रोमन कैथोलिक फादर कामिल बुल्के की जीवन यात्रा एक साहित्यिक यात्रा थी

  • बेल्जियम से इन्डिया तक उनके जीवन को मिला था आकार
  • रामकथा को दी वैश्विक प्रसिद्धि

हिन्दी के धर्मयोद्धा, रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास के भक्त पद्म भूषण फादर कामिल बुल्के का जीवन बेलजियम और भारत जैसे दो भिन्न देशों को जोड़नेवाला पवित्र सेतु है जहां सांस्कृतिक और वैदुषिक परम्पराओं की संधि पर उनके व्यक्तित्व को अपना विशिष्ट आकार मिला था।

जन्मभूमि बेल्जियम के बाद कर्मभूमि भारत-विशेष रूप से छोटानागपुर में उनके आजीवन प्रवास पर दृष्टिपात किये बिना फादर बुल्के का स्मरण करना अधूरा ही माना जायेगा। फादर बुल्के न केवल एक रोमन कैथोलिक पादरी के रूप में बल्कि एक साहित्यकार के रूप में हिन्दी की ऐसी विरल सेवा की, जिसके लिए हिन्दी संसार उनका अनुगृहित है। उदारता के शिखर पर पहुंचे एक संत के रूप में उन्होंने स्वीकार किया कि ‘समस्त मानवता एक है।’ वह एक ऐसे व्यक्ति थे जो दिवंगत होकर भी संवेदनशील प्रबुद्धों स्मृति में सदैव बने रहते हैं। आज भी बने हुए हैं।

उन्होंने रामकथा पर जैसा शोध कार्य किया है वह उन्हें अमरता प्रदान कर चुका है। इस शोध ग्रंथ में दुनिया भर में उपलब्ध रामकथाओं का सुन्दर और शोधपूर्ण आकलन कर उन्होंने चमत्कृत कर दिया। यही कारण है कि हिन्दी जगत फादर बुल्के को अपने साहित्य मनीषियों के बीच प्रतिष्ठित कर चुका है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ऐसे कर्मठ, सहृदय, उदारचेता साहित्यकार और समाज सेवी को कोई भी देशकाल सहज ही विस्मृत नहीं कर सकता है। कालजयी शोध ग्रंथ-रामकथा-उत्पति और विकास’ पर ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में उन्होंने डाक्टरेट की उपाधि (1945-49) प्राप्त की।

फादर कामिल बुल्के ने मूल यूनानी से बाइबल का हिन्दी में प्रमाणिक और मौलिक अनुवाद किया है। यही नहीं उनका अंग्रेजी-हिन्दी कोश इतना प्रमाणिक, शुद्ध और सहज उपयोगी है कि आज भी हिन्दी-अंग्रेजी के छात्र अध्येता और लेखक इसी कोश का सहारा लेते हैं।

फादर कामिल बुल्के का जन्म बेल्जियम के पश्चिम प्लैण्डर्स प्रांत के रम्सकपैले नामक गांव में 1 सितम्बर 1909 ई0 को हुआ था। इस गांव में उनके पूर्वज कई पीढ़ियों से रह रहे थे और आज भी उनके कई सम्बन्धी इस गांव में बसे हुए हैं। इनके पिता का नाम अडोल्फ और माता का नाम मारिया बुल्के था। इनके दादा का नाम फिलिप बुल्के था।

वह धर्मनिष्ठ तो थे किन्तु फिजुलखर्ची भी करते थे। उनकी इस प्रवृति से उनके आगे की पीढ़ी को जीवनयापन के लिए आर्थिक संकट झेलना पड़ा। कामिल बुल्के का बचपन भी संकटपूर्ण रहा। हालांकि वह बचपन से ही धार्मिक भावना से ओत-प्रोत थे तथा संवेदनशीलता उनमें कूट-कूट कर भरी थी। उच्च विद्यालय की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंनंे इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। उन्होंने एक अग्रणी छात्र नेता के रूप में भी अपनी पहचान बनाई थी। वह फुटबाॅलर भी थे।

