मोदी सरकार में राजपथ का कर्तव्य पथ हो जाना

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

कभी किंग्स-वे तो कभी राजपथ रही सड़क देखते ही देखते आम जन और उनके लोक प्रतिनिधियों के लिए कर्तव्य का पथ बन गई है। सही भी है लोक के जगत में आम का ही महत्व है, खास का नहीं। राजा कोई नहीं, सभी लोक के प्रतिनिधि, कर्तव्य पथ पर चलनेवाले दायित्ववान जन प्रतिनिधि हैं। वस्तुत: सत्ता तो आनी-जानी है, किंतु सत्ता में रहते हुए जब आप एक लम्बी लकीर खींच देते हैं तो आनेवाली पीढ़ियों के लिए भी वह एक उदाहरण बनती है। फिर जो सत्ता में आते हैं, उनकी भी मजबूरी हो जाती है कि या तो वे खींची गई लकीर के आसपास चलें या फिर उससे भी बड़ी लकीर खींचे। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा लिए जा रहे निर्णय कुछ ऐसे ही हैं, जिन्होंने एक ओर जहां कोरोना महामारी जैसी भयंकर परिस्थिति में भी विश्व के समक्ष भारत का डंका बजवाया तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों, आर्थिक हितों, पड़ोसी देशों के साथ संबंध, सीमा विवाद जैसे विषयों के साथ ही घरेलू मोर्चे पर ऐसे तमाम निर्णय और कार्य सफलता से पूरे कर दिए जो आज भारत के लोगों को तेजी से आगे ले जाने का कारण बन रहे हैं। दिल्ली के राजपथ का नाम भी कर्तव्य पथ किए जाने को आप इस दृष्टि से महत्व का मान सकते हैं।

जिन लोगों को भी लगता है कि नाम में क्या रखा है, उन्हें यह समझ लेना होगा कि नाम ही व्यक्ति, समाज, संस्था, पंथ, मजहब, धर्म, समूह और आपके कार्य का मुख्य आधार है। नाम वास्तव में आपकी पहचान, आचरण, संस्कार, स्वभाव, चरित्र, भाव, विचार एवं सोच को स्पष्ट करने का कारण है। यह नाम ही है जो आपके वर्तमान एवं भविष्य में आचरण का आधार बनता है । इसलिए आज राजपथ का नाम कर्तव्य पथ हो जाना बहुत महत्वपूर्ण है। इतिहास में आप देख सकते हैं कि जब कोलकाता की जगह दिल्ली को भारत (ब्रिटिश शासन) की राजधानी बनाने की घोषणा हुई और 1911 में दिल्ली दरबार में शामिल होने किंग जॉर्ज पंचम भारत आए तब अंग्रेजों ने किंग जॉर्ज पंचम के सम्मान में इस जगह का नाम किंग्स-वे रख दिया था, साथ ही सड़क किनारे जार्ज पंचम की मूर्ति स्थापित कर दी गई थी, उसके बाद से किंग्स-वे ब्रिटिश हुकूमत की शाही पहचान का प्रतीक रहा। स्वतंत्रता के बाद भले ही पं. नेहरु की सरकार ने 1955 में इसका नाम बदलकर राजपथ कर दिया हो, किंतु यह शब्द एक तरह से किंग्स-वे का ही हिन्दी अनुवाद था, जिसमें से सत्ता के अहंकार की गंध हमेशा से आती रही।

प्रश्न यह है कि हम अब भी उन उपनिवेशवादी प्रतीकों को क्यों ढोएं, जिन्होंने कहीं न कहीं भारतीय समाज और मेधा के मर्दन के लिए ही काम किया है? इसलिए ही भारतीय स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात समय-समय पर ऐसे अनेक स्थानों के नाम बदलने का कार्य होता रहा है। इस दृष्टि से हम देख सकते हैं कि गुलामी की प्रतीक प्रिंस एडवर्ड रोड को विजय चौक, क्वीन विक्टोरिया रोड को डॉ. राजेंद्र प्रसाद रोड, किंग जॉर्ज एवेन्यू रोड का नाम बदलकर राजाजी मार्ग किया गया। प्रधानमंत्री आवास स्थित रेसकोर्स रोड का नाम लोक कल्याण मार्ग किया गया। इतिहास में अनेक स्थानों पर दर्ज है कि कैसे औरंगजेब ने अपने शासनकाल में हिन्दुस्थान की जनता पर क्रूरतम अत्याचार किए। उसने अपने राज में हिंदुओं के लिए बेहद कठोर नियम बनाए। जजिया जैसे टैक्स थे, मंदिर-मठ तोड़े जा रहे थे। मुसलमानों को छोड़कर सभी के प्रति वह कठोर था । ऐसे अत्याचारी औरंगजेब के नाम की रोड को मोदी शासन में महान वैज्ञानिक, पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के नाम किया गया। डलहौजी रोड, दाराशिकोह रोड हो गई और तीन मूर्ति चौक नाम हाइफा चौक कर दिया गया ।

