Punjab to Witness 2022 Hung Assembly : पंजाब में त्रिशंकु विधानसभा के आसार

बैजनाथ मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार

पंजाब यानी पांच नदियों से घिरा हुआ क्षेत्र या प्रदेश। ये नदियां हैं रावी, झेलम, चिनाब और सतलुज। पांचवां है सिंधु जो नदी नहीं, नद है। पंजाब के लिए आगामी विधानसभा चुनाव में यही तय होना है कि नदियां बनकर कौन सी पार्टियां रह जाएंगी और नद बनकर कौन सी पार्टी शासन-सूत्र संभालेगी। पंजाब के चुनावी इतिहास में यह पहला मौका है जब पांच कोणीय मुकाबला होने जा रहा है। इसलिए कहा जा सकता है कि इस बार पंबाज भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं राजनीतिक रूप से पंजाब बनने जा रहा है। यानी पांच राजनीतिक धाराएं वेगवती होने के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा कर रही है।

इसमें सबसे प्रमुख है कांग्रेस। वह सत्तासीन भी है और अभी तक ही कच्चे-पक्के अनुमानों में वह बढ़त पर दिखाई दे रही है। लेकिन वह अन्तर्कलह में बुरी तरह फंस गई है। कांग्रेस के चुनाव अभियान समिति के प्रमुख सुनील जाखड़ का कहना है कि पार्टी सामूहिक नेतृत्व में आलाकमान के दिशा निर्देश के हिसाब से चुनाव लडे़ंगी। यानी बकौल जाखड़, मुख्यमंत्री चरनजीत सिंह चन्नी अगले मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं होंगे।

यह लाइन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू और गृहमंत्री सुखविंदर सिंह रंधावा को भी मुफीद लगती है। ये दोनों महानुभाव स्वयं मुख्यमंत्री पद की दौड़ में थे। लेकिन आलाकमान ने इनसे कन्नी काट ली और चन्नी की ताजपोशी हो गई। सुनील जाखड़ की महत्वकांक्षाएं कुलाचें भर रही है।

लेकिन यदि कांग्रेस जीत जाती है और चन्नी दुबारा मुख्यमंत्री नहीं बनते हैं जो कांग्रेस के खिलाफ पूरे देश में यह संदेश जाएगा कि वह दलित का इस्तेमाल केवल स्टॉप गैप आरेजमेंट की तरह करती है, उसे वास्तविक सम्मान देना उसकी आदतों में शुमार नहीं है। क्या कांग्रेस अपनी ऐसी जगहंसाई कराना चाहेगी?

अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस की राहें कंटकविहीन है? इसका जवाब है, नहीं। कांग्रेस को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाएगा संयुक्त समाज मोर्चा इसके मुखिया हैं बलबीर सिंह राजवाल। वहीं राजवाल जो एक साल में लंबे समय तक चले किसान आंदोलन के प्रमुख नेता थे। अब उन्होंने चढूनी समेत पंजाब के सभी प्रमुख किसान नेताओं की गोलबंदी से एक नया राजनीतिक मोर्चा बनाया है। इस मोर्चा ने राज्य की कुल 117 सीटों पर लड़ने की घोषणा कर दी है। इससे कांग्रेस की बेचैनी बढ़ गई है।

कांग्रेस के बड़े नेताओं के मुंह तो इस मुद्दे पर सिलेे हुए हैं, लेकिन दूसरी-तीसरी कतार के नेता इस मोर्चा के नेताओं को आए दिन लागत भेज रहे हैं और नसीहत दे रहे हैं। यही कांग्रेस इन किसान नेताओं के समर्थन में जगह-जगह ट्रैक्टर रैलियां निकाल रही थी, राहुल गांधी ट्रैक्टर से संसद भवन मार्च कर रहे थे, वहीं लोग पंजाब के किसानों को विकास विरोधी बता रहे हैं। वे कह रहे हैं कि रेल पटरियों और सड़कों पर धरना-प्रदर्शन से सूबे की माली हालत खराब रहो रही है। ये कांग्रेसी यही नहीं बता पा रहे हैं कि जब यही किसान दिल्ली की घेराबंदी कर सड़कों पर बैठे थे तो देश की आर्थिक सेहत तंदुरूस्त कैसे हो रही थी।

