलेश्वर के नाम से और दूसरे को ओंकारेश्वर  नाम से जाना जाता है. ममलेश्वर  नर्मदा के दक्षिण तट पर ओंकारेश्वर  से थोड़ी दूर स्थित है. अलग होते हुए भी इनकी गणना एक ही की जाती है.

ऐसे पड़ा ओंकारेश्वर नाम

यहाँ ज्योतिर्लिंग नर्मदा के तट पर स्थित है. इस स्थान पर नर्मदा के दो धाराओं में बटी होने से बीच में एक टापू-सा बन गया है. जो ओम के आकार का है. इस टापू को मान्धाता-पर्वत या शिवपुरी कहते हैं. यह ज्योतिर्लिंग ओमकार अर्थात ओम का आकार लिए हुए है. इसी कारण इस ज्योतिर्लिंग को ओंकारेश्वर कहा जाता है.

इसी स्थिति पर होता है नर्मदा और कावेरी नदी का संगम

पौराणिक कथा के अनुसार धनपति कुबेर भगवान के परम भक्त थे. कुबेर ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की. इसके लिए उन्होंने एक शिवलिंग स्थापित किया. भगवान शिव कुबेर की भक्ति से प्रसन्न हुए और कुबेर को देवताओं का धनपति बना दिया. भगवान शिव ने कुबेर के स्नान के लिए अपनी जटा से कावेरी नदी उत्पन्न की थी. यही नदी नर्मदा में मिलती है. यहां पर कावेरी ओमकार पर्वत का चक्कर लगते हुए संगम पर वापस नर्मदा से मिलती हैं. जिसे नर्मदा और कावेरी का संगम कहा जाता है.

ओंकारेश्वर- ज्योतिर्लिंग  से जुड़ी पौराणिक कथा

शिव पुराण में वर्णन कथा के अनुसार, एक बार महामुनि नारद विन्ध्य पर्वत से मिलने पहुंचे. तब विन्ध्य पर्वत बहुत अहंकारी हो चुका था. अपने अहंकार के मद में चूर होकर उसने नारदजी से कहा, मैं बहुत विशाल और सर्वगुण सम्पन्न हूं, मेरे जैसा कोई नहीं है.

नारदजी को विन्ध्य पर्वत का घमंड अच्छा नहीं लगा. तब नारदजी ने उसके घमंड को तोडऩे के लिए कहा कि भले ही तुम सर्वगुण सम्पन्न हो पर मेरु पर्वत की ऊंचाई तुमसे बहुत ज्यादा है. नारदजी की बात सुनकर विन्ध्य पर्वत को बहुत दुख और पीड़ा हुई.तब विंध्याचल पर्वत ने शिवजी की आराधना करने का निश्चय किया. उसने एक मिट्टी का शिवलिंग स्थापित किया और भगवान भोलेनाथ की कठिन तपस्या करने लगा. उसके कई सालों की कठिन तपस्या से भगवान शिवजी बहुत प्रसन्न हुए.

उन्होंने ने विन्ध्य पर्वत को अपने दिव्य स्वरूप के दुर्लभ दर्शन दिए. शिव जी ने विध्यांचल को वरदान मांगने को कहा तो उसने भगवान शिव से कहा कि अगर आप मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं तो मुझे कार्य की सिद्धि करने वाली अभीष्ट बुद्धि प्रदान करें. भगवान शिव ने विन्ध्य को जिस प्रकार का कार्य करना चाहे, वैसा कार्य करने का वर दे दिया. तब तक वहां कई देवतागण तथा ऋषिमुनि भी उपस्थित हो गए. उन्होंने भी महादेव की विधिवत पूजा अर्चना की और उनसे प्रार्थना की कि हे भोलेनाथ आप सदैव के लिए यहां स्थापित होकर निवास करें. भगवान ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया. इनके अनुरोध पर ही ज्योतिर्लिंग दो स्वरूपों में विभक्त हुआ जिसमें से एक प्रणव लिंग ओंकारेश्वर और दूसरा पार्थिव लिंग ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसमें से एक प्रणव लिंग ओंकारेश्वर और दूसरा पार्थिव लिंग ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुआ.

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