वस्तुत: हाइफा कहते ही इजरायल के उस प्रमुख शहर का नाम जुबान पर आता है, जिसे भारतीय सैनिकों ने प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ऑटोमन साम्राज्य से मुक्त करवाया। तुर्कों के कब्जे से आजाद कराने में भारतीय सैनिकों की भूमिका यहां इतनी महत्व की रही कि इजरायल की स्वाधीनता का रास्ता हाइफा की लड़ाई से ही खुला। यहां याद रखने की बात यह भी है कि भारतीय सैनिकों ने सिर्फ भाले, तलवारों और घोड़ों के सहारे ही जर्मनी-तुर्की की मशीनगन से लैस सेना को धूल चटा दी थी। ये कुछ नाम तो महत्वपूर्ण सड़कों के हैं, अन्य भी तमाम सड़के हैं जिनके नाम संपूर्ण भारत में मोदी राज में बदलकर यह संदेश देने का प्रयास हुआ है कि हमें भारत में कोई भी गुलामी का प्रतीक नहीं चाहिए।

वस्तुत: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस ‘कर्तव्य पथ’ का उद्घाटन करते हुए जो कहा-उस पर हम सभी को गंभीरता से विचार करना चाहिए। आज देश अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे सैकड़ों कानूनों को बदल चुका है। भारतीय बजट जो इतने दशकों से ब्रिटिश संसद के समय का अनुसरण कर रहा था। उसका समय और तारीख भी बदली गई है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के जरिए अब विदेशी भाषा की मजबूरी से भी देश के युवाओं को आजाद किया जा रहा है। कर्तव्य पथ केवल ईंट-पत्थरों का रास्ता भर नहीं है। ये भारत के लोकतांत्रिक अतीत और सर्वकालिक आदर्शों का जीवंत मार्ग है। यहां जब देश के लोग आएंगे, तो नेताजी की प्रतिमा, नेशनल वार मेमोरियल, ये सब उन्हें बड़ी प्रेरणा देंगे, उन्हें कर्तव्यबोध से ओत-प्रोत करेंगे।

वास्वत में आज अगर जॉर्ज पंचम की मूर्ति के निशान को हटाकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भव्य मूर्ति लगी है, तो ये गुलामी की मानसिकता के परित्याग का पहला उदाहरण नहीं है। ये न शुरुआत है, न अंत है। ये मन और मानस की आजादी का लक्ष्य हासिल करने तक, निरंतर चलने वाली संकल्प यात्रा है। उनकी कही इस बात को देश के प्रत्येक भारतीय को समझना होगा कि अगर पथ ही राजपथ हो, तो यात्रा लोकोन्मुखी कैसे होगी? राजपथ ब्रिटिश राज के लिए था, जिनके लिए भारत के लोग गुलाम थे। राजपथ की भावना भी गुलामी का प्रतीक थी, उसकी संरचना भी गुलामी का प्रतीक थी। आज इसकी वास्तुशैली भी बदली है और इसकी आत्मा भी बदली है। ”आज भारत के आदर्श अपने हैं, आयाम अपने हैं। आज भारत के संकल्प अपने हैं, लक्ष्य अपने हैं। आज हमारे पथ अपने हैं, प्रतीक अपने हैं।”

यहां ध्यान देने योग्य है कि प्रधानमंत्री मोदी देश के प्रत्येक नागरिक को उसके कर्तव्य की याद पहली बार इस सड़क का नाम बदलकर नहीं दिला रहे हैं, इससे पहले भी कई मौके आए हैं, जब उन्होंने कहा कि अपने कर्तव्यों को पूरी तरह भूल जाने की मानसिकता ने ही भारत को कमजोर रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। “हम सभी को, देश के हर नागरिक के हृदय में एक दीया जलाना है- कर्तव्य का दीया। हम सभी मिलकर, देश को कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ाएंगे, तो समाज में व्याप्त बुराइयां भी दूर होंगी और देश नई ऊंचाई पर भी पहुंचेगा।” वस्तुत: जब प्रधानमंत्री मोदी यह कहते हैं कि नागरिकों के कर्तव्य से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी बाहर नहीं हैं। तब समझ लेना चाहिए कि ”कर्तव्य पथ” पर चल पड़े भारत की तेज गति अब रुकने वाली नहीं है। भारत विश्व की पांचवीं नहीं, अतिशीघ्र पहली अर्थव्यवस्था बनेगा, बल्कि विश्व गुरु की भूमिका में पुन: दिखाई देगा, ऐसा विश्वास है।

(लेखक, फिल्म सेंसर बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्य एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)।

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