खैर, इस किसान मोर्चा के चुनाव लड़ने की घोषणा से आप (आम आदमी पार्टी) की चिंतायें भी बढ़ गई है। अभी कुछ दिन पहले तक राजवाल का नाम आप के मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में शुमार था। इससे
सांसद भगवंत मान खासा बिफरे हुये थे। लेकिन अरविंद केजरीवाल ने अभी तक पंबाज में अपने मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया है। कांग्रेस और आप की समस्या यह है कि किसान मोर्चा की धमक गांवों में ज्यादा है और पंजाब का सेहरा उसी पार्टी के लिए बंधेगा जो ग्रामीण इलाकों में बाजी मार लेगी। पिछली बार कांग्रेस को मिली 77 सीटों में 40 गांवों ने दी थी। यही वजह थी कि अनुमानों में करीब 80 सीटें पा रही आप बीस पर भटक गई और अकाली दल सिर्फ 15 सीटें ही पा सका। केजरीवाल की समस्या यह भी थी कि उन्होंने अपने प्रचार में विदेशी सिख युवकों, स्थानीय अतिवादियों और कोहराम मचाने वाले युवकों को आगे कर मालवा क्षेत्र में कोलाहल भरा माहौल बनाया था। इसमें स्थानीय लोग जीत गये। उन्हें यह चिंता सताने लगी कि कहीं पांजाब फिर अशांत न हो जाए, इसलिए वो कांग्रेस की और खिसक गई। इस बार किसानों ने केजरीवाल की मुश्किलें बढ़ा दी है।

इनके बीच एक पच्चड़ भाजपा, कैप्टन अमरिंदर सिंह की पार्टी और अकालीदल से अलग हुए सुखदेव सिंह ढींढसा का गठबंधन है। यह गठबंधन यों तो प्रभावी नजर नहीं आ रहा है, लेकिन जिस प्रकार पंबाज के बड़े नेता, वर्तमान व पूर्व विधायक सांसद भाजपा में शामिल हो रहे हैं तथा अमरिंदर सिंह जिस तरह की योजनाबद्ध चालें चल रहे हैं, उससे ऐसा लगता है कि यह गठबंधन सारा समीकरण उलट-पुलट देगा। शायद यही वजह है कि भाजपा के जो नेता पहले कट रहे थे कि वो पंजाब में मजबूती से लड़ेंगे वे अब दम झोंककर कहने लगे हैं कि उनकी लड़ाई सरकार बनाने के लिए होगी। पंजाब अब तक भाजपा फिसड्डी पार्टी रही है। आकालियों के साथ मिलकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रही है, लेकिन इस बार उसने अकालीदल में भी सेंध लगा दी है। उधर कैप्टन अमरिंदर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने की हर मुमकिन कोशिश करेंगे। शायद वैसे ही जैसे चिराग पासवान ने बिहर में नीतीश कुमार के जद(यू) को झकझोर दिया था। ढींढसा और नये मनजिंदर सिंह सिरसा अकालियों की जड़ें खोदने में लगेंगे और भाजपा अपने शहरी तथा हिंदू मतदाताओं में राष्ट्रवाद का एक उबाल पैदा करने की कोशिश करेगी।

मायावती और सुखबीर सिंह बादल

जहां तक अकालीदल की बात है, उसने भी पैंतरा बदल दिया है। वह पंबाज की अस्मिता का मुद्दा उछाल रही है। सुखवीर बादल की पिछली मेगा रैली में रूच्चा सिंह जैसे जितने जितने पुराने आतिवादी नेता जमा हुए और उनके भाषणों में दिल्ली की पार्टियों के लिए जो तल्खी थी, उससे ऐसा लगता है कि भाजपा से अलग होने के बाद अकालीदल क्षेत्रीय भावनाओं की लहरों पर सवार होकर अपनी चुनावी नैया पार लगाने की कोशिश करेगी। वैसे अकालीदल में मुख्यमंत्री पद को लेकर कोई किचकिच नहीं है। मुख्यमंत्री बादल ही होंगे चाहे प्रकाश सिंह, चाहे सुखवीर। अकाली दल ने बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन कर एक दलित को उपमुख्यमंत्री बनाने की घोषणा कर रखी है। यह कांग्रेस के दलित कार्ड की काट है। उनकी नेताओं की दिक्कत यह है कि पंजाब का आम मतदाता उन पर विश्वास कम करता है, इसलिए वे भावनाओं का सहारा ले रहे हैं।

इस पांचकोणीय तीखे मुकाबले तथा वोटों के कतर ब्योंत के चलते प्रेक्षकों का ममना है कि कहीं पंजाब में जनादेश चंढीगढ़ नगर निगम जैसा ही न आ जाए जहां किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है और निगम के गठन का गणित पूरी तहर उलझ गया है। यदि वास्तव में पंजाब में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनी तो यकीन मानिए सूबे की राजनीति पूरी तरह घूम जायेगी और नया समीकरण बनेगा जो राजितिक पंडितों को भी चैंका देगा।

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