Poet Anamika : स्त्रियों में बुद्धत्व होता है और अपने मूल स्वभाव से वो अहिंसक होती हैं: अनामिका

नई दिल्ली, 16 मार्च । न्याय का करुणा से जो रिश्ता बनता है, वही हमारे स्त्री विमर्श का रिश्ता है। इसलिए हमने संवाद का माध्यम अपनाया है। हिन्दी की जानी-मानी कवयित्री अनामिका ने यह बात कही। अनामिका को साल 2020 के ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है।

अनामिका कविता संग्रह के लिए ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ पाने वाली पहली महिला साहित्यकार हैं। उन्होंने कहा कि स्त्रियों में बुद्धत्व होता है और अपने मूल स्वभाव से वो अहिंसक होती हैं। स्त्री आंदोलन एक ऐसा आंदोलन है, जिसमें एक बूंद खून नहीं बहा। हमेशा ममता के साथ प्रतिरोध किया। न्याय का करुणा से जो रिश्ता बनता है, वही हमारे स्त्री विमर्श का रिश्ता है। इसलिए हमने संवाद का माध्यम अपनाया है।

हिन्दुस्थान समाचार की पाक्षिक पत्रिका यथावत से बातचीत करते हुए अनामिका ने कहा कि हम यह नहीं सोचते कि पुरुषों में बुद्धत्व के बीज नहीं हैं, हम तो पुरुषों में उन बीजों को चटकाना चाहते हैं। कम से कम नई पीढ़ी के पुरुषों से ऐसी उम्मीद रखते हैं।

आगे वे कहती हैं कि जो पुरुष हमें गढ़ने हैं, वे स्त्रीवाद के गर्भ से ही जन्म लेते हैं। मैं हमेशा बायोलॉजिकल मदरहुड से आगे जाना चाहती हूं। केवल वही नहीं होता, जो हम गर्भ में धारण करते हैं, बल्कि हमारी मानस संततियां आगे आने वाले पुरुष हैं। पीछे का तो हम कुछ सुधार नहीं सकते। हमें तो आगे सोचना है।

बातचीत के दौरान अनामिका ने कहा कि हम स्त्रियां हमेशा किसी प्रतिस्पर्धा या प्रतियोगिता में नहीं, बल्कि सहयोग और सहभागिता में विश्वास करते हैं। समाज में मां ही इस काम को कर सकती है। हर पुरुष में कुछ न कुछ खास होता है। उसके चरित्र में कहीं न कहीं कोमल-वैशिष्ठ होता ही है। हमें उस वैशिष्ठ को उभारने की जरूरत है। एक मां ही उस वैशिष्ठ को उभारने का काम कर सकती है।

स्त्री-पुरुष बराबरी के सवाल पर अनामिका कहती हैं- “अवसर और साधन सभी को बराबरी के मिलने चाहिए। लेकिन, मैं यह नहीं चाहती कि स्त्रियां पुरुष बन जाएं। स्त्रियों में सहिष्णुता और करुणा का भाव होता है। धीरज जैसे गुण को हमें नहीं छोड़ने चाहिए। हमारी कोशिश तो यह होनी चाहिए कि पुरुष इन गुणों को अपनाएं।”

मूल रूप से बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की रहने वाली अनामिका अपने पिताजी के साथ अंतराक्षी खेलते-खेलते कब कविता करने लगीं, उन्हें पता ही नहीं चला। आज भी वे अपने पिता की कविताएं बहुत पसंद आती हैं। वे कहती हैं- “बहुत से कवि हैं, जिनकी कविताएं काफी पसंद करती हूं। मेरे पिताजी की कविताएं भी मुझे काफी प्रिय हैं।”

अपनी साहित्यिक यात्रा को लेकर वे कहती हैं कि अभी तो ऐसा लगता है कि शुरुआत हुई है। बहुत कुछ करना है। अभीतक बच्चों को बड़ा करने और नौकरी में ही व्यस्त रही। अब लगता है कि एकांत में बैठकर कुछ रचा जाए।

अनामिका दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी की प्राध्यापिका हैं। उन्हें कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल एवं केदार सम्मान मिल चुके हैं। हिंदी कविता संग्रह ‘टोकरी में दिगंत- थेरीगाथा: 2014’ के लिए अनामिका को यह सम्मान मिला है। कवयित्री और सामाजिक कार्यकर्ता के साथ-साथ दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य की एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

(हि.स)

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