Saraswati Puja : विद्या और बुद्धि की देवी: मां सरस्वती

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जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों में सरसों का सोना चमकने लगता, जौ और गेहुँ की बलियाँ खिलने लगतीं, ओमों के पेड़ों पर बौर आ जाता और हर तरफ रंग-बिरंगी तितलियाँ मंडराने लगती। वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पांचवें दिन एक बड़ा जश्न मनाया जाता था, जिसमें विष्णु और कामदेव की पूजा होती, यह वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता था। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्य ग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है। लेकिन बसंत पंचमी में विशेष तौर पर विद्या की देवी सरस्वती की पूजा करने कास दिन माना गया है। इस दिन स्त्रियां पीले वस्त्र धारण करती हैं।

बसंत पंचमी से जुड़ी लोककथा

सृष्टि के प्र्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की। अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है। विष्धु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा। इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अ˜ुत शक्ति का प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदी स्त्री का था जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला था।

ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता है। संगीत की उत्पŸिा करने के कारण ये संगीत की देवी भी है। बंसत पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रुप में भी मनाते हैं।

ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा कया है- प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु। अर्थात्ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रुप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोंवृतियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेंध है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरुप का वैभव अ˜ुत है। पुराणें के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से खुश होकर उन्हंे वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी अराधना की जाएगी और यूं भारत के कर्द हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो आज तक जारी है।

पर्व का महत्व: वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है। यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्सहा देने वाला है, पर वसंत पंचमी (माघ शुक्ल 5) का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान ओर कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है।

जो शिक्षाविद् भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इन दिन मों शारदे की पूजा उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। कलाकारों का तो कहना ही क्या् ? जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बही खातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के वसंत पंचमी का है। चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार होें या नृत्यकार, सब दिन का प्रारंभ अपने उपकरणों की पूजा ओर मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।

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