आंतरिक प्रेरणा और विशिष्ट दैविक अनुभवों के कारण बुल्के 1930 में एक जेसुइट बन गये। नीदरलैंड के वलकनबग में अपना आध्यात्मिक और दार्शनिक प्रशिक्षण (1932-34) प्राप्त करने के बाद 1934 में वह इन्डिया की ओर चले। नवम्बर 1936 में ये सर्वप्रथम बम्बई (मुंबई) पहुंचे। यहां भारत के दार्जिलिंग में कुछ दिनों के प्रवास के उपरांत ही संयुक्त बिहार-झारखण्ड के अर्थात तब के दक्षिणी छोटानागपुर के गुमला जिले में पांच वर्षों तक गणित के शिक्षक के रूप में अपनी सेवा दी। इसी दौरान आपने हिन्दी, ब्रजभाषा और अवधी सीखी। तब भारत (इन्डिया) में कुछ लोग अपनी भाषा और परम्परा को तिरस्कृत कर अंग्रेजी बोलना गर्व की बात समझते थे। तभी बुल्के ने हिन्दी-संस्कृत आदि भाषाएं सीखने का संकल्प लिया था।

उन्होंने 1939-42 में ब्रह्मवैज्ञानिक प्रशिक्षण भारत के कुर्सियांग में लिया। हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से विशारद की परीक्षा उर्तीण कर ली। इसी काल (1941) में इन्हें पुजारी की उपाधि मिली। इन्होंने 1942-44 में कलकत्ता (अब कोलकाता) विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. कर लिया और अंत में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ‘रामकथा-उत्पति और विकास’ जैसे कालजयी विषय पर डाक्टरेट (1945-49) की उपाधि प्राप्त कर ली, जिसने इन्हें भारत में अमर कर दिया।

1950 में संत जेवियर्स महाविद्यालय, राॅंची में इन्हें हिन्दी एवं संस्कृत विभाग का विभागाध्यक्ष बनाया गया। इसी वर्ष इन्हें भारत की नागरिकता भी मिली तथा इसी वर्ष वे बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् की कार्यकारिणी के सदस्य भी नियुक्त हुए। सन् 1972 से 1977 तक भारत सरकार की केन्द्रीय हिन्दी समिति के सदस्य रहे। वर्ष 1973 में इन्हें बेल्जियम की राॅयल अकादमी की भी सदस्यता मिली।

फादर कामिल बुल्के के तार्किक वैज्ञानिकता पर आधारित शोध संकलन ‘रामकथा: उत्पति और विकास’ के अनुसार राम वाल्मीकि के कल्पित पात्र नहीं बल्कि इतिहास पुरूष थे। हो सकता है कि तिथियों में किंचित चूक हो। यही नहीं रामकथा की वैश्विक व्यापकता को भी बुल्के के शोध ने ही प्रमाणित किया। वियतनाम से इन्डोनेसिया तक रामकथा फैली हुई हैं। रामकथा के विस्तार को फादर कामिल बुल्के वाल्मीकि और भारतीय संस्कृति के दिग्विजय के रूप में देखते थे।

फादर कामिल बुल्के को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्धियों के परिप्रेक्ष्य में भारत सरकार ने सन् 1974 में पद्मभूषण से अलंकृत किया।

गौरतलब है कि फादर बुल्के ने शोध और कोश निर्माण के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि अनुवाद के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने विश्वप्रसिद्ध नाटक ‘द ब्लू बर्ड’ का नील पंछी के नाम से 1958 में अनुवाद किया। नील पंछी का प्रकाशन बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, बिहार, पटना से किया गया। ‘द ब्लू बर्ड’ मूल फ्रेंच में है।

गौर किया जाए तो स्पष्ट है कि फादर बुल्के का साहित्य बहुत विस्तृत है। उनकी छोटी बड़ी पुस्तकों की संख्या उनतीस है और शोध परक निबंधों की संख्या साठ है। इसके अतिरिक्त हिन्दी विश्वकोश तथा अन्य कई सम्पादित ग्रंथों में सम्मिलित लगभग सौ छोटे बड़े निबन्ध है। रांची स्थित मनरेसा हाउस में उनका आवास प्राध्यापकों, साहित्यकारों, धार्मिकों एवं प्रशंसकों के लिए तीर्थ स्थल की तरह बना रहता था। एक विदेशी पादरी के रूप में भारत के लोगों के बीच एक सनातनी हिन्दू संत की तरह मूर्तिमान थे। जीवन के अंतकाल में वह अधिक बीमार रहने लगे थे लेकिन बीमारी की चिन्ता किए बिना वह काम में रत रहते थे।

1950 में हीं उनके कान भी खराब हो गए थे। वह श्रवण यंत्र लगाने लगे थे। अंतिम दिनों में उन्हें गंैग्रीन हो गया। यहां मांडर और पटना के कुर्जी अस्पताल में इलाज के बाद उन्हें दिल्ली ले जाया गया, जहां 17 अगस्त 1982 को प्रातः साढ़े आठ बजे वह चिर-निद्रा में सो गए। दिल्ली के निकाॅलासन कब्रगाह में दूसरे दिन वह दफन हो गए।

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