Tawaif Rolls In Freedom Struggle Can’t Be Ignored : आजादी की लड़ाई में देश भक्ति से ओत-प्रोत रही हैं तवायाफों की गतिविधियां

लुबना हाश्मी/ Insight Online News

भारत की आजादी की लड़ाई में यूं तो आप सब ने बहुत नामों को पढ़ा और सुना होगा लेकिन कुछ ऐसे भी नाम हैं जिनके बारे में कम ही उल्लेख किया गया है। ना ही बड़े इतिहासकारों ने और ना ही किसी मुख्य लेखक ने इनका उल्लेख करना जरूरी समझा। वर्तमान समय के समाज में जिन वैश्याओं का दर्जा बहुत ही निचला है और उनका सम्मान ना के बरारबर है। यहां तक कि उनके नाम को गालियों के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। किसी जमाने में आजादी की लड़ाई में हमारे सिपाहियों के साथ कंधे से कन्धा मिला कर इन वैश्याओं ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा भी लिया था। इन दरबारियों को उत्तर में तवायफ, दक्षिण में देवदासी, गोवा में नेकिल्स, बंगाल में बैजिस, और अंग्रेजो द्वारा नॉच गर्ल्स के नाम से जाना जाता है जिसे आज के तौर पर हम अश्लीलता की दृष्टि से देखते हैं। आज हम आपको परिचित कराने वाले हैं कुछ ऐसे ही नामों से जिनके बारे में अपने शायद पहले ही कभी सुना हो।

  • अजीजुन बाई

अजीजुन बाई एक जासूस ,खबरी और योद्धा थी उनका जन्म लखनऊ में हुआ था। इनकी माता भी एक तवायफ थी।बाद में वह कानपूर में स्थित उमराओ बेगम के महल में रहने लगी थी।देश के प्रति प्रेम का जज्बा ही उन्हें लखनऊ जैसे सांस्कृतिक केंद्र को छोड़ कर कानपूर की सैन्य छावनी में ले आया।बताया जाता है कि अजीजुन बाई ब्रिटिश इंडियन आर्मी के सैनिको के काफी नजदीक थीं।खासकर द्व्तीय सेना के शम्सुद्दीन खान से जिन्होंने आजादी कि लड़ाई में अहम् भूमिका निभाई। अजीजुन बाई का घर सिपाहियों की बैठक की जगह हुआ करती थीं।

अजीजुन ने महिलाओ का एक संगठन भी बनाया जिसके सदस्य निडर हो कर भारतीय सैनानियों को हर संभव सहायता पहुंचाते थे। अजीजुन बाई एक ऐसी महिला थी जिन्होंने 1857 की क्रांति में अहम भूमिका निभाई। यह उन दरबारियों में से एक थी जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ हुई लड़ाई में एक जोखिम भरा जीवन बिताया। जून 1857 में भारतीय सैनिको ने कानपूर को सीज करने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी के ब्रिटिश अधिकारियो को पूरी तरह घेर लिया था। इस ही समय अजीजुन बाई भी इन सैनिको के साथ लड़ रही थी। एक पुरुष के वेश में मेडल्स से आभूषित घोड़े की पीठ पर सवार हो कर पिस्तौल लिए मैदान-ए-जंग में प्रवेश कर गई।किसी किताब में इस घटना को दर्ज तो नहीं किया गया लेकिन स्थानीय किंवदंतियों, ऐतिहासिक दस्तावेज और शोध पत्रों तक ही इस घटना का उल्लेख सीमित रह गया।

रोचक बात यह भी है कि मुख्यधारा इतिहास लेखन द्वारा महिलाओ कि प्रयास को छुपा देने के बावजूद भी अजीजुन बाई जैसी महिलाओ का नाम औपनिवेशिक रिकॉर्ड में देखने को मिलता है।

ऐसा मन जाता है कि अजीजुन बाई उस जुलूस में भी शामिल थी जब नाना साहेब के शुरुआती विजय पर कानपूर में झंडा लहराया गया था। कानपूर में आज भी लोगो की यादो में अजीजुन बाई का नाम जीवित है।

सौ से अधिक ऐसी कहानिया है उन वीर महिलाओं के बारे में जिन्होंने आजादी की लड़ाई में प्रमुख भूमिका निभाई थीं मगर इनका रिकॉर्ड कही भी नहीं रखा गया। इनमे से एक बेगम हजरत महल भी थीं जो अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह की पत्नी थीं। मन जाता है की नवाब के साथ अपनी शादी से पहले वह एक दरबारी थीं और विद्रोह के दौरान अपने पति की जगह भारतीय सैनिको का नेतृत्व किया और काम समय के लिए सही लेकिन लखनऊ को अपने कब्जे में ले लिया।

आजादी की लड़ाई में अपनी सक्रियता के परिणाम इन तवायफों को सहने पड़े 20वीं शताब्दी आते ही इनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी मगर फिर भी इन तवायफों का हौसला कम न हुआ।देश की आजादी के लिए इनका योगदान तब भी बर्करार रहा।

1920 से लेकर 1922 के असहयोग आंदोलन के दौरान वाराणसी के दरबारियों के समूह ने स्वतंत्रता संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए एक तवायफ सभा भी बनाई। इस सभा की कमान हुस्ना बाई ने संभाली और इस सभा के सदस्यों को एकता के साथ विदेशी वस्तुओ का बहिष्कार करने और आभूषण की जगह लोहे की जिरह और हथकड़ी पेहेनने के लिए प्रोत्साहित किया।
इतने योगदान के बाद भी इन तवायफों को यादो से मिटा दिया गया और आजादी की लड़ाई में इनके योगदान को भी भुला दिया गया। इन तवायफों को इतना महत्वपूर्ण नहीं समझा गया कि उनके बारे में दतावेजों में लिखा जा सके।

जेएनयू में सेंटर फॉर वुमंस स्टडीज की प्रोफेसी लता सिंह
  • तवायफों के साथ भेदभाव भरा व्यवहार

नई दिल्ली स्थित जेएनयू में सेंटर फॉर वुमंस स्टडीज की प्रोफेसी लता सिंह बताती हैं कि तवायफों का राष्ट्रवादी गतिविधियों में महत्वपूर्ण योगदान रहा, लेकिन उन्हें कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा।

स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भागीदारी होने के बावजूद उन्हें इतनी पहचान नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी। समाज की सोच के चलते उन्हें भेदभाव भी झेलना पड़ा। राष्ट्रवादी आंदोलन की सार्वजनिक बैठकों में तवायफों की उपस्थिति को भद्र महिलाएं अच्छा नहीं मानती थीं। कांग्रेस के एक सत्र में गौहर जान का आना आदरणीय महिलाओं को पसंद नहीं आया और इस महान गायिका को बाहर ही रहने को कह दिया गया।

किराना घराने की गायिका गंगूबाई हंगल 1924 में जब बेलगाम कांग्रेस अधिवेशन में गईं तो उसमें गांधी जी भी आए हुए थे। तब उनसे अलग खाना खाने के लिए कहा गया था।

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