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भाषाओं का टकराव नहीं होना चाहिए,हर भाषा को संजोना होगा: धनखड़

हैदराबाद 02 मार्च : उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने रविवार को कहा कि भारत की विभिन्न भाषाओं के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि भाषाएं साहित्य का खजाना है और इनमें आपस में कोई टकराव नहीं होना चाहिए तथा सभी भाषाओं को संजाेना होगा।

श्री धनखड़ ने आज यहां आईआईटी हैदराबाद में छात्रों काे संबोधित करते हुए कहा “भारत अनेक समृद्ध भाषाओं की भूमि है। संस्कृत, बंगाली, हिंदी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और कई अन्य भाषाएं,यहां तक कि संसद में भी 22 भाषाओं में एक साथ अनुवाद की व्यवस्था है। हमारी सभ्यता की मूल भावना समावेशिता की बात करती है। क्या भारत की भूमि पर भाषा को लेकर टकराव की स्थिति होनी चाहिए? जब हाल ही में कई भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया गया, तो यह हम सभी के लिए गर्व का क्षण था। हमें हर भाषा को संजोना होगा। हमारी भाषाएं वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान रखती हैं, वे साहित्य का खजाना हैं और उनमें ज्ञान तथा बुद्धिमत्ता समाहित है—वेद, पुराण, हमारे महाकाव्य रामायण, महाभारत और गीता।”

उन्होंने पूर्व छात्रों के संघों के महत्व को रेखांकित किया और कहा, “विश्वविद्यालयों को देखिए, उनके एंडोमेंट फंड देखिए। अरबों अमेरिकी डॉलर। मैंने जब इस पर एक नजर डाली, तो मैं चकित रह गया। शीर्ष सूची में देखें तो लगभग 50 अरब अमेरिकी डॉलर के करीब पहुँच रहे हैं। हमारे पास ऐसा क्यों नहीं है? हमारे पास भी पूर्व छात्र हैं। हमारे पूर्व छात्र संस्थानों के लिए कोष में योगदान दें। राशि महत्वपूर्ण नहीं है, योगदान की भावना ही संस्थान से जुड़ाव पैदा करती है। यह उनके लिए भी गर्व की बात होगी।”

उन्होंने आगे कहा, “मैंने एक विचार प्रस्तुत किया है। मुझे आशा है कि कोई इस पर काम करेगा। हमारे पास आईआईटी,आईआईएम और अन्य उत्कृष्ट संस्थान हैं। उनके पूर्व छात्रों के संघों को एक महासंघ बनाना चाहिए। यह नीति निर्माण के लिए एक शीर्ष वैश्विक मानक थिंक टैंक होगा। यह अनुसंधान और नवाचार को भी प्रोत्साहित कर सकता है।”

कॉरपोरेट्स को अनुसंधान और नवाचार में निवेश करने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा, “सबसे पहले हमारे कॉरपोरेट्स। मैं उनकी आलोचना नहीं कर रहा, बल्कि उनका मूल्यांकन कर रहा हूँ। उन्हें अनुसंधान में निवेश करना चाहिए, उन्हें विकास और नवाचार के लिए निवेश करना चाहिए। उन्हें वैश्विक दिग्गजों से प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए, क्योंकि यह निवेश केवल किसी छात्र या संस्थान के लिए नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान और भविष्य के लिए है।”

श्री धनखड़ ने कहा “ विश्वास कीजिए, वैश्विक रणनीतिक प्रणाली में बड़ा परिवर्तन आया है। पारंपरिक युद्ध प्रणाली समाप्त हो चुकी है, अब कूटनीति ही निर्णायक भूमिका निभाती है। नवाचार और अनुसंधान हमें सॉफ्ट डिप्लोमेसी में बढ़त दिलाते हैं और हमें एक महाशक्ति बनाते हैं। इसलिए, मैं इस मंच से अपील करता हूं कि कॉरपोरेट्स, पश्चिमी देशों में आपके समकक्ष क्या कर रहे हैं, इसका अध्ययन करें। कृपया उनके बराबर आएं।”

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