West Bengal : कोरोना की वजह से बदली परंपरा, पहली बार बिना सिंदूर विदा होंगी मां दुर्गा

कोलकाता, 23 अक्टूबर । कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया में बहुत कुछ बदल दिया है। शक्ति की अराधना के लिए विख्यात बंगाल के इतिहास में पहली बार दुर्गापूजा की परंपरा को बदलना पड़ रहा है। दुर्गापूजा की​ शुरुआत मां की प्रतिमा में चक्षु दान के साथ किया जाता है और पूजा संपन्न होती है सिंदूर खेला के साथ।

ऐसी मान्यता है कि 9 दिन मायके में रहने के बाद मां अपनी ससुराल जाती हैं, इसके पूर्व महिलाएं पान के पत्ते में सिंदूर डालकर मां की मांग भरती है। उसके बाद वही सिंदूर वे एक-दूसरे को लगाती है। दुर्गापूजा के पूरे 9 दिन में यह रस्म सबसे खूबसूरत होती है जिसके साथ भावनात्मक रूप से सभी ​जुड़े होते हैं। इस बार इस भावना को कोरोना के कारण बड़ा आघात लगा है क्योंकि संक्रमण बढ़ने के कारण कोर्ट ने सिंदूर खेला पर रोक लगा दी है। मां की विदायी होगी मगर नहीं होगा सिंदूर खेला।

इसे लेकर पूजा आयोजकों में भी मायूसी छा गयी है। त्रिधारा सम्मिलनी के आर्गनाइजिंग सेक्रेटरी लाल्टू मुखर्जी ने कहा कि सिंदूर खेला तो होगा ही नहीं। कोर्ट ने 45 लोगों को पंडाल में आने की इजाजत दी है मगर हम किसी को भी नहीं आने देंगे क्योंकि क्लब में 350 से अधिक सदस्य हैं ऐसी स्थिति में सिर्फ 45 नाम तय करना उचित नहीं होगा। इसलिए हम किसी को भी नहीं आने देंगे। हिंदुस्तान पार्क की तरफ से मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने कहा कि इस बार मां की विदाई बगैर सिंदूर खेला की ही होगी। क्या करें कोर्ट का आदेश है, दुख तो बहुत हो रहा है मगर कुछ किया नहीं जा सकता।

इस बारे में ज्यादातर पूजा आयोजकों ने प्लान नहीं किया है। उनका कहना है कि कोर्ट ने पंडाल में सीमित लोगों को आने की ही इजाजत दी है इसलिए धुनुची नाच होगा कि नहीं इस पर हम तय करेंगे। हां पंडाल में जो ढाकियों की ढाक की आवाज से सूने लग रहे थे वहां उसकी धुन सुनायी दे रही है लेकिन धनूची नृत्य पर संशय के बादल छाए हैं।

(हि.स.)

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